‘द गिरमिटिया सागा’ का विमोचन
यह ‘द गरिमिटिया सागा’ क्या है यह सवाल दिमाग में आना स्वाभाविक है। मैं शायद इस बारे में न लिखता क्योंकि यह अपने बारे में है। यह पहला और अलग अनुभव है। मेरे मित्र और आई आई टी कानपुर के सहयोगी प्रो. प्रजापति साह ने पहला गिरमिटिया का दो वर्ष लगाकर अंग्रेज़ी में ‘द गिरमिटिया सागा’ नाम से अनुवद किया है। लगभग 1012 पृष्टों में, संक्षिप्त करते भी फैल गया। हालांकि मूल हिंदी उपन्यास 904 पृष्टों में है। इसका विमोचन यानी लांचिंग भी साहित्यिक पुस्तकों की विमोचन परंपरा से थोड़ा अलग ढंग से हुआ। 18 मार्च 10 को, गांधी स्मृति, 30 जनवरी मार्ग नई दिल्ली के हाल में, न किसी राज नेता द्वारा हुआ और न किसी नामी गिरामी साहित्यकार द्वारा, गांधी जी की पौत्री श्रीमती तारा गांधी भट्टाचार्य ने किया। गांधी स्मृति गांधी जी के बलिदान की पुण्य भूमि है। राजेंद्र यादव, बरनवाल जैसे मित्रों को छोड़कर दिल्ली के बड़े़ लेखक कम ही शरीक हुए। किसी ने कहा तुम बाहरी हो। ज़रूरी नहीं यही ए कारण हो। हो सकता है प्रकाशक द्वारा भेजे गए निमंत्रण न मिले हों। लेकिन जिन लोगों को एस एम एस किए या फ़ोन किए, हामी के बावजूद उनमें से भी कम ही लोग पाए। महिला लेखक तो नहीं के बराबर। उनकी अपनी मजबूरियां हो सकती हैं। लेकिन फिर भी हाल भरा था। अपने जैसे लोग थे। जहा तक अंग्रेज़ी पत्रकारों की उपस्थिति का सवाल है हिंदी के आयोजनों में उनकी उपस्थिति स्वाति बूंद की सी होती है। एक समाचार पत्र जो हिंदी और साहित्य का पक्षधर माना जाता है उसकी अप्रत्याशित अनुपस्थिति ने चौंकया ज़रूर। वाजिब कारण हो सकते हैं। रुख़ की भी बात होती है।
द गिरमिटिया सागा दिल्ली के नियोगी बुक्स(डी 78, ओखला इंडिस्ट्रियल एस्टेटफेज़ 1,नई दिल्ली 20) ने छापा है। एक साल से अधिक लगा। वैसे वे एकेडेमिक पुस्तकें छापते हैं यह पहली पुस्तक है जो उपन्यास की श्रेणी में आती है। व्यवसायी से अधिक एक उत्साही और संवेदनशील प्रकाशक। लोगों का कहना है कि प्रोडेक्शन विश्व स्तरीय हुआ है। ख़ैर इस मामले में पाठकों की राय सर्वोपरि होगी। इस अवसर पर प्रो. इन्द्रनाथ चौधरी एवं श्री निर्मलकांत भट्टाचार्य ने अपने अपने पर्चे पढ़े। मेरे लिए इसके अलावा और कुछ भी कहना संभव नहीं, दो बातें कह सकता हूं कि उनमें आत्मीयता के साथ साहित्य मानकों का निर्वहन था। रचना के प्रति व्यापक दृष्टि थी। दोनों ही एक बात पर एकमत थे कि अनुवाद निर्बाध बहते जल की तरह है। इनके अलावा प्रजापति साह ने अपना वक्तव्य दिया जो अनुवाद और अनुवादकों तथा समाज के परस्पर संबंधों का खुलासा करता था। एक बात और बताई कि उन्होंने अनुवाद के लिए मेरे इस उपन्यास को क्यों चुना। वे चाहते थे यह उपन्यास जो हिंदी पाठकों में आवश्यकता बनता जा रहा है और अहिंदी भाषी लोग भी पढ़ने में रुचि रखते हैं वह अंग्रेज़ी पाठकों तक भी पहुंचे। अभी नवजीवऩ अहमादाबाद द्वारा गुजराती में छपा है। मराठी और उड़िया में प्रकाशाधीन है। साह साह ने उस घटना का भी उल्लेख किया जो मेरे साथ घटी थी। ज्ञानपीठ ने पहला गिरमिटिया की पहली प्रति राष्ट्रपति नारायणन साहब को भेंट की थी। चलते समय उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर पूछा था कि मैं इस उपन्यास को कैसे पढ़ूंगा। मैंने कहा था कि जैसे ही अंग्रे़ज़ी में छपेगा मैं लेकर उपस्थित हूंगा। अब जब छपा तो वे नहीं हैं। द गिरमिटिया सागा उनको समर्पित करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था। केवल अपने मन की शांति के लिए। साह साहब ने ढ़ाईघर उपन्यास भी साहित्य अकाडेमी के लिए अनुदित किया था। जो वहीं से प्रकाशित है।
श्रीमती तारा गांधी का भाषण गांधी जी के बारे में अनेक संस्मरणों से युक्त था। उन्होंने पहला गिरमिटिया और द गिरमिटिया सागा से मार्मिक प्रसंग तक उद्धृत किए थे। चौधरी साहब और निर्मल जी ने भी किए थे। पाठकों को रुचिकर लगे। तारा जी ने एक बात कही कि मैंने तीन सत्याग्रही देखे एक बापू और दो और, गिरिराज किशोर तथा प्रजापति साह। मैं चौंका। फिर सोचा कि शायद इसलिए इस श्रेणी में रख दिया कि हम दोनों बटुकों की तरह चोटी छत से बांधकर इस काम मे सन्नद्ध हो गए थे, गफलत में पड़कर सो न जाएं। वे 14 साल तक अपने दादा के साथ रहीं थीं। वह भी दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद। अगले दिन मुझे फोन करके कहा कि देखो मैंने इस उपन्यास को तीन बार पढ़ा। कस्तूर बा के बारे में भी लिखो। उनके कहने में ममत्व था। मेरी तरह श्री नियोगी का भी यही प्रयत्न है कि गांधी जी के इस अपेक्षाकृत कमतर जाने गए, पर महत्त्व पूर् 20 साल के निर्माण काल को लोग गहराई से जानें।
20 मार्च को इस पुस्तक को आई आई टी कानपुर में निदेशक प्रो. संजय गोंविंद ढांढे द्वारा विमोचित कराया गया। श्री नियोगी चाहते थे कि जिस रचनात्मक केंद्र को मैंने आरंभ किया और जहां इस उपन्यास के पहले दो ड्राफ्ट तैयार हुए वहां ज़रूर विमोचन किया जाए। मैं बहुत आशावान नहीं था। क्योंकि आई आई टी के लिए अस्पर्श्य की श्रेणी में आता था। इतने बड़े संस्थान से लड़कर आने वाला सामान्य व्यक्ति चुभन पैदा करता है। ढांढे साहित्य की दृष्टि से संवेदनशील व्यक्ति हैं। अगर कोई निदेशक होता तो शायद इस काम के लिए उत्साहपूर्वक तैयार न होता। उऩ्होंने एक बात कही हम सब गिरमिटिया हैं फर्क इतना ही है कि अपने एग्रीमेंट का पता नहीं है कि कब उसकी तरीख समाप्त होगी। गिरमिट यानी एग्रीमेंट की यह एक दार्शनिक व्याख्या है। प्रो साह ने इतिहास और रचनात्मकता की द गिरमिट सागा से उदाहारण देकर मार्मिक व्याख्या की। इतिहास ने कस्तूरबा से चेंबर पाट उठवा फेंकने की घटना को चार छः पंक्तियों में निबटा दिया उसी को एक रचनाकार कितनी संवेदना और कल्पनाशील ढंग से बयान करता है इस बात को उन्होंने गिरमिटिया सागा प्रभावी ढंग से प्रसतुत किया। लीलावती कृष्णन जो ह्यूमेनिटिज़ और रचनात्मक लेखन केंद्र की अध्यक्षा हैं उन्होंने और उनके साथियों ने तैयारी में व्यक्तिगत रुचि ली। श्री नियोगी ने लंच का आयोजन किया और धन्यवाद देते हुए संकेत किया कि उनका अन्य मेगा सिटिज़ में भी इस पुस्तक की लांचिंग का इरादा है। मुझे खुशी है कि जहां मैंने कठिनाई के दिन देखे वहीं मेरे जीवन का सर्वाधिक रचनात्मक काल बीता है। मैं इसलिए इस संस्था अवदान को याद रखुंगा।
Thursday, 1 April 2010
Thursday, 21 January 2010
राजनीति की गति जानी न जाए
राजनीति में कुछ लोग अब दो वजह से आते हैं एक, अधिकाधिक सत्ता और पद लाभ उठाने दूसरे अपने अंदर जमा गंदी निसारने। कभी राजनीति सेवा और बलिदान का माध्यम थी। लेकिन अब अरबपतियों की मंडी है। अपने रसूखों से वे पार्टियों को बनाने बिगाड़ने का काम करते हैं। सपा इसका ताज़ा उदाहारण है। मुलायम सिंह कभी जननेता थे। उनके बारे सामान्य मान्यता थी कि वे गरीब के दोस्त हैं, किसान के रहनुमा हैं। मैंने उन्हें बस की छत पर खड़े होकर गांव गांव किसानों से संवाद करते देखा था। तब वे चौ. चरण सिंह के साथ थे। साहित्यकारों के प्रति भी उनका दोस्ताना रुख था। जब मैं पहला गिरमिटिया पर काम कर रहा था तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका जाने के लिए 75 हज़ार रू.की राशि दी थी। अगर उस समय मदद न मिली होती तो शायद मेरे लिए जाना संभव न हो पाता। लेकिन बाद में उनका नेतृत्व हाई फ़ाई नेतृत्व हो गया। उनके लोग वे लोग हो गए जो सबके नहीं कुछ के हैं। जनेश्वर जी जैसे नेता जो समाजवाद के स्तंभ और लोहिया जी के दाहिने हाथ थे हाशिए पर हो गए। समाजवाद मात्र राजनीति करने का मंच नहीं है। जन सेवा और इबादत है। गांधी और लोहिया ने राजनीति को इसी नज़रिए से देखा था। न ही वह धन अर्जित करने और उच्च श्रेणी के लोगों धन्नासेठों को और लाभ पहुंचाने का माध्यम है। नए समाजवाद में यही सब प्रमुख हो गए। मुझे लगता है समाजवादी दृष्टि की कमी ही इसका कारण रहा होगा। यही बसपा के साथ हुआ। वहां भी अंबेडकर जी और कांशीराम का कोई प्रतिबिंब नज़र नही आता। मेरा डा. अंबेडकर से कोई न संपर्क रहा न परिचय। अलबत्ता कांशीराम जी से ज़रूर एक से अधिक बार मिलने का अवसर मिला। वे रफ़ीअहमद मार्ग पर पटेल हाऊस में एक कमरे में रहते थे। तब उनका संबंध बामसेफ़ से था। उनके पास एक पेंट और बुशर्ट रहती थी। शायद दो लुंगी। पेंट बुशर्ट धोकर डाल देते थे और लुंगी पहनकर सो जाते थे। कहीं जाना होता था न कार की दरकार होती थी और न हवाई जहाज़ की, दुपहिए पर पीछे बैठकर चल देते थे। लेकिन उनकी उत्तराधिकारी सौ सौ कारों के काफले में चलती हैं। धन तो सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बड़े लोगों वाली असुरक्षा उनमें भी है। ताम झाम का तो कहना ही क्या। एक बार मैंने दिल्ली में अंबेडकर जी को पटेल जी के बंगले से निकलकर अपने बंगले पैदल जाते देखा था,बस।
यह बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं कि समाजवाद का जो रूप सामने आ रहा है वह चकित करने वाला है। शायद समाजवाद को समझना अब और भी मुश्किल हो गया। आचार्य नरेंन्द्रदेव अद्वितिय विद्वान थे। लेकिन उन्होंने धन की तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखा। उनकी अंत्येष्टि का प्रबंध जहां तक मुझे मालूम है उनके मित्र और साथी चंद्रभानु गुप्त ने किया था। चंद्रभानु गुप्त की मृत्यु हुई उनके बैंक में चंद हज़ार रुपए थे। जिसका बटवारा अपनी वसियत में कर गए थे। बाक़ी जो कुछ था कार तक ,मोती लाल नेहरू ट्रस्ट के नाम कर दिया था। उन्हें पूंजीपतियों का आदमी कहा जाता था लेकिन उन्होंने कभी किसानों से ज़मीनें छीनकर उन्हें नहीं दी। अलबत्ता शिक्षा के काम के लिए ज़मीन घेरी। किसान को पूरा मुआवज़ा दिया पर 1400 एकड़ ज़मीन एक रुपए में आई आई टी कानपुर को दे दी। टाटा और अंबानी को पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश सरकार ने जिस तरह दी, जितनी हायतोबा हुई उसका ज़िक्र करना बेकार है। मुलायम सिंह जैसे गरीब परस्त नेता अपने महामंत्री के दबाव में अपने विवेक का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए। सपा के पूर्व महामंत्री कहते हैं कि अब मैं मुलायमवादी की जगह, समाजवादी नेता जनेश्वर जी की राय मान कर समाजवादी बनूंगी। समाजवादी क्या किसी की राय मानकर या अनुयाई बनकर बन जा सकता है। यह अंदर की चिंगारी है जो समाजवादी बना देती है। सरवेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी है लड़ाई है जो इंसान की ज़िंदगी में होने वाले सतत् संघर्ष को चित्रित करती है। लहू लुहान आदमी डा. लोहिया हैं और कोई नहीं। अब मेरे सामने कुछ सवाल हैं। अमिताभ बच्चन और उनका पूरा परिवार कहां जाएगा? बच्चन परिवार के सदस्यों को कला और संस्कृति के समस्त पुरस्कारों से लाद दिया गया था। महामंत्री जो साथ जीने की कसम खाते रहे थे अब कहा हैं। रामपुर से सपा की सीट से जीती तारिका जयाप्रदा सपा के पूर्व महमंत्री के बराबर में खड़ी नज़र आईं। छोटी सरकार अनिल अंबवानी का पता चल जाएगा, अंदाज़ तो है, वे कहां जाएंगे। सबसे बड़ी बात तो संजय दत्त की है। फिल्म से उठाया और महासचिव बना दिया। इतना विवेक तो बनाने वालो में होना चाहिए कि समाजवाद तमग़ा नहीं है सेवा और समर्पण है। उनके पिता ने शांति यात्रा निकाल कर आतंकवाद का विरोध किया था। वे ही सबसे पहले कूदकर भागे। आए भी वो गए भी वो, खत्म फसाना हो गया। समाजवाद क्या ऐसा ही होता है। समाजवादी क्या अपने साथियों की सहायता करके उसको इस तरह गाते हैं जिस तरह पूर्व महा सचिव अमर सिहं उसका महानाद कर रहे हैं। ख़ासतौर से समाजवाद के प्रति समर्पित नेता जनेश्वर जी के संदर्भ में। उनकी बीमारी में उन्होंने पैसा दिया। मैं जानता हूं उत्तर प्रदेश में ऐसे कई नेता हुए जो मदद करते थे पर ज़बान पर नहीं लाते थे।
