6 जून 10 के अमर उजाला(आनंद) में एक नक्सली की डायरी छपी है। वह मई 1973 से लेकर 2010 यानी 37 वर्ष के नक्सली जीवन पर आधारित है। अनेक अंतर्विरोधों से भरी हुई। सरकारें तो अत्याचार और दमन करती ही हैं चाहे कम्यूनिस्ट सरकार हो या अमेरिका व भारत की जनतंत्रात्मक सरकार या माओवादी सरकार। 8 जून के yahoo ईमेल पर न्यूज़फ्लेश था कि व्हाइट हाउस की लीजेंड पत्रकार रिटायर कर दी गई क्योंकि उसने कहा था कि इज़राल ने हदें पार कर दीं। हांलांकि अमेरिका मानव अधिकार का सबसे बड़ा पोषक और संवर्धक होने का दावा करता है परंतु जबसे अमेरिका अस्तित्व में आया तबसे लेकर आज तक उन अधिकारों के उलंघन का पुरोधा बना हुआ है। रेड इंडियन्स से लेकर इराक़ का अन्याय पूर्ण दमन और उत्पीड़न तथा इज़राइल द्वारा फिलिस्तान के मुसीबतज़दा लोगों के लिए राहत सामग्री ले जाने वाले जाहज़ों पर अमानवीय आक्रमण व अधिग्रहण का एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा विरोध करने पर उसका व्हाइट हाउस से निष्काषण, क्या अमेरिका को मानवअधिकारों का संरक्षक कहा जा सकता है? शायद जनतंत्र भी मानवीयता का बाना पहन कर उतना ही तुर्रमखां है जितनी तानाशाही। स्टालिन के मिडनाइट नाक के नाम से आज भी पसीना आजाता है। आपातकाल में हमारे यहां भी यही हुआ। माओ की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान चीन के सब लेखक/बुद्धिजीवी कामगर बना दिए गए थे। रात में मोमबत्ती की रोशनी में कितांबें स्मगल करके पढ़ते थे। पकड़े जाते थे तो लेशिंग होती थे। यानी ठोक पीटकर पोलितेरियत बनाया जाता था। उपरोक्त नक्सली की डायरी में नंबर 1997 को डायरी नवीस ने एक अमनोवैज्ञानिक घटना का जिक्र किया जो शायद उनके अनुशासन का हिस्सा हो। लगता है सब मानवेतर और अमनोवैज्ञानिक निर्णय अनुशासन के नाम पर ही लिए जाते हैं।
1997 ...लक्ष्मी और अशोक। सशस्त्र क्रांति में बंदिशें हैं, लेकिन प्रेम कहां कोई बंधन मानता है। दोनों ने जाने कब एक दूसरे को दिल दे दिया पता नहीं। दोनों मद्देड़ के पास हुई बड़ी कार्यवाही में भी शामिल हुए थे। अब शादी करना चाहते हैं। आज की बैठक इसी मुद्दे पर है। पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने शादी की मंज़ूरी दे दी।...पार्टी ने एक शपथ पत्र तैयार किया है। यही शपथ कामरेड के लिए अग्निकुंड है, सात जन्मों में बंधने का जतन। दोनों ने शपथ ली कि वे शादी के बाद भी पहले की तरह पार्टी का काम करते रहेंगे।...(पहले की तरह का मतलब...?)
अक्तूबर, 1998 ...दोनारपाल से बीजापुर के बीच एक बड़े आपरेशन को हमने अंजाम दिया। हम पर सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ गया है। इस बीच खबर आई कि लक्ष्मी और अशोक ने सरंडर कर दिया। दोनों बच्चा चाहते थे। पार्टी में प्रेम की इजाज़त है, बच्चा पैदा करने की नहीं।
2010, सत्तर के दशक में जो सपना देखा था उसका यह हश्र! उस दौर में लोग हमें क्रांतिकारी समझते थे अब आतंकवादी कहने लगे हैं। हमारी विचारधारा में तो कोई खोट नहीं था। फिर हमारे हाथ उसी जन के ख़ून से क्यों सने हैं जिसके नाम पर हमने जनसंघर्ष की शुरूआत की थी?