चंद्रभानु गुप्त तो राजनारायण जैसे बड़े नेताओं तक की सहायता करते थे। जब कांग्रेस टूटी और उनके साथ रहे मंत्री दूसरी कांग्रेस में चले गए तब भी वे उनकी मदद करते रहे। किदवई साहब के घर से तो शायद कोई खाली लौटता हो। गुप्ता जी के बारे में तो लखनऊ में, जिन्हें न दे मौला उसे दे आसफ़ुद्दौला के वज़न पर एक कहावत चलती थी जिसे न दे मौला उसे दे सी बी गुप्ता। जनेश्वर जी को मैं 1960 के पहले से जानता हूं । वे इलाहाबाद का चक्कर पैदल लगाते थे। सरकार में रहते हुए भी वे निर्मल छवि वाले रहे। लोहिया और समाजवाद यही दो ध्यये थे। मुझे नहीं मालूम उन्होंने ऐसी कितनी मदद कर दी कि टाइम्स आफ इंडिया के माध्यम से उदघोष करने की ज़रूरत पड़ गई।राजनीति हो या और दूसरे सेवा के क्षेत्र यह छिछोरापन ही माना जाएगा। शायद नेताओं को अपनी नेताई के संरक्षण की ज़रूर पड़ती है। खुदा ख़ैर करे।
राजनीति में कुछ लोग अब दो वजह से आते हैं एक, अधिकाधिक सत्ता और पद लाभ उठाने दूसरे अपने अंदर जमा गंदी निसारने। कभी राजनीति सेवा और बलिदान का माध्यम थी। लेकिन अब अरबपतियों की मंडी है। अपने रसूखों से वे पार्टियों को बनाने बिगाड़ने का काम करते हैं। सपा इसका ताज़ा उदाहारण है। मुलायम सिंह कभी जननेता थे। उनके बारे सामान्य मान्यता थी कि वे गरीब के दोस्त हैं, किसान के रहनुमा हैं। मैंने उन्हें बस की छत पर खड़े होकर गांव गांव किसानों से संवाद करते देखा था। तब वे चौ. चरण सिंह के साथ थे। साहित्यकारों के प्रति भी उनका दोस्ताना रुख था। जब मैं पहला गिरमिटिया पर काम कर रहा था तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका जाने के लिए 75 हज़ार रू.की राशि दी थी। अगर उस समय मदद न मिली होती तो शायद मेरे लिए जाना संभव न हो पाता। लेकिन बाद में उनका नेतृत्व हाई फ़ाई नेतृत्व हो गया। उनके लोग वे लोग हो गए जो सबके नहीं कुछ के हैं। जनेश्वर जी जैसे नेता जो समाजवाद के स्तंभ और लोहिया जी के दाहिने हाथ थे हाशिए पर हो गए। समाजवाद मात्र राजनीति करने का मंच नहीं है। जन सेवा और इबादत है। गांधी और लोहिया ने राजनीति को इसी नज़रिए से देखा था। न ही वह धन अर्जित करने और उच्च श्रेणी के लोगों धन्नासेठों को और लाभ पहुंचाने का माध्यम है। नए समाजवाद में यही सब प्रमुख हो गए। मुझे लगता है समाजवादी दृष्टि की कमी ही इसका कारण रहा होगा। यही बसपा के साथ हुआ। वहां भी अंबेडकर जी और कांशीराम का कोई प्रतिबिंब नज़र नही आता। मेरा डा. अंबेडकर से कोई न संपर्क रहा न परिचय। अलबत्ता कांशीराम जी से ज़रूर एक से अधिक बार मिलने का अवसर मिला। वे रफ़ीअहमद मार्ग पर पटेल हाऊस में एक कमरे में रहते थे। तब उनका संबंध बामसेफ़ से था। उनके पास एक पेंट और बुशर्ट रहती थी। शायद दो लुंगी। पेंट बुशर्ट धोकर डाल देते थे और लुंगी पहनकर सो जाते थे। कहीं जाना होता था न कार की दरकार होती थी और न हवाई जहाज़ की, दुपहिए पर पीछे बैठकर चल देते थे। लेकिन उनकी उत्तराधिकारी सौ सौ कारों के काफले में चलती हैं। धन तो सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बड़े लोगों वाली असुरक्षा उनमें भी है। ताम झाम का तो कहना ही क्या। एक बार मैंने दिल्ली में अंबेडकर जी को पटेल जी के बंगले से निकलकर अपने बंगले पैदल जाते देखा था,बस।
यह बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं कि समाजवाद का जो रूप सामने आ रहा है वह चकित करने वाला है। शायद समाजवाद को समझना अब और भी मुश्किल हो गया। आचार्य नरेंन्द्रदेव अद्वितिय विद्वान थे। लेकिन उन्होंने धन की तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखा। उनकी अंत्येष्टि का प्रबंध जहां तक मुझे मालूम है उनके मित्र और साथी चंद्रभानु गुप्त ने किया था। चंद्रभानु गुप्त की मृत्यु हुई उनके बैंक में चंद हज़ार रुपए थे। जिसका बटवारा अपनी वसियत में कर गए थे। बाक़ी जो कुछ था कार तक ,मोती लाल नेहरू ट्रस्ट के नाम कर दिया था। उन्हें पूंजीपतियों का आदमी कहा जाता था लेकिन उन्होंने कभी किसानों से ज़मीनें छीनकर उन्हें नहीं दी। अलबत्ता शिक्षा के काम के लिए ज़मीन घेरी। किसान को पूरा मुआवज़ा दिया पर 1400 एकड़ ज़मीन एक रुपए में आई आई टी कानपुर को दे दी। टाटा और अंबानी को पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश सरकार ने जिस तरह दी, जितनी हायतोबा हुई उसका ज़िक्र करना बेकार है। मुलायम सिंह जैसे गरीब परस्त नेता अपने महामंत्री के दबाव में अपने विवेक का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए। सपा के पूर्व महामंत्री कहते हैं कि अब मैं मुलायमवादी की जगह, समाजवादी नेता जनेश्वर जी की राय मान कर समाजवादी बनूंगी। समाजवादी क्या किसी की राय मानकर या अनुयाई बनकर बन जा सकता है। यह अंदर की चिंगारी है जो समाजवादी बना देती है। सरवेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी है लड़ाई है जो इंसान की ज़िंदगी में होने वाले सतत् संघर्ष को चित्रित करती है। लहू लुहान आदमी डा. लोहिया हैं और कोई नहीं। अब मेरे सामने कुछ सवाल हैं। अमिताभ बच्चन और उनका पूरा परिवार कहां जाएगा? बच्चन परिवार के सदस्यों को कला और संस्कृति के समस्त पुरस्कारों से लाद दिया गया था। महामंत्री जो साथ जीने की कसम खाते रहे थे अब कहा हैं। रामपुर से सपा की सीट से जीती तारिका जयाप्रदा सपा के पूर्व महमंत्री के बराबर में खड़ी नज़र आईं। छोटी सरकार अनिल अंबवानी का पता चल जाएगा, अंदाज़ तो है, वे कहां जाएंगे। सबसे बड़ी बात तो संजय दत्त की है। फिल्म से उठाया और महासचिव बना दिया। इतना विवेक तो बनाने वालो में होना चाहिए कि समाजवाद तमग़ा नहीं है सेवा और समर्पण है। उनके पिता ने शांति यात्रा निकाल कर आतंकवाद का विरोध किया था। वे ही सबसे पहले कूदकर भागे। आए भी वो गए भी वो, खत्म फसाना हो गया। समाजवाद क्या ऐसा ही होता है। समाजवादी क्या अपने साथियों की सहायता करके उसको इस तरह गाते हैं जिस तरह पूर्व महा सचिव अमर सिहं उसका महानाद कर रहे हैं। ख़ासतौर से समाजवाद के प्रति समर्पित नेता जनेश्वर जी के संदर्भ में। उनकी बीमारी में उन्होंने पैसा दिया। मैं जानता हूं उत्तर प्रदेश में ऐसे कई नेता हुए जो मदद करते थे पर ज़बान पर नहीं लाते थे।
चंद्रभानु गुप्त तो राजनारायण जैसे बड़े नेताओं तक की सहायता करते थे। जब कांग्रेस टूटी और उनके साथ रहे मंत्री दूसरी कांग्रेस में चले गए तब भी वे उनकी मदद करते रहे। किदवई साहब के घर से तो शायद कोई खाली लौटता हो। गुप्ता जी के बारे में तो लखनऊ में, जिन्हें न दे मौला उसे दे आसफ़ुद्दौला के वज़न पर एक कहावत चलती थी जिसे न दे मौला उसे दे सी बी गुप्ता। जनेश्वर जी को मैं 1960 के पहले से जानता हूं । वे इलाहाबाद का चक्कर पैदल लगाते थे। सरकार में रहते हुए भी वे निर्मल छवि वाले रहे। लोहिया और समाजवाद यही दो ध्यये थे। मुझे नहीं मालूम उन्होंने ऐसी कितनी मदद कर दी कि टाइम्स आफ इंडिया के माध्यम से उदघोष करने की ज़रूरत पड़ गई।राजनीति हो या और दूसरे सेवा के क्षेत्र यह छिछोरापन ही माना जाएगा। शायद नेताओं को अपनी नेताई के संरक्षण की ज़रूर पड़ती है। खुदा ख़ैर करे।
Monday, 18 January 2010
ज्योति बाबू चले गए।
(1914-2010)
ज्योति बाबू का निधन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से एक दुखद घटना है। सी पी एम में वे हरिकृष्ण सुरजीत के जाने के बाद अकेले कद्दारवर नेता बचे थे जिनके पास देश की बढ़ोत्तरी क ब्ल्यू प्रिंट था। वे समर्पित कम्यूनिस्ट होने के बावजूद समन्व्य की अनवार्यता को भी महत्त्व देते थे। ज़रूरत पड़ती थी कट्टरपन से ऊपर उठकर मानवीय पक्ष का समर्थन करने से पीछे नहीं हटते थे। यह ठीक है कि उन्होंने बंगाल का मुख्यमंत्री रहते हुए सी पी एम की नीतियों को धार दी। लेकिन नानकम्यूनिस्ट वर्ग के साथ अन्याय भी नहीं हुआ। पर वे संभवतः कम्यूनिस्ट कैडर की तरह स्वतंत्र नहीं था। कैडर का वर्चस्व रहता था। उन लोगों को लगता था कि वे कैडर की बात को ही महत्त्व देते थे। बंगाल की आर्थिक उन्नति उनके लिए सर्वोपरि थी। उसके लिए पूंजी निवेश के प्रति दुराग्रही नहीं थे। सबसे बड़ा काम उन्होंने ज़मीन के पुनर्प्रबंधन का किया जिसके कारण किसानों को लाभ पहुंचा। उसी के दम पर सी पी एम आज तक गद्दीनशीन है। पंचायतों का जनतंत्रीकरण उन्हीं के काल में हुआ। सांप्रदायिक सदभाव को मज़बूत किया। लेकिन आज जिस प्रकार की राजनीति सी पी एम नेतृत्व कर रहा है वह ज्योतिबाबू की राजनीति से काफ़ी भिन्न है। यह ठीक है कि कम्युनिस्ट पार्टीज़ की नीति उनका पालितब्यूरो नियोजित करता है। लेकिन उनका व्यक्तित्व इस तरह का था कि पालितब्यूरो भी नीति निर्धारण के समय उनके दृष्टिकोण की कदर करने के लिए बाध्य हो जाता था। देश और उनके साथ पालितब्यूरो ने उस समय खुला अन्याय किया था जब सब पार्टीज़ उनके प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थी लेकिन तत्कालीन पार्टी सचिव या कहिए पालितब्यूरो तैयार नहीं हुआ था। सारा देश सकते में आ गया था। उनके स्थान पर एक अनुभवहीन व्यक्ति के नाम छींका छूट गया था। आज भी लोग उस क्षण को कोसते हैं कि अगर ज्योति बाबू प्रधानमंत्री हो जाते देश का इतिहास ही अलग होता।
दरअसल कम्यनिस्ट पार्टी कई बार एक ऐसे बच्चे के तरह व्यवहार करतीं हैं कि सिद्धान्त के नाम पर वे अपनी पसंद नापसंद को धीरे से क्रियान्वित करके सुर्ख़ रूह बन जाती हैं। बाद में सोचती हैं कि यह गलत हुआ पर स्वीकार नहीं करतीं। यही पिछले दिनों स्पीकर के सवाल पर यही हुआ। मुखर्जी साहब को पार्टी से निकाल दिया गया सिर्फ इसलिए सब जनतंत्रों में प्रचलित परंपरा के तहत उन्होंने कहा था कि स्पीकर किसी पार्टी का सदस्य नहीं रहता। इसलिए पार्टी के संयुक्त मंच से हट जाने पर स्पीकर का त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं। जब ज्योति बाबू को प्रधानमंत्री बनने देना सिद्धान्त विरुद्ध था तो स्पीकर बनने देना कैसे सिद्धांत के अंतरर्गत आ गया। सिद्धांत क्या शक्ल बदलने के साथ बदल जाते हैं। ज्योति बाबू का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए तो लाभकर था ही पार्टी का भी कम लाभ नहीं होता। दरअसल मुखर्जी साहब वरिष्ठतम व्यक्ति थे। योग्य भी। उनके पार्टी में बने रहने से हो सकता है कि वर्तमान पार्टी नेतृत्व को खतरा हो जाता। ज्योति बाबू एक वरिष्ठ सदस्य को इस तरह अपमानित करने के पक्ष में नहीं थे। मुखर्जी ने ठीक ही कहा मुझे लगा कि मेरे पिता की दूसरी बार मृत्यु हुई।
ज्योति बसु का चला जाना देश की राजनीति से एक अनुशासित, दूरअंदेश, संतुलित और दानिशमंद आदमी का चला जाना है। साहित्य जगत में भी उनकी अनुपस्थिति अनुभव की जाएगी।
ज्योति बाबू का निधन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से एक दुखद घटना है। सी पी एम में वे हरिकृष्ण सुरजीत के जाने के बाद अकेले कद्दारवर नेता बचे थे जिनके पास देश की बढ़ोत्तरी क ब्ल्यू प्रिंट था। वे समर्पित कम्यूनिस्ट होने के बावजूद समन्व्य की अनवार्यता को भी महत्त्व देते थे। ज़रूरत पड़ती थी कट्टरपन से ऊपर उठकर मानवीय पक्ष का समर्थन करने से पीछे नहीं हटते थे। यह ठीक है कि उन्होंने बंगाल का मुख्यमंत्री रहते हुए सी पी एम की नीतियों को धार दी। लेकिन नानकम्यूनिस्ट वर्ग के साथ अन्याय भी नहीं हुआ। पर वे संभवतः कम्यूनिस्ट कैडर की तरह स्वतंत्र नहीं था। कैडर का वर्चस्व रहता था। उन लोगों को लगता था कि वे कैडर की बात को ही महत्त्व देते थे। बंगाल की आर्थिक उन्नति उनके लिए सर्वोपरि थी। उसके लिए पूंजी निवेश के प्रति दुराग्रही नहीं थे। सबसे बड़ा काम उन्होंने ज़मीन के पुनर्प्रबंधन का किया जिसके कारण किसानों को लाभ पहुंचा। उसी के दम पर सी पी एम आज तक गद्दीनशीन है। पंचायतों का जनतंत्रीकरण उन्हीं के काल में हुआ। सांप्रदायिक सदभाव को मज़बूत किया। लेकिन आज जिस प्रकार की राजनीति सी पी एम नेतृत्व कर रहा है वह ज्योतिबाबू की राजनीति से काफ़ी भिन्न है। यह ठीक है कि कम्युनिस्ट पार्टीज़ की नीति उनका पालितब्यूरो नियोजित करता है। लेकिन उनका व्यक्तित्व इस तरह का था कि पालितब्यूरो भी नीति निर्धारण के समय उनके दृष्टिकोण की कदर करने के लिए बाध्य हो जाता था। देश और उनके साथ पालितब्यूरो ने उस समय खुला अन्याय किया था जब सब पार्टीज़ उनके प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थी लेकिन तत्कालीन पार्टी सचिव या कहिए पालितब्यूरो तैयार नहीं हुआ था। सारा देश सकते में आ गया था। उनके स्थान पर एक अनुभवहीन व्यक्ति के नाम छींका छूट गया था। आज भी लोग उस क्षण को कोसते हैं कि अगर ज्योति बाबू प्रधानमंत्री हो जाते देश का इतिहास ही अलग होता।
दरअसल कम्यनिस्ट पार्टी कई बार एक ऐसे बच्चे के तरह व्यवहार करतीं हैं कि सिद्धान्त के नाम पर वे अपनी पसंद नापसंद को धीरे से क्रियान्वित करके सुर्ख़ रूह बन जाती हैं। बाद में सोचती हैं कि यह गलत हुआ पर स्वीकार नहीं करतीं। यही पिछले दिनों स्पीकर के सवाल पर यही हुआ। मुखर्जी साहब को पार्टी से निकाल दिया गया सिर्फ इसलिए सब जनतंत्रों में प्रचलित परंपरा के तहत उन्होंने कहा था कि स्पीकर किसी पार्टी का सदस्य नहीं रहता। इसलिए पार्टी के संयुक्त मंच से हट जाने पर स्पीकर का त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं। जब ज्योति बाबू को प्रधानमंत्री बनने देना सिद्धान्त विरुद्ध था तो स्पीकर बनने देना कैसे सिद्धांत के अंतरर्गत आ गया। सिद्धांत क्या शक्ल बदलने के साथ बदल जाते हैं। ज्योति बाबू का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए तो लाभकर था ही पार्टी का भी कम लाभ नहीं होता। दरअसल मुखर्जी साहब वरिष्ठतम व्यक्ति थे। योग्य भी। उनके पार्टी में बने रहने से हो सकता है कि वर्तमान पार्टी नेतृत्व को खतरा हो जाता। ज्योति बाबू एक वरिष्ठ सदस्य को इस तरह अपमानित करने के पक्ष में नहीं थे। मुखर्जी ने ठीक ही कहा मुझे लगा कि मेरे पिता की दूसरी बार मृत्यु हुई।
ज्योति बसु का चला जाना देश की राजनीति से एक अनुशासित, दूरअंदेश, संतुलित और दानिशमंद आदमी का चला जाना है। साहित्य जगत में भी उनकी अनुपस्थिति अनुभव की जाएगी।
Wednesday, 13 January 2010
साहित्य अकादमी की स्वायत्तता?
देश हो या संस्था उसकी स्वायत्तता को खतरा अंदर के लोगों से होता है। या कहिए उन हां-बरदार मित्रों से होता है जो संस्था-हित से अधिक अपने स्वार्थों को ‘चिड़िया की आंख’ की तरह ताकते रहने की कुव्वत पैदा कर लेते हैं। मित्र मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि संस्था का हित चाहने वाला सदा सत्ताधारियों की नज़र में अमित्र और शत्रु ही समझा जाता है। मुझे साहित्य अकादमी में पिछले सत्र में काम करने का मौक़ा मिला था। कुछ समय तक अध्यक्ष और मेरे बीच अच्छे संबंध रहे। हालांकि वामपंथी लाबी उनके ख़िलाफ़ थी। मुझे सलाह भी दी गई कि मैं जीत गया हूं अब त्यागपत्र देकर शहीद बन जाऊं। लेकिन मैं कोशिश करता हूं कि संकटों के बावजूद मैं अपना दायित्व अंत तक निभाऊं। वही मैंने यहां भी किया। यह समस्या मेरे सामने आई आई टी कानपुर में कुलसचिव रहते हुए भी तत्कालीन निदेशक के साथ गहरे मतभेद हो जाने के वक्त भी आई थी। वे कहते थे Administration is a bulldozer. उस समय बोर्ड के चेयरमेन प्रसिद्ध उद्योगपति स्व. ललित मोहन थापर ने थापर हाउस में बुलाकर मेरे सामने नियुक्तिपत्र फेंक कर कहा था तुम एक ईमानदार आदमी हूं तुम्हारी वक़त सरकारी संस्था नहीं कर सकती इसलिए उठाओ नियुक्ति पत्र त्याग पत्र देकर मेरे यहां आ जाओ। जितना वहां पाते हो उससे दुगना मिलेगा। मैंने क्षमा मांगी तो उनकी नज़र बदल गई। आंखे तरेर कर कहा देखता हूं कैसे नौकरी करते हो। वहां बैठे अपने ही बीच के लोग शह दे रहे थे इतना बड़ी बिज़नेस टाइकून तुम्हें स्वयं बुला रहा है। तुम बदकिस्मत हो जो ठुकरा रहे हो। यहां तक कि तत्कालीन शिक्षामंत्री शीला कौल ने समझाया था रिज़ाइन करदो इतने योग्य आदमी हो कोई बड़ी जगह तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। मैंने धीरे से कहा योग्य आदमी की तो हर जग ज़रूरत होती है, आप तो मंत्री हैं आपसे मैं न्याय की उम्मीद करता था। त्यागपत्र देना तो कायरता होगी। वे उठकर चली गईं थीं। उधर जब मैं थापर साहब को मनाकर के लौटा तो संभावना के अनुरूप मुझे अगले दिन निलंबन पत्र थमा दिया गया था। खैर, ओखली, सिर और मूसल का गहरा रिश्ता है। न ओखली को डरना चाहिए न सिर को, मूसल डरेगा तो सिर को कूटेगा कैसे, कहावत कैसे चरितार्थ होगी। यही अकादमी के दौराना हुआ। साल भर बाद ही पूर्व अध्यक्ष की मनमाने निर्णयों और भाषा संबंधी भेदभाव के कारण मेरे संबंध तनावपूर्ण होते गए। जब उन्होंने दोबरा चुनाव लड़कर सचिव और बी जे पी नेताओं से मिलकर अध्यक्ष बनने का मैनुप्लेशन चालू किया तो मैंने बोर्ड में विरोध किया। उन्होंने मेरा प्रस्ताव तक रिकार्ड पर नहीं रखे। उसके और भी बहुत से कारण थे जो बाद में मौक़ा मिला तो लिखूंगा। पहले दिन जनरल काउंसिल की बैठक थी। उसमें पहली बार बी जे पी और आर एस एस समर्थकों का बहुमत था। उसमें उनके ही लोग चुने गए थे। उनका जीतना तय था। मैंने तय कर लिया मैं आखरी दम तक विरोध करूंगा। मैंने किसी तरह उच्चतम सर्किल में सब कागाज़त भिजवाए, उसक नतीजा हुआ कि उन्हें बुलाकर हिंदी में समझा दिया गया कि आप अपनी उम्मीदवारी वापिस ले लें, वरना आप जानें। अगले दिन बोर्ड की मीटिंग में उन्होंने सबसे पहले अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली। मैंने उनके खिलाफ़ एक प्रस्ताव अपने तीन मित्रों से समर्थन करने की सहमति लेकर प्रस्तुत किया लेकिन वक्त पर वे चुप रहे। सत्ता का दबदबा हिंसक जानवर की दहाड़ की तरह बाद में भी गूंजता रहता है। अध्यक्ष महोदय आरंभ में ही विड्राल की घोषणा कर चुके थे। स्वाभाविक है मेरा प्रस्ताव अन नोटिस्ड चला गया।
लेकिन उस समय कि तानाशाही से अधिक खतरनाक बात अब सामने आ रही है। सामसुंग मल्टीनेशन कंपनी के साथ समझौता हुआ है कि अकादमी 24 भाषाओं में सामसुंग की तरफ़ से भी रवीन्द्र पुरस्कार देगी। सुना है विदेश मंत्रालय के कहने पर अकादमी ने यह निर्णय लिया है। सवाल है कि क्या बोर्ड या जनरल काउंसिल की बाध्यता है कि सरकार का ऐसा प्रस्ताव माने जो उस संस्था की मूल भावना व प्रकृति के विपरीत हो? इस समय साहित्य अकादमी का पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक सम्मानित माना जाता है। किसी भी देश की अकादमी आफ लेटर्स द्वारा दिया जाना वाला सम्मान संसार भर में सम्मान से देखा जाता है। सामसुंग सम्मान की क्या स्थिति होगी? सामसुंग पुरस्कार एक मल्टीनेशल कंपनी द्वारा दिया जाने वाला प्राइवेट पुरस्कार होगा। उस पर ठप्पा साहित्य अकादेमी का लगवाकर उसे अंतर्राष्ट्रीय वेलिडिटी दिलाने की चाल मात्र लगती है। विश्व की साहित्यिक सस्थाओं के बीच आदान प्रदन का तो कोई अर्थ हो सकता है लेकिन मल्टिनेशनल कंपनी का सीधा सा उद्देश्य है इस बात का विज्ञापन कि हम तुम्हारे साहित्य का प्रचार कर रहे हैं, कल दूसरी कंपनियां यही करने को कहेंगी। साहित्य अकादेमी की देखा देखी हिंदी अकादेमी या दूसरी संस्थाएं भी इस होड़ में पड़ सकती हैं। एक और खतरा है हमारे देश में विदेशी वस्तु ज़्यादा चलती है। कल हो सकता है इस बात पर असंतोष या विवाद हो कि हमें सामसुंग सम्मान की जगह साहित्य अकादेमी पुरस्कार देकर अपमानित किया गया। हो सकता है कल सामसुंग अपने इन विजेताओं को अपने देश में काम के लिए या घूमने के लिए आमंत्रित करे तब और सिर फुटव्वल होगा। आखिर बैठे बैठाए साहित्य अकादेमी यह ख़तरा क्यों मोल ले रही है। एक व्यवसायिक मल्टीनेशनल के साहित्यिक मूल्य क्या हो सकते हैं सिवाय इसके अपने व्यवसाय में किसी सम्मानित संस्था का कैसे बाज़ारीय उपयोग किया जा सकता है। एक बार इस तरह की सम्मानित संस्था अगर किसी व्यावसायिक कंपनी के प्रचार का माध्यम बनी फिर उसकी स्वायत्तता और प्रतिष्ठा कानपुर की गंगा की धारा की तरह हो जाती है जिसमें हज़ारों टन टेनरीज़ के क्रोमियम आदि मिश्रित ज़हरीले नाले गिरकर उसकी तासीर और शक्ल बदल देते हें। अलबत्ता नाम तो गंगा ही रहता है पर आदमी आचमन करता भी डरता है। यह भी एक दृष्टिकोण है कि भाषाई लेखक कब तक कड़की में जीता रहेगा। उससे बचने के अनेक तरीके हैं। सामसुंग भी अपने पैसे से नोबेल न्यास की तरह अपनी संस्था विश्व भर की भाषाओं के लिए आरंभ कर सकता है। लेकिन एक कहावत है कि जब दूध खरीदे मिल जाए तो भैंस कौन बांधे।