37 साल के नक्सली जीवन के बाद जब एक सेंट्रल कमेटी का सदस्य अपने आप से यह सवाल करता है कि हमारे हाथ उसी जन के खून से क्यों सने हैं जिसके नाम पर जन संघर्ष की शुरूआत की थी तो यह सवाल पुनर्विचार की गुंजायश पैदा करता है उनके लिए खासतौर से जो इस रक्ताभ आंदोलन के कर्णाधार हैं या समर्थक हैं (कनू बाबू का प्रायश्चित भी शायद यही था)। हम क्या हिंसा या बंदूक के वल पर परिवर्तन ला सकते हैं? कर सकते हैं तो कितने समय के लिए? अगर ला सकते तो स्टालिन और क्रुश्चेव की बिदाई के बाद गोर्बोचोव इतनी जल्दी सफल न होते। माओ के बाद चीन रिविज़निस्ट या क्षमा करें रेनिगेड बनकर पूंजीवादी व्यवस्था को आत्मसात करने को बाध्य न होता। (आज चीन में हर पूंजीपति 12 सीटर व्यक्तिगत एयर क्राफ्ट पर चलता है)। बंदूक से निकलने वाली वह गोली न चीन अपने अशांत प्रदेशों में उनकी आज़ादी के लिए इस्तेमाल कर पा रहा है और न ही पूंजीवादी देशों के दबाव से मुक्ति पाने के लिए। शांतिपूर्ण हल निकालने के लिए बंदर भभकी का सहारा ले रहा है। यही हाल पूंजीपति देशों का है। दरअसल सब देश अपने अपने असलहे चमका रहे हैं पर सब शार्टकट शांति चाहते हैं सीधे शांति की बात नहीं करते। अलबत्ता तीसरी दुनिया के देशों के गरीब और अनपढ़ जन को मारने या धमकाने के लिए जिस जन के लिए जन के नाम पर जनसंघर्ष कर रहे हैं उसी को मार रहे हैं उसी के ख़ून से हाथ सान रहे हैं। चाहे मुख़बिर का नाम देकर उसी आदिवासी को मारें जिसके अधिकार को संरक्षित करने की बात करते हैं या उस सिपाही को मारें जो रोज़ी रोटी के लिए जान जोखिम में डालकर वहां तैनात है। वह लड़ नहीं रहा था, बस से घर जा रहा था। रेल गाडियों को उड़ाकर उन बेगुनाह लोगों को खत्म कर देते हैं कि जो या तो बर्तनभांडे बेचकर नौकरी की तलाश में जा रहे होते है या फिर बीमार संबंधी को देखने किस तरह जुगाड़ करके उस गाड़ी में यात्रा कर रहे होते है। किस लिए? उसका तुम्हारे ऊपर तो असर पड़ना ही नहीं तुम तो जनक्रांति कर रहे हो। उनके ऊपर तो पड़ना ही नहीं जिनका उद्देश्य देश को आतंकवाद से सुरक्षित करना है। जनता को तुम दोनों ने इस तथा कथित दुमूही क्रांति के नशे के बीच जीने की आदत डाल दी है। वह कुछ समय के लिए दुखी होता है फिर सर्द आह भरकर काम में लग जाता है। इन दो कोष्टों ने उस जन से विरोध और समझदारी का अधिकार छीन लिया है।
हमारे बुद्धिजीवी दुमूही बातें करने में पारंगत हैं। वे आसानी से कह देते हैं कि मैं हिंसा का समर्थन नहीं करती या करता जैसे अरुणधति जी। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि एक सशस्त्र आंदोलन होना चाहिए, साथ ही यह भी चुनौती कि सरकार चाहे जेल में बंद कर दे। एक बार जेल यात्रा का मौक़ा आया था तब महीने भर जेल में रहना गवारा नही हुआ था माफ़ी मांगकर चले आना सुखकर लगा था। सशस्त्र आंदोलन किस लिए जब आप हिंसा का समर्थन नहीं करते तो सशस्त्र आंदोलन क्या फैशन परेड है जिसे आप हर्ष फायरिंग की तरह करना चाहते हैं। बुद्धिजीवी हिंसा का विरोध भी करेगा और हिंसा का साज़ो सामान इकट्ठा करने को प्रोत्साहन देकर पेट्रोल को आग के पास भी ले जाएगा। बेहतर यही है वे एक तरफ हो कर साफ़ बात करें। कोई एतराज़ नहीं अगर वे हिंसा के समर्थक बने रहें। संसार में सशस्त्र आंदोलनों के दौरान कहीं ऐसा नहीं हुआ कि शस्त्रों या उनके धारकों ने गुनाहगार और बेगुनाह में भेद किया हो। यह कहना कि मैं हिंसा का या बेगुनाह लोगों की हत्याओं के पक्ष में नहीं हूं महज़ लफ़्फाज़ी ही कही जाएगी। हिंसा तो सामने दिखती है पर गुनाहगार और बेगुनाह छिप जाते हैं। जो मारा गया वह गुनाहगार हो गया। जिसे शासन शहीद या बेगुनाह करार देता है मारे जाने के बाद ‘क्रतिकारी’ गुनाहगार करार दे देते हैं। उसे और उसके घरवालों को भी मौत को दो कोष्ठों के बीच जीना पड़ता है। बकौल अरुणधति जी के सरकार अपने देशवासियों के खिलाफ युद्ध कर रही है यह बात गलत नहीं। लेकिन क्या माओवादी देश के लोगों के खिलाफ हथियार नहीं उठाए हुए हैं। जिन आदिवासियों के पक्ष में वे हथियार थामें हैं क्या उन्हीं को मुखबिर का नाम देकर हत्याऐं नहीं कर रहे हैं? सिपाहियों को तो वे मार ही रहे हैं। जैसा कि ‘एक नक्सली की डायरी’ में लिखा है क्या लक्षमी अशोक को विवाह की अनुमति देकर बच्चा न पैदा करने की बंदिश तालिबाना हुक्म नहीं है। विवाह की इजाज़त देकर बच्चा पैदा न करने देना, स्वाभाविक जीवन जीने की अपेक्षा को अग्निकुंड में झोंक देना तो और भी बड़ी अमानवियता है। उन्होंने सरेंडर करके उन तथाकथित क्रतिकारियों की नज़र में शायद गद्दारी की हो लेकिन अपनी संवेदनाओं को सुरिक्षत करने का संभवतः यही एक तरीक़ बचा था। हो सकता है बाद में एस पी ओ नाम देकर उनकी भी हत्या कर दी गई हो। मानवीय संवेदनाओं के आधार पर उनकी समस्यों को सुलझाना या दिलों को बदलने का दायित्व उन सशस्त्र क्रातिकारियों का नहीं? सेनाएं भी संवेंदनाओं के सहारे चल सकती हैं। बड़ी विचित्र बात है अरुणधति जैसे बुद्धिजीवी अपनी रौ में किसी पर भी किसी तरह का आधारहीन लांछन लगा सकते हैं। मैं इस रिमार्क को कि ‘विरोध के गांधीवादी तरीके को दर्शकों की ज़रूरत होती है जो यहां नहीं हैं’ अपरिपक्व और अनभिज्ञतापूर्ण मानता हूं। इतना ही कहा जा सकता है कि सबसे अधिक आत्मीय हिस्से दारी आज़ादी के उसी आंदोलन में थी जिसमें जन निहत्था संघर्ष करता था। उन्हें मात्र दर्शकों की संज्ञा देकर एक ऐसे प्रयोग को लांछित करना है जो न पहले कभी हुआ, न आगे होगा। जो अपने आप में हथियारों के बल पर लड़ने से अधिक साहसी काम है। क्रांतिकारियों के कैंप का दौरा करना और लेख लिखने हिस्सेदारी नहीं दर्शन करना मात्र है। यहां मैं उस ज़माने के विदेशी पत्रकार की टिप्पणी पेश करना चाहता हूं जो नमक आंदोलन के बारे में अखबार को भेजी गई थी। अंग्रज़ी में ही दे रहा हूं अंग्रेज़ीदां बुद्धजीवी अगर पढ़ना चाहेंगे तो कम से कम वे इसका लाभ ले सकेंगे और अपनी अनभिज्ञता से थोड़ी बहुत मुक्ति पा सकेंगे-
‘This spectacular event was reported around the world; in the striking words of Webb Miller, the united press correspondent: From where I stood I heard the sickening whack of sticks on unprotected skulls…those struck down fell sprawling , unconscious, or writhing with fractured skulls or broken shoulders.’ (Gandhi Naked Ambition P. 191 , Jad Adams)
वे लोग बंदूकों या गोलियों के सहारे हिस्स्दारी नहीं कर रहे थे। हथियार क्रांतिकरियों की अपनी सुरक्षा के माध्यम अधिक होते हैं। वे गांधीवादी तमाशबीन नहीं थे। वे निहत्थे असुरक्षित होने के बावजूद अपने शरीरों पर आक्रमण झेलकर अहिंसक क्रांति कर रहे थे। उन दरिंदो को सचेत कर रहे थे कब तक मारोगे। क्रांति के नाम पर सशस्त्र क्रंतिकारियों के लिए हिंसा के द्वारा हत्याएं करना गुरूमंत्र है वहीं अहिंसक क्रांति में आत्मबलिदान करके परिवर्तन लाना जीवन का उदेश्य है। शायद हमारे मार्क्सवाद बुद्धिजीवियों को हिंसक क्रांति पसंद है। वह आत्मरक्षा के साथ दूसरों की जान लेकर बचे हुए लोगां को समझदार बनाते हैं। हम समझदार हैं हमारे पास हथियार हैं हमारी बात मानो।