अकादेमी के सचिव ने मुझे पत्र लिखकर इस वर्ष के वार्षिक उत्सव में डा. लोहिया पर आयोजित किए जाने वाले राष्ट्रीय सेमिनार में आमंत्रित किया है। जब सामसुंग को सरपरस्ती दे रहे हैं तो डा लोहिया जैसे अपना काते अपना पहनो वाले ज़मीनी चिंतक पर सेमिनार करने की क्या तुक है। जब मैंने लोहेया जी पर आलेख लिखवाने के प्रसेताव रखा था तो कर्क दिया गया था अगर उन पर लिखवाया गया तो अन्य राजनीतिज्ञों की ओर से भी दबाव पड़ेगा। मैंने ईमेल द्वारा लिखा है कि समाचार पत्रों में पढ़ा है कि अकादमी अपनी स्वायत्तता मल्टीनेशनल कंपनी को बेच रही है क्या सही है। मेरा लोहिया जी से संबंध रहा है इसलिए मैं एक दिन को आ सकता हूं। कोई जवाब नहीं आयी। बाद में फोन आया कि आप एक दिन को ही आइए। मुझे कहना पड़ा पत्र का जवाब मिलने पर निश्चित करूंगा। देश का पानी बिक गया, जंगल बिक रहे हैं, हर चीज़ आन सेल है। क्या साहित्य अकादमी जैसी संवेदनलशील संस्था जो एक ऐसे छतनार दरख्त की तरह है जिस पर देश की 24 भाषाओं के घोसले हैं, उस पर भी मल्टीनेशनल का नाग सरसराता हुआ आकर घोसला बना लेगा? और एक एक करके उन भाषाओं की रचनात्मक स्वायत्तता को चट कर जाएगा जो अपनी रचनात्मकता को निर्विघ्न जी रही हैं। राजनीतिज्ञ और नौकरशाही इस संवेदनशीलता को क्या समझें पर इतने लेखक, बड़े और छोटे, जो वहां बैठे हैं, और स्वायत्तता के कस्टोडियन हैं, वे भी क्या उतने ही असंवेदनशील हो गए हैं? यह सवाल आज सामने नहीं लेकिन जब अन्य कंपनियों का दबाव बढ़ेगा तो पता नहीं भारतीय लेखको का क्या होगा। लाजवंती को बच्चा छुए या बड़ा हर हालत में मुर्झाती है। उसको माली हो या अकादेमी जैसी संस्थाएं उन्हें वातावरण और धरती के अनुसार ध्यान रखना पड़ता है। ज़्यादा केमिकल्स का विपरीत असर हो सकता है। बल्कि होता है।
देसी रंग
हमारे भाषाई बुद्धिजीवी जिनकी बाज़ारवाद में पैठ है उन्हें केवल विदेश में ही रंग नज़र आते हैं। हमारे देश में तो हर मौसम को अलग अलग रंग सजाते हैं। पलाश जैसे गाढ़े रंग भी है, अमलतास जैसे पीले रंग पत्तों तक को अपने रंग से रंग देते हैं, कचनार के विभिन्न रंग सफेद, बैंजनी, फ़िरोज़ी जब खिलते हैं तो लगता है रंग भरी थाली बिखेर दी गई है। गर्मी में धूप की चुभन को अमलतास के रंग ऐसे राहत देते हैं जैसे आंखों में गुलाबजल डाल दिया गया हो। अमरबेल तक अपनी चुनरी रंग लेती है। चमेली, जूही, गदराया मोगरा, चांदनी सब सफ़ेद होते
लेकिन उस समय कि तानाशाही से अधिक खतरनाक बात अब सामने आ रही है। सामसुंग मल्टीनेशन कंपनी के साथ समझौता हुआ है कि अकादमी 24 भाषाओं में सामसुंग की तरफ़ से भी रवीन्द्र पुरस्कार देगी। सुना है विदेश मंत्रालय के कहने पर अकादमी ने यह निर्णय लिया है। सवाल है कि क्या बोर्ड या जनरल काउंसिल की बाध्यता है कि सरकार का ऐसा प्रस्ताव माने जो उस संस्था की मूल भावना व प्रकृति के विपरीत हो? इस समय साहित्य अकादमी का पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक सम्मानित माना जाता है। किसी भी देश की अकादमी आफ लेटर्स द्वारा दिया जाना वाला सम्मान संसार भर में सम्मान से देखा जाता है। सामसुंग सम्मान की क्या स्थिति होगी? सामसुंग पुरस्कार एक मल्टीनेशल कंपनी द्वारा दिया जाने वाला प्राइवेट पुरस्कार होगा। उस पर ठप्पा साहित्य अकादेमी का लगवाकर उसे अंतर्राष्ट्रीय वेलिडिटी दिलाने की चाल मात्र लगती है। विश्व की साहित्यिक सस्थाओं के बीच आदान प्रदन का तो कोई अर्थ हो सकता है लेकिन मल्टिनेशनल कंपनी का सीधा सा उद्देश्य है इस बात का विज्ञापन कि हम तुम्हारे साहित्य का प्रचार कर रहे हैं, कल दूसरी कंपनियां यही करने को कहेंगी। साहित्य अकादेमी की देखा देखी हिंदी अकादेमी या दूसरी संस्थाएं भी इस होड़ में पड़ सकती हैं। एक और खतरा है हमारे देश में विदेशी वस्तु ज़्यादा चलती है। कल हो सकता है इस बात पर असंतोष या विवाद हो कि हमें सामसुंग सम्मान की जगह साहित्य अकादेमी पुरस्कार देकर अपमानित किया गया। हो सकता है कल सामसुंग अपने इन विजेताओं को अपने देश में काम के लिए या घूमने के लिए आमंत्रित करे तब और सिर फुटव्वल होगा। आखिर बैठे बैठाए साहित्य अकादेमी यह ख़तरा क्यों मोल ले रही है। एक व्यवसायिक मल्टीनेशनल के साहित्यिक मूल्य क्या हो सकते हैं सिवाय इसके अपने व्यवसाय में किसी सम्मानित संस्था का कैसे बाज़ारीय उपयोग किया जा सकता है। एक बार इस तरह की सम्मानित संस्था अगर किसी व्यावसायिक कंपनी के प्रचार का माध्यम बनी फिर उसकी स्वायत्तता और प्रतिष्ठा कानपुर की गंगा की धारा की तरह हो जाती है जिसमें हज़ारों टन टेनरीज़ के क्रोमियम आदि मिश्रित ज़हरीले नाले गिरकर उसकी तासीर और शक्ल बदल देते हें। अलबत्ता नाम तो गंगा ही रहता है पर आदमी आचमन करता भी डरता है। यह भी एक दृष्टिकोण है कि भाषाई लेखक कब तक कड़की में जीता रहेगा। उससे बचने के अनेक तरीके हैं। सामसुंग भी अपने पैसे से नोबेल न्यास की तरह अपनी संस्था विश्व भर की भाषाओं के लिए आरंभ कर सकता है। लेकिन एक कहावत है कि जब दूध खरीदे मिल जाए तो भैंस कौन बांधे।
अकादेमी के सचिव ने मुझे पत्र लिखकर इस वर्ष के वार्षिक उत्सव में डा. लोहिया पर आयोजित किए जाने वाले राष्ट्रीय सेमिनार में आमंत्रित किया है। जब सामसुंग को सरपरस्ती दे रहे हैं तो डा लोहिया जैसे अपना काते अपना पहनो वाले ज़मीनी चिंतक पर सेमिनार करने की क्या तुक है। जब मैंने लोहेया जी पर आलेख लिखवाने के प्रसेताव रखा था तो कर्क दिया गया था अगर उन पर लिखवाया गया तो अन्य राजनीतिज्ञों की ओर से भी दबाव पड़ेगा। मैंने ईमेल द्वारा लिखा है कि समाचार पत्रों में पढ़ा है कि अकादमी अपनी स्वायत्तता मल्टीनेशनल कंपनी को बेच रही है क्या सही है। मेरा लोहिया जी से संबंध रहा है इसलिए मैं एक दिन को आ सकता हूं। कोई जवाब नहीं आयी। बाद में फोन आया कि आप एक दिन को ही आइए। मुझे कहना पड़ा पत्र का जवाब मिलने पर निश्चित करूंगा। देश का पानी बिक गया, जंगल बिक रहे हैं, हर चीज़ आन सेल है। क्या साहित्य अकादमी जैसी संवेदनलशील संस्था जो एक ऐसे छतनार दरख्त की तरह है जिस पर देश की 24 भाषाओं के घोसले हैं, उस पर भी मल्टीनेशनल का नाग सरसराता हुआ आकर घोसला बना लेगा? और एक एक करके उन भाषाओं की रचनात्मक स्वायत्तता को चट कर जाएगा जो अपनी रचनात्मकता को निर्विघ्न जी रही हैं। राजनीतिज्ञ और नौकरशाही इस संवेदनशीलता को क्या समझें पर इतने लेखक, बड़े और छोटे, जो वहां बैठे हैं, और स्वायत्तता के कस्टोडियन हैं, वे भी क्या उतने ही असंवेदनशील हो गए हैं? यह सवाल आज सामने नहीं लेकिन जब अन्य कंपनियों का दबाव बढ़ेगा तो पता नहीं भारतीय लेखको का क्या होगा। लाजवंती को बच्चा छुए या बड़ा हर हालत में मुर्झाती है। उसको माली हो या अकादेमी जैसी संस्थाएं उन्हें वातावरण और धरती के अनुसार ध्यान रखना पड़ता है। ज़्यादा केमिकल्स का विपरीत असर हो सकता है। बल्कि होता है।
देसी रंग
हमारे भाषाई बुद्धिजीवी जिनकी बाज़ारवाद में पैठ है उन्हें केवल विदेश में ही रंग नज़र आते हैं। हमारे देश में तो हर मौसम को अलग अलग रंग सजाते हैं। पलाश जैसे गाढ़े रंग भी है, अमलतास जैसे पीले रंग पत्तों तक को अपने रंग से रंग देते हैं, कचनार के विभिन्न रंग सफेद, बैंजनी, फ़िरोज़ी जब खिलते हैं तो लगता है रंग भरी थाली बिखेर दी गई है। गर्मी में धूप की चुभन को अमलतास के रंग ऐसे राहत देते हैं जैसे आंखों में गुलाबजल डाल दिया गया हो। अमरबेल तक अपनी चुनरी रंग लेती है। चमेली, जूही, गदराया मोगरा, चांदनी सब सफ़ेद होते
Wednesday, 2 December 2009
दिल्ली में 19 नवबर 09
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 ज़िलों के गन्ना किसानों का अद्भुत जमावाड़ा था। किसान एकता का यह प्रशंसनीय उदाहारण है। किसान एक होकर अगर खड़े हो गए होते तो जिस प्रकार ज़मीनों का अधिग्रहण होता रहा है वह नहीं होता। न ही रसूमों के ख़रीद फरोख्त के दामों में मनमानी होती। जैसे सरकारी नौकरों का डीए बढ़ाने का फ़ारमूला बना हुआ है उसी प्रकार फ़सलों की रसूमों का बाज़ार भाव के हिसाब से इनडेक्स फ़ारमूला भी निर्धारित होना चाहिए। उसी हिसाब से फ़सल के आने से पहले हर फसल के खरीद के दाम घोषित हो जाने चाहिएं। किसानों को भी मालूम रहे कि अमुक फ़ारमूले से रसूम के दाम निर्धारित होंगें। मैथमैटिकल समाधान सरकार के हित में भी होगा और किसान के हित में भी। अनिश्चितता की गुंजायश कम से कम होना दोनों के लिए ही लाभकारी होगा। सरकार को यह मालूम होना चाहिए कि किस रसूम की कितनी खपत संदर्भित वर्ष में संभावित है। उसी के अनुरूप बुवाई से पहले संभावनाएं घोषित कर दी जाएं तो किसान अपनी रसूम की पैदावार उसी के अनुसार नियोजित कर सकते हैं। किसान की अपनी अस्मिता है। ज़मीन पहले गरिमा और सम्मान की बात होती थी अब व्यवसाय का माध्यम हो गई। जिस प्रकार औद्योगिकरण के लिए ज़मीन की खरीद फ़रोख्त का सिलसिला शुरू हो चुका है वह यह संकेत करता है कि किसान के लिए भी ज़मीन करेंसी या बाज़ार में बेची खरीदी जाने वाली वस्तु में बदल गई है। ऐसा क्यों हुआ? शायद इसलिए कि हर व्यक्ति की तरह किसान के मूल्य बदल गए हैं। ज़मीन उसके लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ज्ञान को पैकेजों में बदलने की तरह अधिक से अधिक धन में बदलने का माध्यम रह गई है। नई पीढ़ी ख़ासतौर से यह मानने लगी है कि जमीन या किसानी स्टेटस सिंबल न होकर, व्यवसाय या सरकारी नौकरी अधिक सम्मानजनक है। ज़मीन के साथ उसका कोई भावनात्मक संबंध भी नहीं रह गया। प्रेमचंद ने गोदान और अन्य रचनाओं में जैसे पंचपरमेश्वर और भूलिप्सा जैसी कहानियों में गऊ और ज़मीन के प्रति किसानों की जिस भावनात्मकता का दिग्दर्शन कराया है वह अब बीते दिनों की चीज़ हो गई। अब गोदान के गोबर ही बचे हैं जो शहरों में जाकर बसना चाहते हैं या बस गए हैं। होरी विरल हैं। गुड़गांव और नोयडा आदि नगरों में जिस प्रकार बड़े किसानों ने ज़मीन बेच बेचकर ऐशो अशरत की ज़िंदगी बनाई है वह इस बात का प्रमाण है कि ज़मीन उनके लिए भावनात्मक या सम्मान की वस्तु नहीं रह गई। ज़मीन के मुआवज़े को लेकर जिस प्रकार आंदोलन होते हैं उस तरह के आंदोलन ज़मीन के अधिग्रहण के विरुद्ध नहीं होते। लालगढ़ का पूरा जन विरोध टाटा द्वारा दिए जाने वाले अपर्याप्त मुआवज़े को लेकर शुरू हुआ था। बाद में राजनीतिक मुद्दा बन गया। गाज़ियाबाद में भी अनिल अम्बानी को सेज के लिए दी गई ज़मीन को लेकर जो विराध हुआ था वह भी आर्थिक अधिक था बनिस्बत सैंद्धांतिक सवाल के। उसी सवाल पर मुलायम सिंह की सरकार इस चुनाव में चली गई थी। यही क्राइसिस तीस साल पुरानी सी पी एम सरकार के सामने है। अगर बाज़ार भाव पर मुआवज़ा दिला दिया जाता तो किसान किसी की न सुनते। उन्हें ज़मीन देने में आपत्ति नहीं थी बशर्ते के दाम मनोनुकूल मिलते। मज़े की बात है कि पूंजीपति की लड़ाई सरकारों को लड़नी पड़ती है। सरकारें पूंजीपतियों के पाले में खड़ी नज़र आने लगती हैं। लेकिन बड़े किसान भी छोटे किसानों और मज़दूरों के साथ पूंजीपतियों वाला व्यवहार करते हैं। ज़मीन कब्ज़ाने से लेकर हिस्सा बांट और मज़दूरी तक में। किसानों के नेता इस दिशा में पूरी तरह निष्क्रिय रहते हैं। यह उसे किसानों का हक़ मानते हैं। यह परंपरा ज़मीदारी जाने के बाद भी इस देश के लोगों के ख़ून में हैं। जैसे देश में जो अमीर है वह अमीर होता जा रहा है और जो गरीब वह गरीब होता जा रहा है उसी तरह किसानी में भी है।