कोई उनसे क्यों नहीं पूछता कि पार्टनर तुम्हारी क्या राजनीति है। अगर तुम इस शस्त्र क्रांति में सफल हो गए तो क्या करोगे? क्या तब भी बंदूक की गोलियों से लोगों को ज्ञानी बनाओगे? चंगेज़ खा़, सिकंदर, नादिर शाह, हिटलर, मोसोलोनी, स्टालिन, हिटलर, माओ कोई हिंसा को अमरत्व प्रदान नहीं कर पाया। अमेरिका का अणु बम भी चमत्कार नहीं कर पाया। उसके मालिक को जापान के सामने आज भी याचक का बाना पहनना पड़ता है। गांधी ने कहा था ’l see no difference between the Nazi powers and the allies . All are exploiters, all resort to ruthlessness.’ (पृ 221, वही)
हिटलर की, गांधी ने उसके व्यक्तिगत आचरण के लिए प्रशंसा की थी पर उसके राजनीतिक नज़रिए के बारे मे 1940 में उन्हें ही लिखा ‘Dear Friend, We have no doubt about your bravery or devotion to your father land nor do we believe that you are a monster described by your opponents (though) many of your actions are monstrous and unbecoming of human dignity, specially in estimation of men like me who believe in universal friendliness,’ (पृ एवं पुस्तक वही)
हिटलर की तरफ से भारत के पूर्व गर्वनर जनरल और तत्कालीन विदेश सचिव लार्ड हेलिफेक्स को सलाह दी गई थी कि तुम्हें एक ही काम करना है गांधी को शूट कर दो। अगर ज़रूरत समझो तो कांग्रेस के कुछ और नेताओं को खत्म कर दो। तुम देखना कितनी जल्दी तुम मुसीबत से निजात पा जाते हो। असिहष्णुता तानाशाही की जनक है और जनतंत्र की हत्यारी। अंग्रज़ों के लिए हिटलर की सलाह पर अमल करना मुश्किल नहीं था लेकिन उन्होंने, और चाहे जो किया हो, पर ऐसा नहीं किया। हमारे देश के हिंदूवादी लोगों ने भले ही कर दिखाया।
एक सवाल जो शायद सबके दिमाग में आता हो, अपवादों को छोड़कर। वे सत्ता प्राप्त करने के लिए सशस्त्र क्रांति पर आमादा है या जन कल्याण के लिए? जन कल्याण का माध्यम क्या होगा? उनका नारा है सत्ता बंदूक की नली से निकली गोली से मिलती है। उसे बरकरार रखने के लिए भी शायद उसी की ज़रूर होती है जैसा कि कई देशों में हुआ है। जव उसका भय खत्म हो जाता है या सामने बड़ी शक्ति आ जाती है तो शांति की खोज होने लगती है। गोली की समय सीमा क्या है, सत्ता मिलने तक या उसके बाद भी..? सवाल उठेगा सत्ता मिलने पर उनकी योजना क्या होगी।
नाम भले ही जनता से जुड़ा हो पर उन्हें भी औद्योगिकरण करना है। ज़मीन भी चाहिए, पानी भी चाहिए, खनिज भी चाहिए हर वह चीज़ चाहिए जो कोर्पोरेट जगत को चाहिए। धन तो चाहिए ही। य़ा वे मशीनों के मुकाबले जन शक्ति और अहिंसा को प्राथमिकता देंगे? शहरों में कितनी ज़मीन बची है, जंगलों की तरफ जाना उनकी भी नियति होगी। जो विरोध करेगा उसे जनविरोधी की संज्ञा देकर किनारे लगा दिया जाएगा या उनकी बात सुनी जाएगी? विकास का ऐसा उदाहारण कहीं नहीं है जो यह बताता हो कि उन्होंने बंदूकें छोडकर मेहनतकशों व किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया हो। समाज में समरसता बनाई हो। भय उनका परोक्ष और प्रभावी हथियार रहा। सभ्य बनने के साथ इस हिंसक संस्कृति से आम जन को निजात दिलानी होगी। वे तो कमिसार बने ट्रिगर पर उंगली रखे खड़े रहते हैं। उनकी तरबियत ही ऐसी है। आम आदमी सुरक्षा चाहता है, शांति चाहता है। भय के ज़रिए सुरक्षा देने के आदी आत्मियता और भाईचारे की नीति से अनभिज्ञ रहते हैं। दोनों सवाल अलग हैं सत्ता पाना और आदिवासियों का मित्र बनकर उनका साथ देना। नफ़रत की डाल पकड़कर हिंसा परवन चढ़ती है।