मुझे सन् तो याद नहीं, संभवतः आज़ादी के बाद छठे दशक में कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू जी ने सोवियत यूनियन की तरह कोपरेटिव फ़ार्मिंग लागू करने का प्रस्ताव रखा था। उसका विरोध मुख्यतः दो नेताओं ने किया था चंद्रभानु गुप्ता और चौ चरण सिंह ने। गुप्ता जी ने कहा था आपने गांव नहीं देखा, किसान जान दे देगा पर अपनी ज़मीन नहीं देगा। चौ साहब ने कहा था प्रधानमंत्री भले ही देश के लाभ की बातकर रहे हों पर वे नहीं जानते किसान धरती को अपनी मां समझता है मां से बच्चे को अलग करना क्या संभव है। तब राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनतंत्र था। प्रधानमंत्री का विरोध अनुशासनहीनता नहीं मानी जाती थी। गोविंदाचार्य जैसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री का मुखौटा कहने मात्र से पार्टी से निकाल दिया गया था। जसवंत सिंह को जिन्ना पर अपनी मान्यता स्पष्ट करने पर पार्टीबदर कर दिया गया जो मात्र एक साहित्यिक कार्य था। ये सवाल संदर्भ जन्य होने के कारण यहां आ गए। तब पार्टी ने नेहरू जी का साथ न देकर इन दोनों नेताओं का समर्थन किया था। लेकिन अब किसानों और धरती के बीच का यह रिश्ता लगभग न्यूनतम हो गया। बहुत कम किसान रह गए जो ज़मीन के साथ पूर्ववत रिश्ता बनाए हैं। वह उनका अंदरूनी रिश्ता भी हो सकता है और मजबूरी का रिश्ता भी। नई पीढ़ी या तो फसल के वक्त हिस्से की रसूम लेने गांव जाती है या अच्छे दाम मिलने पर उसे बेचने का डौल बैठाने। गांधी जी ने गांवों की तरफ़ लौटने की बात चाहे हिंद स्वराज के माध्यम से कही हो या अपने जीवन का गांवों की आमदनी गावों पर ख़र्च करने के फ़लसफ़े के आधार पर, दोनों बातें इसलिए कहीं थीं कि किसान गावों से विमुख होकर शहर की तरफ़ न भागें। वे जानते थे कि अगर ऐसा हुआ तो गांव शहरों के गर्भ में समा जाएंगे। उनका देशपालक का दर्जा ख़त्म हो जाएगा। आत्म निर्भर न रह कर शहरों पर निर्भर हो जाएंगे। होना तो यह चाहिए था कि किसान नगरों का संरक्षण करते। लेकिन गांधी का यह सपना तत्कालीन और संभावित प्रधानमंत्री ने गावों के सशक्तिकरण के उनके 1945 के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि जो गांव स्वयं सांस्कृतिक अंधकार में हैं वे देश को क्या समृद्ध करेंगे। मेरा इसमें कोई विश्वास नहीं। अगर नेतृत्व जन के विश्वास को इस तरह झिंझोड़ता रहेगा है तो वह भी इस स्टेज पर, जब जन अपने नए विश्वासों और आस्थाओं के निर्माण की आरंभिक प्रक्रिया में हो तो उसके विश्वास कभी मज़बूत आधार ग्रहण नहीं कर पाएंगे। गांधी ने गावों को देश की उस आर्थिक व्यवस्था को जो सदियों से इस देश का आधार रही थी और समय की कसौटी पर खरी उतरी थी अधिक आधुनिक तरह से पुनर्निर्मित करने का सपना देखा था। औद्योगिकरण से यह आगे की बात थी। जिसमें व्यक्ति से लेकर पूरे समाज में आत्म विश्वास प्रतिरोपित करने का दीर्घकालीन सपना निहित था। उस सपने के विरूद्ध नेहरू और देश के तत्लीन नेतृत्व ने स्पात की खेती करने की योजना को क्रियान्वित करने का बीड़ा तथाकथित प्रगतिशीलता और शैतानी आधुनिक सभ्यता के दबाव में उठाया। उसे खेती का पूरक न बनाकर मुख्य आर्थिक व्यवस्था का एंकर बनाया जिसमें देश को दूसरे देशों की विशेषज्ञता और संसाधनों पर निर्भर करना अनिवार्यता बन गई थी। जब अपने संसाधनों और विशेषज्ञता यानी एक्सपर्टाइज़ पर विश्वास खत्म होने लगता है तो एक तरह का भावनात्मक अलगाव भी विकसित होने लगता है जो नई पीढ़ी में नज़र आता है उसने अपनी पीढी दर पीढी से आज़माई हुई कृषि विशेषज्ञता से मुंह मोड़ लिया। उसी का नतीजा है कि खेती जो किसान के गहरे सरोकार और संवेदना का हिस्सा थी व्यवसाय मात्र रह गई। जब रिश्ता व्यवसायिकता पर निर्भर करने लगता है तो पारस्परिकता या बिलांगिगनेस अपने और अपनों से रह जाती हो तो उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है और समाज का सम्मान भी नहीं रहता। जब किसान का लगाव ज़मीन से नहीं रहेगा तो देश की उस संपत्ति से कैसे रह सकता है जिसे वह समझता है कि वह उसकी न होकर देश की है। जैसे देश उसका न हो। भले ही उसका धन , पसीना , और जीवन उसमें लगा हो। अगर ज़मीन से उसकी और उसके परिवार की रोटी न चलती होती तो वह भी उसके लिए देश की संपत्ति से अधिक कुछ न होती जिसे वह अपने आनंद के लिए जैसे चाहे तोड़ फोड़ सकता है। यह ठीक है कि सरकारें अगर जन की समस्याओं के प्रति असंवेदनशील हों तो जन अपनी ही संपत्ति को सरकार के आधीन होने के कारण समझाता है कि उसकी अपनी संपत्ति उसकी नहीं। उसका यह सोच तर्कसंगत नहीं क्योंकि दूसरों का बदला अपना घर और सामान तोड़ कर नहीं लिया जा सकता। यह हिंसा तो है ही तर्क विहिन नभी है। अपने भाइयों बच्चों की हत्या को कब तक न्यायोचित ठहराया जा सकता है।
अभी दिल्ली में किसान आन्दोलन के दौरान ऐसा ही कुछ देखने को मिला। जंतर मंतर में घुसकर जिस प्रकार हेरिटेज को नुकसान पहुंचाया तथा शराब पीकर बोतलें वहां फेंकी गईं इससे साफ़ पता लगता है भूमि को धारण करने वाले लोग ऐसी विशिष्ठ चीज़ों को नेस्तनाबूद करने से भी नहीं छोड़ते जो सदियों से उस ज़मीन की शोभा बढ़ा रही हैं जिसके वे रहबर हैं। ऐसा इस आंदोलन में पहली बार हुआ।
सवाल यह है कि हमारे किसान नेता उनको यह क्यों नहीं बता पाए कि यह संपत्ति भी हमारे लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी तुम्हारी अपनी काश्त की ज़मीन जिसकी डौल टूट जाने पर भी खून खराबे के लिए तैयार रहते हो। उस दिन एक चैनल पर इसी सवाल को लेकर हम लोग में परिचर्चा हो रही थी उसमें बड़े किसान नेता थे लेकिन किसी ने इस सवाल को नहीं उठाया। शायद इसलिए कि उससे उनके वोट बैंक पर असर पड़ेगा। क्या इस कारण हम बच्चों को एक अच्छा नागरिक भी नहीं बनाएंगे। यह कैसी राजनीति है। मैं जानता हूं यह हर आंदोलन का हश्र होता है। नेता उसे जन आक्रोश कहकर निश्चिन्त हो जाते हैं। जन आक्रोश कह देने मात्र से देश नहीं बचेगा। यह तोड़ फोड़ हिंसा भी है और देश की संपत्ति का संहार भी है। गर्म ख़ून का उपयोग अगर रचनात्मकता के काम में जोश भरने में हो तो शायद हम अघिक सुखी हो पाएं। कब तक तोड़ तोड़ कर बनाएंगें। चौरी चौरा में शांतिप्रिय आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने भारतीय सिपाहियों की हत्या कर दी थी। गांधी ने सफल होते आंदोलन को वापिस ले लिया था उसके लिए उन पर आरोप दर आरोप लगाए गए थे। वे इसिलिए नहीं झुके थे कि हर अहिंसात्मक आंदोलन की नियति हिंसा होगी। अब हमारे सामने आर्थिक लाभ मुख्य है, साधनों की पवित्रता गौण है । सत्यागृह और आंदोलन तो हमने ले लिया लेकिन उसकी निष्ठा और साधनों की पवित्रता को कलुषित कर दिया। हमारे देश का नेतृत्व चाहे वह किसी भी पार्टी का हो अपने क्षणिक और अस्थायी लाभों के लिए देश की अस्मिता और संवेदना का खुला सौदा अराजकता के साथ कर रहे हैं, देखिए इन हालात में देश कब तक सही सलामत रहता है।
मुझे सन् तो याद नहीं, संभवतः आज़ादी के बाद छठे दशक में कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू जी ने सोवियत यूनियन की तरह कोपरेटिव फ़ार्मिंग लागू करने का प्रस्ताव रखा था। उसका विरोध मुख्यतः दो नेताओं ने किया था चंद्रभानु गुप्ता और चौ चरण सिंह ने। गुप्ता जी ने कहा था आपने गांव नहीं देखा, किसान जान दे देगा पर अपनी ज़मीन नहीं देगा। चौ साहब ने कहा था प्रधानमंत्री भले ही देश के लाभ की बातकर रहे हों पर वे नहीं जानते किसान धरती को अपनी मां समझता है मां से बच्चे को अलग करना क्या संभव है। तब राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनतंत्र था। प्रधानमंत्री का विरोध अनुशासनहीनता नहीं मानी जाती थी। गोविंदाचार्य जैसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री का मुखौटा कहने मात्र से पार्टी से निकाल दिया गया था। जसवंत सिंह को जिन्ना पर अपनी मान्यता स्पष्ट करने पर पार्टीबदर कर दिया गया जो मात्र एक साहित्यिक कार्य था। ये सवाल संदर्भ जन्य होने के कारण यहां आ गए। तब पार्टी ने नेहरू जी का साथ न देकर इन दोनों नेताओं का समर्थन किया था। लेकिन अब किसानों और धरती के बीच का यह रिश्ता लगभग न्यूनतम हो गया। बहुत कम किसान रह गए जो ज़मीन के साथ पूर्ववत रिश्ता बनाए हैं। वह उनका अंदरूनी रिश्ता भी हो सकता है और मजबूरी का रिश्ता भी। नई पीढ़ी या तो फसल के वक्त हिस्से की रसूम लेने गांव जाती है या अच्छे दाम मिलने पर उसे बेचने का डौल बैठाने। गांधी जी ने गांवों की तरफ़ लौटने की बात चाहे हिंद स्वराज के माध्यम से कही हो या अपने जीवन का गांवों की आमदनी गावों पर ख़र्च करने के फ़लसफ़े के आधार पर, दोनों बातें इसलिए कहीं थीं कि किसान गावों से विमुख होकर शहर की तरफ़ न भागें। वे जानते थे कि अगर ऐसा हुआ तो गांव शहरों के गर्भ में समा जाएंगे। उनका देशपालक का दर्जा ख़त्म हो जाएगा। आत्म निर्भर न रह कर शहरों पर निर्भर हो जाएंगे। होना तो यह चाहिए था कि किसान नगरों का संरक्षण करते। लेकिन गांधी का यह सपना तत्कालीन और संभावित प्रधानमंत्री ने गावों के सशक्तिकरण के उनके 1945 के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि जो गांव स्वयं सांस्कृतिक अंधकार में हैं वे देश को क्या समृद्ध करेंगे। मेरा इसमें कोई विश्वास नहीं। अगर नेतृत्व जन के विश्वास को इस तरह झिंझोड़ता रहेगा है तो वह भी इस स्टेज पर, जब जन अपने नए विश्वासों और आस्थाओं के निर्माण की आरंभिक प्रक्रिया में हो तो उसके विश्वास कभी मज़बूत आधार ग्रहण नहीं कर पाएंगे। गांधी ने गावों को देश की उस आर्थिक व्यवस्था को जो सदियों से इस देश का आधार रही थी और समय की कसौटी पर खरी उतरी थी अधिक आधुनिक तरह से पुनर्निर्मित करने का सपना देखा था। औद्योगिकरण से यह आगे की बात थी। जिसमें व्यक्ति से लेकर पूरे समाज में आत्म विश्वास प्रतिरोपित करने का दीर्घकालीन सपना निहित था। उस सपने के विरूद्ध नेहरू और देश के तत्लीन नेतृत्व ने स्पात की खेती करने की योजना को क्रियान्वित करने का बीड़ा तथाकथित प्रगतिशीलता और शैतानी आधुनिक सभ्यता के दबाव में उठाया। उसे खेती का पूरक न बनाकर मुख्य आर्थिक व्यवस्था का एंकर बनाया जिसमें देश को दूसरे देशों की विशेषज्ञता और संसाधनों पर निर्भर करना अनिवार्यता बन गई थी। जब अपने संसाधनों और विशेषज्ञता यानी एक्सपर्टाइज़ पर विश्वास खत्म होने लगता है तो एक तरह का भावनात्मक अलगाव भी विकसित होने लगता है जो नई पीढ़ी में नज़र आता है उसने अपनी पीढी दर पीढी से आज़माई हुई कृषि विशेषज्ञता से मुंह मोड़ लिया। उसी का नतीजा है कि खेती जो किसान के गहरे सरोकार और संवेदना का हिस्सा थी व्यवसाय मात्र रह गई। जब रिश्ता व्यवसायिकता पर निर्भर करने लगता है तो पारस्परिकता या बिलांगिगनेस अपने और अपनों से रह जाती हो तो उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है और समाज का सम्मान भी नहीं रहता। जब किसान का लगाव ज़मीन से नहीं रहेगा तो देश की उस संपत्ति से कैसे रह सकता है जिसे वह समझता है कि वह उसकी न होकर देश की है। जैसे देश उसका न हो। भले ही उसका धन , पसीना , और जीवन उसमें लगा हो। अगर ज़मीन से उसकी और उसके परिवार की रोटी न चलती होती तो वह भी उसके लिए देश की संपत्ति से अधिक कुछ न होती जिसे वह अपने आनंद के लिए जैसे चाहे तोड़ फोड़ सकता है। यह ठीक है कि सरकारें अगर जन की समस्याओं के प्रति असंवेदनशील हों तो जन अपनी ही संपत्ति को सरकार के आधीन होने के कारण समझाता है कि उसकी अपनी संपत्ति उसकी नहीं। उसका यह सोच तर्कसंगत नहीं क्योंकि दूसरों का बदला अपना घर और सामान तोड़ कर नहीं लिया जा सकता। यह हिंसा तो है ही तर्क विहिन नभी है। अपने भाइयों बच्चों की हत्या को कब तक न्यायोचित ठहराया जा सकता है।
अभी दिल्ली में किसान आन्दोलन के दौरान ऐसा ही कुछ देखने को मिला। जंतर मंतर में घुसकर जिस प्रकार हेरिटेज को नुकसान पहुंचाया तथा शराब पीकर बोतलें वहां फेंकी गईं इससे साफ़ पता लगता है भूमि को धारण करने वाले लोग ऐसी विशिष्ठ चीज़ों को नेस्तनाबूद करने से भी नहीं छोड़ते जो सदियों से उस ज़मीन की शोभा बढ़ा रही हैं जिसके वे रहबर हैं। ऐसा इस आंदोलन में पहली बार हुआ।
सवाल यह है कि हमारे किसान नेता उनको यह क्यों नहीं बता पाए कि यह संपत्ति भी हमारे लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी तुम्हारी अपनी काश्त की ज़मीन जिसकी डौल टूट जाने पर भी खून खराबे के लिए तैयार रहते हो। उस दिन एक चैनल पर इसी सवाल को लेकर हम लोग में परिचर्चा हो रही थी उसमें बड़े किसान नेता थे लेकिन किसी ने इस सवाल को नहीं उठाया। शायद इसलिए कि उससे उनके वोट बैंक पर असर पड़ेगा। क्या इस कारण हम बच्चों को एक अच्छा नागरिक भी नहीं बनाएंगे। यह कैसी राजनीति है। मैं जानता हूं यह हर आंदोलन का हश्र होता है। नेता उसे जन आक्रोश कहकर निश्चिन्त हो जाते हैं। जन आक्रोश कह देने मात्र से देश नहीं बचेगा। यह तोड़ फोड़ हिंसा भी है और देश की संपत्ति का संहार भी है। गर्म ख़ून का उपयोग अगर रचनात्मकता के काम में जोश भरने में हो तो शायद हम अघिक सुखी हो पाएं। कब तक तोड़ तोड़ कर बनाएंगें। चौरी चौरा में शांतिप्रिय आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने भारतीय सिपाहियों की हत्या कर दी थी। गांधी ने सफल होते आंदोलन को वापिस ले लिया था उसके लिए उन पर आरोप दर आरोप लगाए गए थे। वे इसिलिए नहीं झुके थे कि हर अहिंसात्मक आंदोलन की नियति हिंसा होगी। अब हमारे सामने आर्थिक लाभ मुख्य है, साधनों की पवित्रता गौण है । सत्यागृह और आंदोलन तो हमने ले लिया लेकिन उसकी निष्ठा और साधनों की पवित्रता को कलुषित कर दिया। हमारे देश का नेतृत्व चाहे वह किसी भी पार्टी का हो अपने क्षणिक और अस्थायी लाभों के लिए देश की अस्मिता और संवेदना का खुला सौदा अराजकता के साथ कर रहे हैं, देखिए इन हालात में देश कब तक सही सलामत रहता है।
Tuesday, 10 November 2009
कहां है संविधान और कहां है जनतंत्र?
मैं संविधान और जनतंत्र की बात क्यों कर रहा हूं? फिर सोचता हूं सब ही कर रहे हैं तो मैं भी कर रहा हूं तो क्या गुनाह कर रहा हूं? जब संज्ञाएं और शब्द अर्थ खो देते हैं तो उनका कोई महत्त्व नहीं रहता। ऐसे में अर्थहीन शब्द बोलना गुनाह नहीं रहता। जब किसी भाषा का कोई महत्त्व नहीं रहता तो शब्दों का ही क्या मतलब रह जाता है। भाषा से भले ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी न बनें पर साहित्य, इतिहास, समाजविज्ञान के मूल में भाषा ही होती है। संविधान की भी भाषा ही है। उसमें सब भारतीय भाषाओं को समान माना। हिंदी और अंग्रेज़ी को संपर्क भाषाएं मान लिया गया। एक साज़िश की गई कि हिंदी राज भाषा बना दी गई। दोनों भाषाएं, एक विदेशी भाषा और वह भाषा जिसमें आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी एक नाव में सवार हो गई। हिंदी राजभाषा बनाकर दूसरी भाषाओं की आंख की किरकिरी बना दी गई। यह भाषाओं को बांटने की सोची समझी राजनीतिक साज़िश थी। उसका विकृत नतीजा 9 नवंबर 09 को महाराष्ट्र की विधान सभा में देखने को मिला। यह संविधान का सम्मान है या विधान सभा का या आदमियत का? अब इस सवाल को राजनीतिज्ञ ही सुलझाएंगे। इसे न बुद्धीजीवी सुलझा सकते हैं और न साधु संत और न विधिवेत्ता। जिन्होंने यह अवलेह घोटा है उन्हें ही चखना पड़ेगा। तीन क्या चार भाषाओं में शपथ ली गई। मराठी में, संस्कृत में, हिंदी में और अंग्रजी में। मराठी में तो ली जानी थी। एक तो मनसा के अध्यक्ष राज ठाकरे का तानाशाही हुक्मनामा, दूसरे राज्य की भाषा। हुक्म डराने वाला था कि मराठी में शपथ न लेने पर दंडित किया जाएगा। तुम कौन, जन प्रतिनिधियों के नाम संविधान विरोधी हुक्मनामा जारी करने वाले? आप अपील करते तो भी एक बात थी। ऐसा करना भी अधिकार के बाहर की बात थी। एक बाहरी आदमी का सदन के चुने गए सदस्यों को हुक्म जारी करना सदन और अध्यक्ष की अवमानना है। दुसरे संविधान में किसी भी भाषा में शपथ लेने की दी गई छूट और संवैधानिक अधिकार में ख़लअंदाज़ी है। यह नया तानाशाह पिछले सप्ताह भर से संविधान विरोधी आदेशों की बरसात कर रहा था लेकिन न तो सरकार ने इसका वरोध किया और न इस असंवैधिनक स्वयंभू तानाशाह के खिलाफ़ कानूनी कार्यवाही की गई। दो ही बातें हो सकती हैं या तो सरकार डरती है या फिर तरह दे रही थी। गैरकानूनी काम के खिलाफ़ तत्काल कार्यवाही न करना उसे वैधता देना है। अराजकता पैदा करना है। सपा के चुने हुए सदस्य अबु आज़मी का यह अधिकार था कि वह किसी भी भाषा में शपथ ले। उन्होंने इस अधिकार का उपयोग किया। वैसे भी अपने को लोहिया जी का अनुयायी मानने वाला व्यक्ति अपने नेता का भाषा वाले निर्देश का पालन उसी पकार कर रहा था जिस प्रकार मनसा के आततायी सदस्यों ने राज ठाकरे के निराधार और असंवैधानिक आदेश का पालन किया।
आप यानी ठाकरे परिवार हिंदी से क्यों नाराज़ है? राज ठाकरे तो ज़हर घोले बैठा है,हिंदी के खिलाफ़ भी और हिंदी वालों के खिलाफ़ भी। जबकि देवनागरी यानी लिपि को बहुत अच्छी तरह मराठी ने अपनाई है। शायद इसीलिए कि मराठी और हिंदी भाषियों की डोर दोनों को बांधे रहेगी। पराडकर जी ने हिंदी पत्रकारिता को परवान चढ़ाया। दरअसल हिंदी के समर्थक अहिंदी भाषी ही रहे, गांधी, तिलक, और स्वामी दयानंद से लेकर पराडकर जी तक। इस बार अंग्रेज़ी में शपथ ली गई तो मनसा के गुंडे कहूं या महान प्रदेश भक्त क्यों नहीं बोले, क्या वह मराठी की सगी थी? संस्कृत में ली गई। वह मराठी नहीं थी। सिर्फ हिंदी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि मनसा के सदस्यों ने सम्मानित राजनीति पार्टी के सम्मानित सदस्य को पीटा। राज ठाकरे जी , मैं आपके नाम के आगे जी इस लिए लगा रहा हूं कि आप एक पार्टी के नेता हैं। नहीं तो शायद नाम भी न लेता। मराठी गुंडा कहना मुझे गवारा नहीं हुआ। आप आइए उत्तर प्रदेश में देखिए मराठी कितने सम्मान के साथ रखे जाते हैं। शिक्षा संस्थाओं में अध्यापक ही नहीं प्रचार्य भी बड़ी संख्यां में हैं। इसलिए नहीं के बहुत योग्य हैं बल्कि इसलिए स्थानीय लोगों के साथ वे घुल मिल गए हैं। आई आई टी कानपुर के पहले निदेशक मराठी थे। उन्होंने उन लोगों के अधिकार को नज़रअंदाज़ करके जिनकी ज़मीने आई आई टी बसाने के लिए ली गई थीं, मराठियों का नौकरियांदीं। लेकिन कभी स्थानीय लोगों ने उफ़ नहीं की। आपके यहां जब टैक्सी चलीं तो उच्च वर्गीय मराठियों को स्वयं चलाना गवारा नहीं हुआ। वे उत्तर भारत से ड्राइवर ले गए। जब उन्होंने स्वयं अपनी बना ली तो मुंबई के मानुस की भृकुटि तन गई। आजकल आई आई टी कानपुर के निदेशक भी मराठी हैं। यही नहीं दूसरी बार हुए हैं। रजिस्ट्रार भी मराठी मानुस है। लेकिन किसी के ज़ायके में कोई फ़र्क नहीं। अगर आपकी तरह सोचने लगें तो इतने बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग कैसा अनुभव करेंगे। यही दूसरे प्रदेशों में भी होगा। हिंदुस्तान मानवीय रिश्तों का सम्मान करना जानता है। उत्तर भारत तो ख़ासतौर से। दक्षिण और देश के अन्य भागों में विज्ञान की पी जी स्तर की शिक्षा की कम संस्थाएं थीं। सब जगह से बच्चे कानपुर लखनऊ आदि बड़े शहरों में पढ़ने आते थे। यही मेडिकल शिक्षा की स्थिति थी। कभी किसी ने न भाषा का सवाल उठाया और न परदेसी होने का, जो आप उठा रहे हैं। श्रीमन्, आप नहीं जानते, जानते हैं तो समझना नहीं चाहते कि देश को अलगाववाद की किस आग में झोंक रहे हैं। राजनीतिज्ञ तो अपनी रोटी सेक लेता है आम आदमी का चूल्हा भी नहीं सुलगता। अब ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिज्ञों से बड़े स्वार्थी इन्द्र भी नहीं। क्षमा करें गांधी ने तो संसद को ही वेश्या बताया था हमारे राजनीतिज्ञों ने तो जनतंत्र को भी उसी पैराय पर ला खड़ा किया। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल में उनकी भाषा को पशेमान किया था। बंगला-वंगला कुछ नहीं उर्दू सब कुछ है। राज साहब भी उसी रास्ते पर हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा वह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन मनसा ने यह सोचे समझे बिना चिंगारी फेंक दी कि जो तरह देंगे वे तक हाथ जला बैठेंगे। तटस्थ रहेंगे तो मौजे ए तलातुम उनको भी नहीं बक्शेगी।
ईस्ट इंडिया द्वारा पेशवाओं को पुणे से निकाल दिए जाने पर उत्तर भारत ने ही उनकी पेशवाई की इज़्जत बचाई थी। उत्तर भारत के लोगों ने ही उनका साथ दिया था। आज भी बिठुर के खंडहर पेशावाओं पर गोरों के प्रकोप की गवाही दे रहे हैं। वहीं उन सबकी याद को नानाराव पार्क, मैसेकर घाट यानी नानाराव घाट, तात्या टोपे के स्मारक उनका परिवार उन सबकी याद ताज़ा कराते हैं। वे माहराष्ट्र से अधिक उत्तर भारत के पुरखे हैं। कई मराठी धुलेकर जी आदि सम्मानीय जननेता रहे हैं। वे सब मराठी भी बोलते थे हिंदी भी बोलते थे। आज भी उत्तर भात में रहने वाले मराठी दोनों भाषाएं बोलते हैं। कोई नहीं कहता हिन्दी ही बोलिए। वे सम्मान से ही नहीं रह रहे रोज़ीरोटी भी कमा रहे हैं। महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीयों की तरह उन पर किसी तरह की न बंदिश है न संकट है। न होना चाहिए। बाल ठाकरे का यह इलज़ाम कि अब्बु आज़मी को हिंदी में शपथ लेने से रोका नहीं गया निहायत अपरिपक्व है। लगता है कि वाक़ई खून पानी से अधिक गाढ़ा होता है। भतीजे और भाषा का पक्ष लेना संविधान के सम्मान से अधिक ज़रूरी है। ताज्जुब की बात है कि अंग्रेज़ी में शपथ लेनेवालों के लिए इस वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने कुछ नहीं कहा कि उससे महाराष्ट्र और मराठी की अवमानना नहीं हुई, शायद सम्मान बढ़ा। जिन पेशावाओं को अंग्रेज़ों ने बेइज़्जत किया हिंदी वालों ने उनका साथ दिया वह हिंदी शिवसेना और मनसा की दुश्मन है और अंग्रेज़ी सगी। भाषा कोई गैर नहीं होती न उसके प्रवाह को रोका जा सकता है। ठाकरे साहबान, इंसान से अधिक भाषाएं आपस में लेन देन करती हैं। हम जितने संकुचित और छोटे दिलों के हैं भाषाएं कहीं ज्यादा फ़राख़दिल हैं। एक ज़माना था जब ब्रिटिश संसद में अंग्रेज़ी बोलने वालों पर मनसा की तरह फ्रांसिसी भाषा प्रेमी मनसा की तरह आक्रमण करके हाथ पैर तोड़ देते थे। लेकिन क्या वे अंग्रेज़ी का कुछ बिगाड़ पाए। भाषा अपना रास्ता बनाने के साथ साथ अपने रास्ते के अवरोध भी स्वयं हटाती है। हिंदी भी यही कर रही है अपनी बहनों का सम्मान रखते हुए आगे बढ़ रही है। हिंदी का लिपि के कारण दामन चोली का साथ है। दामन उतारोगे तो बेपर्दगी होगी, चोली उतारोगे तो शर्मज़दा होगे।
आप यानी ठाकरे परिवार हिंदी से क्यों नाराज़ है? राज ठाकरे तो ज़हर घोले बैठा है,हिंदी के खिलाफ़ भी और हिंदी वालों के खिलाफ़ भी। जबकि देवनागरी यानी लिपि को बहुत अच्छी तरह मराठी ने अपनाई है। शायद इसीलिए कि मराठी और हिंदी भाषियों की डोर दोनों को बांधे रहेगी। पराडकर जी ने हिंदी पत्रकारिता को परवान चढ़ाया। दरअसल हिंदी के समर्थक अहिंदी भाषी ही रहे, गांधी, तिलक, और स्वामी दयानंद से लेकर पराडकर जी तक। इस बार अंग्रेज़ी में शपथ ली गई तो मनसा के गुंडे कहूं या महान प्रदेश भक्त क्यों नहीं बोले, क्या वह मराठी की सगी थी? संस्कृत में ली गई। वह मराठी नहीं थी। सिर्फ हिंदी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि मनसा के सदस्यों ने सम्मानित राजनीति पार्टी के सम्मानित सदस्य को पीटा। राज ठाकरे जी , मैं आपके नाम के आगे जी इस लिए लगा रहा हूं कि आप एक पार्टी के नेता हैं। नहीं तो शायद नाम भी न लेता। मराठी गुंडा कहना मुझे गवारा नहीं हुआ। आप आइए उत्तर प्रदेश में देखिए मराठी कितने सम्मान के साथ रखे जाते हैं। शिक्षा संस्थाओं में अध्यापक ही नहीं प्रचार्य भी बड़ी संख्यां में हैं। इसलिए नहीं के बहुत योग्य हैं बल्कि इसलिए स्थानीय लोगों के साथ वे घुल मिल गए हैं। आई आई टी कानपुर के पहले निदेशक मराठी थे। उन्होंने उन लोगों के अधिकार को नज़रअंदाज़ करके जिनकी ज़मीने आई आई टी बसाने के लिए ली गई थीं, मराठियों का नौकरियांदीं। लेकिन कभी स्थानीय लोगों ने उफ़ नहीं की। आपके यहां जब टैक्सी चलीं तो उच्च वर्गीय मराठियों को स्वयं चलाना गवारा नहीं हुआ। वे उत्तर भारत से ड्राइवर ले गए। जब उन्होंने स्वयं अपनी बना ली तो मुंबई के मानुस की भृकुटि तन गई। आजकल आई आई टी कानपुर के निदेशक भी मराठी हैं। यही नहीं दूसरी बार हुए हैं। रजिस्ट्रार भी मराठी मानुस है। लेकिन किसी के ज़ायके में कोई फ़र्क नहीं। अगर आपकी तरह सोचने लगें तो इतने बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग कैसा अनुभव करेंगे। यही दूसरे प्रदेशों में भी होगा। हिंदुस्तान मानवीय रिश्तों का सम्मान करना जानता है। उत्तर भारत तो ख़ासतौर से। दक्षिण और देश के अन्य भागों में विज्ञान की पी जी स्तर की शिक्षा की कम संस्थाएं थीं। सब जगह से बच्चे कानपुर लखनऊ आदि बड़े शहरों में पढ़ने आते थे। यही मेडिकल शिक्षा की स्थिति थी। कभी किसी ने न भाषा का सवाल उठाया और न परदेसी होने का, जो आप उठा रहे हैं। श्रीमन्, आप नहीं जानते, जानते हैं तो समझना नहीं चाहते कि देश को अलगाववाद की किस आग में झोंक रहे हैं। राजनीतिज्ञ तो अपनी रोटी सेक लेता है आम आदमी का चूल्हा भी नहीं सुलगता। अब ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिज्ञों से बड़े स्वार्थी इन्द्र भी नहीं। क्षमा करें गांधी ने तो संसद को ही वेश्या बताया था हमारे राजनीतिज्ञों ने तो जनतंत्र को भी उसी पैराय पर ला खड़ा किया। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल में उनकी भाषा को पशेमान किया था। बंगला-वंगला कुछ नहीं उर्दू सब कुछ है। राज साहब भी उसी रास्ते पर हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा वह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन मनसा ने यह सोचे समझे बिना चिंगारी फेंक दी कि जो तरह देंगे वे तक हाथ जला बैठेंगे। तटस्थ रहेंगे तो मौजे ए तलातुम उनको भी नहीं बक्शेगी।
ईस्ट इंडिया द्वारा पेशवाओं को पुणे से निकाल दिए जाने पर उत्तर भारत ने ही उनकी पेशवाई की इज़्जत बचाई थी। उत्तर भारत के लोगों ने ही उनका साथ दिया था। आज भी बिठुर के खंडहर पेशावाओं पर गोरों के प्रकोप की गवाही दे रहे हैं। वहीं उन सबकी याद को नानाराव पार्क, मैसेकर घाट यानी नानाराव घाट, तात्या टोपे के स्मारक उनका परिवार उन सबकी याद ताज़ा कराते हैं। वे माहराष्ट्र से अधिक उत्तर भारत के पुरखे हैं। कई मराठी धुलेकर जी आदि सम्मानीय जननेता रहे हैं। वे सब मराठी भी बोलते थे हिंदी भी बोलते थे। आज भी उत्तर भात में रहने वाले मराठी दोनों भाषाएं बोलते हैं। कोई नहीं कहता हिन्दी ही बोलिए। वे सम्मान से ही नहीं रह रहे रोज़ीरोटी भी कमा रहे हैं। महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीयों की तरह उन पर किसी तरह की न बंदिश है न संकट है। न होना चाहिए। बाल ठाकरे का यह इलज़ाम कि अब्बु आज़मी को हिंदी में शपथ लेने से रोका नहीं गया निहायत अपरिपक्व है। लगता है कि वाक़ई खून पानी से अधिक गाढ़ा होता है। भतीजे और भाषा का पक्ष लेना संविधान के सम्मान से अधिक ज़रूरी है। ताज्जुब की बात है कि अंग्रेज़ी में शपथ लेनेवालों के लिए इस वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने कुछ नहीं कहा कि उससे महाराष्ट्र और मराठी की अवमानना नहीं हुई, शायद सम्मान बढ़ा। जिन पेशावाओं को अंग्रेज़ों ने बेइज़्जत किया हिंदी वालों ने उनका साथ दिया वह हिंदी शिवसेना और मनसा की दुश्मन है और अंग्रेज़ी सगी। भाषा कोई गैर नहीं होती न उसके प्रवाह को रोका जा सकता है। ठाकरे साहबान, इंसान से अधिक भाषाएं आपस में लेन देन करती हैं। हम जितने संकुचित और छोटे दिलों के हैं भाषाएं कहीं ज्यादा फ़राख़दिल हैं। एक ज़माना था जब ब्रिटिश संसद में अंग्रेज़ी बोलने वालों पर मनसा की तरह फ्रांसिसी भाषा प्रेमी मनसा की तरह आक्रमण करके हाथ पैर तोड़ देते थे। लेकिन क्या वे अंग्रेज़ी का कुछ बिगाड़ पाए। भाषा अपना रास्ता बनाने के साथ साथ अपने रास्ते के अवरोध भी स्वयं हटाती है। हिंदी भी यही कर रही है अपनी बहनों का सम्मान रखते हुए आगे बढ़ रही है। हिंदी का लिपि के कारण दामन चोली का साथ है। दामन उतारोगे तो बेपर्दगी होगी, चोली उतारोगे तो शर्मज़दा होगे।
Friday, 6 November 2009
प्रभाष जोशी हिंदी के अंतिम समर्पित सेनानी
आज सवेरे हिंदुस्तान दैनिक के पहले पृष्ठ पर सूचना देखी तो सन्न रह गया प्रभाष जी चुपके से निकल गए। मुझसे एक साल छोटे थे। पहले मैं उन्हें अपने से बड़ा ही समझता था। जब यह राज़ खुला कि मैं उनसे एक साल बड़ा हूं तो वे बोले अब मैं तुम्हें प्रणाम किया करूंगा। इस बात को उन्होंने कुछ दिन पहले तक निभाया। हिंद स्वराज पर मेरी पुस्तक सस्ता साहित्य मंडल से आई तो मैंनें उन्हें बताने के लिए फ़ोन किया तो उन्होंने प्रणाम करने वाली रिवायत को निभाया। जब वे प्रणाम कहते थे मुझे संकोच होता था। मैंने बेकार ही बताया कि मैं उनसे एक साल बड़ा हूं। दरअसल पहला गिरिमिटिया पर जनसत्ता में बहुत उन्होंने आत्मीय ढंग से समृद्ध लेख लिखा था। लेकिन दलित विमर्श-संदर्भ गांधी पढ़कर स्पष्ट कहा था दलित विमर्श के लिए गांधी को जस्टिफ़िकेशन की ज़रूरत नहीं है। उनमें साफ़ कहने की अद्भुत शक्ति थी। उन्होंने सोनिया गांधी को हिंद स्वराज पढ़ने की सलाह दी थी।
मेरी उनसे तब मुलाकात हुई थी जब वे अज्ञेय जी के साथ एवरीमेन में काम करते थे। जहां तक मुझे याद है तब वे बुशर्ट पैंट भी पहनते थे। बाद में उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखना पढ़ना लगभग छोड़ दिया। दूसरी बार मैं उनसे राजेन्द्र यादव के साथ इंडियन एक्सप्रेस की बिल्डिंग में मिला था। उन्होंने लिखी कागद कोरे की प्रति भी भेंट की थी। हालांकि उन दिनों मैं फ्री लेंसिंग कर रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा ‘आप कहानी उपन्यास के सिवाय भी कुछ और लिखते हैं?’
मैंने कहा ‘नाटक भी लिख लेता हूं।‘
‘नहीं, मेरा मतलब है अखबारं के लिए भी लिखते हैं।‘ मैंने गर्दन हिला दी। वे चुप रहकर बोले।
‘आपके मित्र तो बड़े लेखक हैं। इन्हें तो जनरलिस्टिक लेखन छोटा काम लगता है। लेकिन एक लेखक को समसामयिक विषयों पर ज़रूर लिखना चाहिए। इससे एक तो अपने सरोकारों का पता चलता है दूसरे देश की हालत और समस्याओं से दो चार होने का अवसर मिलता है।‘ यह बात मुझे रघुवीर सहाय भी कहते थे। लेकिन जिस तरह उन्होंने कहा उसमें एक तरह की पकड़ थी। हो सकता उसके पीछे यह भी मंशा रही हो कि यह आदमी फ्री लेंसिग कर रहा है अगर यह अखबारों मे लिखेगा तो आर्थिक मदद भी मिल जाएगी। या केवल एक लेखक को जरनेलिस्टिक लेखन की तरफ़ आकर्षित करने का तरीका था। मेरे मामा 1920 में जब आक्सफोर्ड लंदन से एम ए करके आए तो गांधी जी का संदेश मिला। बापू बंबई में ही थे। वे उनसे मिलने गए। बापू ने सीधे सवाल किया ‘तुम आज़ादी से सरोकार रखते हो या गुलामी की सुख सुविधा से?’
वे कुछ देर समझ नहीं पाए सवाल का मर्म क्या है। बापू काम करते रहे। कुछ देर बाद पूछा क्या सोचा। उनके मुहं से अनायास निकला –आज़ादी। हालंकि इन दोनों घटनाओं में कोई साम्य नहीं था। लेकिन एकाएक उस घटना का ध्यान आ गया था, पर मैं बोला नहीं। कुछ महीने बाद जब मैं उनसे मिलने गया तो वे बोले आपने क्या सोचा। मैंने एक लेख निकालकर उनके सामने रख दिया। जहां तक मुझे याद है वह भाषा के संदर्भ में था। उन्होंने अल्टा पल्टा और पी ए को बुलाकर कहा यह जाएगा। किसी काम का इतना जल्दी नतीजा पहली बार मिला था। हो सकता है यह उनका प्रोत्साहित करने का तरीका रहा हो।
प्रभाष जी ने चंद दिनों पहले मुझसे फ़ोन पर कहा था। मैंने कलकत्ता संस्कृति संसद वालों से कहा है कि जब पहला गिरमिटिया जैसे बड़े उपन्यास के लेखक आ रहे हैं तो 15 नवंबर को होने वाले हिंद स्वराज की गोष्ठी की वही अध्यक्षता करेंगे। कुछ ही देर बाद सचिव रत्नशाह जी का फ़ोन आ गया। हम भले ही कम मिलते हों पर उन्हें सदा गांधी के संदर्भ में मेरी याद रहती थी। जब मेरा उपन्यास छपा तो उन्होंने मुझे फ़ोन किया आपको पटना चलना है और गिरमिटिया पर बोलना है। मैं दिल्ली से आऊंगा आप कानपुर अमुक गाड़ी पर मिलें। मैं जाम के कारण वक्त के वक्त स्टेशन पहुंचा। वे इंतज़ार में टहल रहे थे। बिस्तर लगा तैयार था। जैसी आडियंस वहां मिली वैसी कहीं और नहीं मिली। शिवानंद जी तो थे ही। लालू जी से भी पहली बार उन्होंने ही भेंट कराई। मुझे विचित्र अनुभव हो रहा है हिंदी और गांधी के प्रति समर्पित ऐसा जुझारू योद्धा अब कौन मिलेगा। उनके दम से मुझे दम था। कोई पत्रकार आज हिंदी में ऐसा नहीं जो हिंदी के सवाल को जन्म मरण का सवाल समझता हो। अधिकतर हिंदी के पत्रकार हिंग्लिश के पत्रकार हैं। उन्हीं का दम था कि जनसत्ता को उन्होंने हिंदी का शीर्ष पत्र बना दिया था। आज भी हिंदी के अख़बारों में जनसत्ता को ही बौद्धिक सम्मान प्राप्त है। यह ठीक है कि तीसरे नंबर पर वे क्रिकेट के शैदाई थे। उन्होंने जनसत्ता के बाद कोई दूसरा अखबार नहीं पकड़ा। यही खेल के साथ हुआ। खेलों में क्रिकेट ही उनका पहला प्यार बना रहा। जब गए तो अपने प्रिय खेल देख रहे थे। मैं समझ सकता हूं कि सचिन के इतने बड़े स्कोर पर वे कितने ख़ुश होंगे लकिन 3 रन से हारना कितना बड़ा धक्का रहा होगा। शायद अपने प्रिय खेल और देश के लिए इतना बड़ा बलिदान इतने बड़े पत्रकार ने शायद ही कभी दिया हो।
एक घटना मुझे इस समय फिर याद आ रही है। सूरीनाम भारत सरकार का प्रतिनिधि मंडल जाने वाला था। विदेश मंत्रालय से नाम प्रस्तावित होकर पी एम ओ भेजे गए। उसमें जोशी जी का और मेरा भी नाम था। उन्हीं दिनों मैंने जनसत्ता में इस बात का सख्त शब्दों में खंडन किया था कि मैं आचार्य गिरिराज किशोर नहीं हूं। लोग कई बार मुझे वी एच पी का नेता समझकर पत्र लिखते थे। परिचय देते हुए नाम से पहले आचार्य लगा देते थे। सांप्रदायिकता के प्रतीक व्यक्ति से मेरा नाम जोड़ना मेरे लिए अपमानजनक था। शायद प्रधानमंत्री हाऊस में उस बात को पढ़ लिया गया था। फ़ाइल लौटी तो मेरे और जोशी जी के नाम पर फ़ाइल में निशान लगा था। राज्यमंत्री विदेश ने पीएम से जाकर कहा कि जोशी जी इतने बड़े पत्रकार और गिरिराज किशोर ने गांधी जी पर पहला गिरमिटिया जैसा उपन्यास लिखा है। प्रधानमंत्री ने सदाशयता दिखाई और दिग्विजय सिहं जी की बात मान ली। दरअसल जोशी जी ने अपनी राय के साथ कभी धोखा नहीं किया। वे निडर होकर बी जे पी नीतियों के खिलाफ़ बोलते रहे। इतना बड़ा पत्रकार क्या राज्यसभा में जाने योग्य नहीं थे। लेकिन पार्टियां सरकार में रहीं और गिरीं पर किसी को न हिंदी का धयान आया और न जोशी जीजैसे निर्भीक पत्रकार का।
मैंने समाचार पढ़कर उनके सहयोगी रहे प्रताप सोमवंशी को फ़ोन करके पूछा दाह संस्कार कब होगा उन्होंने बताया कि उनका शरीर इंदौर ले जाया जा रहा है। ख़ामोश हो जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। वे अपना काम पूरा करके घर लौट रहे थे। मैंने मन ही मन प्रणाम कर लिया।
मेरी उनसे तब मुलाकात हुई थी जब वे अज्ञेय जी के साथ एवरीमेन में काम करते थे। जहां तक मुझे याद है तब वे बुशर्ट पैंट भी पहनते थे। बाद में उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखना पढ़ना लगभग छोड़ दिया। दूसरी बार मैं उनसे राजेन्द्र यादव के साथ इंडियन एक्सप्रेस की बिल्डिंग में मिला था। उन्होंने लिखी कागद कोरे की प्रति भी भेंट की थी। हालांकि उन दिनों मैं फ्री लेंसिंग कर रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा ‘आप कहानी उपन्यास के सिवाय भी कुछ और लिखते हैं?’
मैंने कहा ‘नाटक भी लिख लेता हूं।‘
‘नहीं, मेरा मतलब है अखबारं के लिए भी लिखते हैं।‘ मैंने गर्दन हिला दी। वे चुप रहकर बोले।
‘आपके मित्र तो बड़े लेखक हैं। इन्हें तो जनरलिस्टिक लेखन छोटा काम लगता है। लेकिन एक लेखक को समसामयिक विषयों पर ज़रूर लिखना चाहिए। इससे एक तो अपने सरोकारों का पता चलता है दूसरे देश की हालत और समस्याओं से दो चार होने का अवसर मिलता है।‘ यह बात मुझे रघुवीर सहाय भी कहते थे। लेकिन जिस तरह उन्होंने कहा उसमें एक तरह की पकड़ थी। हो सकता उसके पीछे यह भी मंशा रही हो कि यह आदमी फ्री लेंसिग कर रहा है अगर यह अखबारों मे लिखेगा तो आर्थिक मदद भी मिल जाएगी। या केवल एक लेखक को जरनेलिस्टिक लेखन की तरफ़ आकर्षित करने का तरीका था। मेरे मामा 1920 में जब आक्सफोर्ड लंदन से एम ए करके आए तो गांधी जी का संदेश मिला। बापू बंबई में ही थे। वे उनसे मिलने गए। बापू ने सीधे सवाल किया ‘तुम आज़ादी से सरोकार रखते हो या गुलामी की सुख सुविधा से?’
वे कुछ देर समझ नहीं पाए सवाल का मर्म क्या है। बापू काम करते रहे। कुछ देर बाद पूछा क्या सोचा। उनके मुहं से अनायास निकला –आज़ादी। हालंकि इन दोनों घटनाओं में कोई साम्य नहीं था। लेकिन एकाएक उस घटना का ध्यान आ गया था, पर मैं बोला नहीं। कुछ महीने बाद जब मैं उनसे मिलने गया तो वे बोले आपने क्या सोचा। मैंने एक लेख निकालकर उनके सामने रख दिया। जहां तक मुझे याद है वह भाषा के संदर्भ में था। उन्होंने अल्टा पल्टा और पी ए को बुलाकर कहा यह जाएगा। किसी काम का इतना जल्दी नतीजा पहली बार मिला था। हो सकता है यह उनका प्रोत्साहित करने का तरीका रहा हो।
प्रभाष जी ने चंद दिनों पहले मुझसे फ़ोन पर कहा था। मैंने कलकत्ता संस्कृति संसद वालों से कहा है कि जब पहला गिरमिटिया जैसे बड़े उपन्यास के लेखक आ रहे हैं तो 15 नवंबर को होने वाले हिंद स्वराज की गोष्ठी की वही अध्यक्षता करेंगे। कुछ ही देर बाद सचिव रत्नशाह जी का फ़ोन आ गया। हम भले ही कम मिलते हों पर उन्हें सदा गांधी के संदर्भ में मेरी याद रहती थी। जब मेरा उपन्यास छपा तो उन्होंने मुझे फ़ोन किया आपको पटना चलना है और गिरमिटिया पर बोलना है। मैं दिल्ली से आऊंगा आप कानपुर अमुक गाड़ी पर मिलें। मैं जाम के कारण वक्त के वक्त स्टेशन पहुंचा। वे इंतज़ार में टहल रहे थे। बिस्तर लगा तैयार था। जैसी आडियंस वहां मिली वैसी कहीं और नहीं मिली। शिवानंद जी तो थे ही। लालू जी से भी पहली बार उन्होंने ही भेंट कराई। मुझे विचित्र अनुभव हो रहा है हिंदी और गांधी के प्रति समर्पित ऐसा जुझारू योद्धा अब कौन मिलेगा। उनके दम से मुझे दम था। कोई पत्रकार आज हिंदी में ऐसा नहीं जो हिंदी के सवाल को जन्म मरण का सवाल समझता हो। अधिकतर हिंदी के पत्रकार हिंग्लिश के पत्रकार हैं। उन्हीं का दम था कि जनसत्ता को उन्होंने हिंदी का शीर्ष पत्र बना दिया था। आज भी हिंदी के अख़बारों में जनसत्ता को ही बौद्धिक सम्मान प्राप्त है। यह ठीक है कि तीसरे नंबर पर वे क्रिकेट के शैदाई थे। उन्होंने जनसत्ता के बाद कोई दूसरा अखबार नहीं पकड़ा। यही खेल के साथ हुआ। खेलों में क्रिकेट ही उनका पहला प्यार बना रहा। जब गए तो अपने प्रिय खेल देख रहे थे। मैं समझ सकता हूं कि सचिन के इतने बड़े स्कोर पर वे कितने ख़ुश होंगे लकिन 3 रन से हारना कितना बड़ा धक्का रहा होगा। शायद अपने प्रिय खेल और देश के लिए इतना बड़ा बलिदान इतने बड़े पत्रकार ने शायद ही कभी दिया हो।
एक घटना मुझे इस समय फिर याद आ रही है। सूरीनाम भारत सरकार का प्रतिनिधि मंडल जाने वाला था। विदेश मंत्रालय से नाम प्रस्तावित होकर पी एम ओ भेजे गए। उसमें जोशी जी का और मेरा भी नाम था। उन्हीं दिनों मैंने जनसत्ता में इस बात का सख्त शब्दों में खंडन किया था कि मैं आचार्य गिरिराज किशोर नहीं हूं। लोग कई बार मुझे वी एच पी का नेता समझकर पत्र लिखते थे। परिचय देते हुए नाम से पहले आचार्य लगा देते थे। सांप्रदायिकता के प्रतीक व्यक्ति से मेरा नाम जोड़ना मेरे लिए अपमानजनक था। शायद प्रधानमंत्री हाऊस में उस बात को पढ़ लिया गया था। फ़ाइल लौटी तो मेरे और जोशी जी के नाम पर फ़ाइल में निशान लगा था। राज्यमंत्री विदेश ने पीएम से जाकर कहा कि जोशी जी इतने बड़े पत्रकार और गिरिराज किशोर ने गांधी जी पर पहला गिरमिटिया जैसा उपन्यास लिखा है। प्रधानमंत्री ने सदाशयता दिखाई और दिग्विजय सिहं जी की बात मान ली। दरअसल जोशी जी ने अपनी राय के साथ कभी धोखा नहीं किया। वे निडर होकर बी जे पी नीतियों के खिलाफ़ बोलते रहे। इतना बड़ा पत्रकार क्या राज्यसभा में जाने योग्य नहीं थे। लेकिन पार्टियां सरकार में रहीं और गिरीं पर किसी को न हिंदी का धयान आया और न जोशी जीजैसे निर्भीक पत्रकार का।
मैंने समाचार पढ़कर उनके सहयोगी रहे प्रताप सोमवंशी को फ़ोन करके पूछा दाह संस्कार कब होगा उन्होंने बताया कि उनका शरीर इंदौर ले जाया जा रहा है। ख़ामोश हो जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। वे अपना काम पूरा करके घर लौट रहे थे। मैंने मन ही मन प्रणाम कर लिया।
Subscribe to:
Posts (Atom)