ये दोनों बातें अलग हैं, सशस्त्र क्रांति और आदिवासी सस्याओं का समाधान। ये आधुनिक हथियार उनके मित्र नहीं। ठोक पीटकर भले ही उन्हें हथियारों का मित्र बना दो पर वह उनके नैसर्गिक मित्र नहीं हो सकते। जो लोग कपड़ों को अपने जीवन के लिए अनिवार्य नहीं मानते वे उन आधुनिक हथियारों को अगर स्वीकार करेंगे तो एक कड़वी गोली की तरह ही। उन्होंने 19वी शताब्दी में अपने ही हथियारों से अंग्रज़ो को पानी पिलाया था। मानगढ़ का विद्रोह इसका उदाहारण है। उसी पर आधारित हरिराम मीणा का उपन्यास धुनि तपे तीर है। वे इन हथियारों से सहजता अनुभव कर ही नहीं सकते। न उन्हें उपलब्ध करना उनके बस की बात है। आप ही एक से एक साफेस्टिकेटेड हथियार आभूषणों की तरह प्राप्त करके उन पर वर्चस्व कायम कर रहे हैं। उन्हें परनिर्भर बना रहे हैं। जिनसे आप हथियार ले रहे हैं वे देश जन के अधिकारों की सुरक्षा मं रुचि नहीं रखते बल्कि उनकी रुचि अपने देश के लोगों के माध्म से देश में असंतुलन पैदा करके अपना राजनीतिक हित साधना है। आदिवासियों की समस्या बाहरी हस्तक्षेप से नहीं निबटेगी उसके लिए उनके साथ काम करके उन्हें उनके आत्मबल का अहसास कराना होगा। हथियारों की लड़ाई तो परमुखापेक्षी बनाकर उनकी आज़ादी का अपहरण होगा। वे कमज़ोर नहीं हैं। अपने हथियारों की चकाचौंध में उन्हें भरमाए नहीं। आज़ादी की लड़ाई के दौरान न क्रंतिकारियों ने विदेशों से इस तरह की सहायता ली और न अहिसक राजनीति ने। गांधी का मानना था कि दूसरों के सहारे हिंसा की लड़ाई लड़ना देश को गुलाम दर गुलाम बनाना है इसी संकट से बचने के लिए अपनी तकनीक ईजाद की। जिन्ना भी इस बात को जानते थे कि हर समस्या का राजनीतिक हल निकल सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि मार्क्सवादी सोच के कारण ही दूसरे देशों में इस तरह का हस्तक्षेप बढ़ा है। हम मध्यकाल में और 18वी 19वं सदी में देख चुके हैं कि अपने भेद भावों के चलते हमने बाहर ताकतों को बुलाया और गुलामी दर गुलामी भोगी। वही काम प्रकांतर से अब हो रहा है। आदिवासी समस्या हमारी बिगाड़ी हुई है उसको संवारना हमारी ही जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसे वहन करना पड़ेगा और उसका राजनीतिक हल निकालना होगा।
(sankshipt ansh 24.6. 10 ko Jansatta mai chapa hai)
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Thursday, 24 June 2010
Saturday, 1 May 2010
वनवासियों का दर्द
23 अप्रेल 2010 को लोकसभा में आदिवासी विकास के बजट पर बहस में झारखंड के पूर्व मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडे को सुन रहा था। अर्जुन मुंडे बी जे पी से संसद सदस्य हैं। बी जे पी से हों या कांग्रेस या किसी साम्यवादी पार्टीँ से अगर बात दिल की गहराई से आती है तो असर करती है। केवल राजनीति, उखाड़ पछाड़ और जुगाड़बाज़ी हो तो बकवास अधिक लगती है। अकसर लोग टी वी बंद कर देते हैं। आई पी एल पर बात हो रही थी तो लग रहा था संभालने की नहीं गिराने उठाने की राजनीति ज्यादा है। मुझे लगा हालांकि मुंडे, सरकार के 9 करोड़ आदिवासियों के लिए केवल 32 हज़ार करोड़ के बजट प्रवधान की आलोचना कर रहे थे जो पूरे बजट का 1 प्रतिशत भी नहीं है। जैसे ऊंट के मुंह में ज़ीरा। सवाल है सरकारें आदिवासियों के विकास का गाना क्यों गाती हैं। छः साल बी जे पी की सरकार रही उसने ही कौनसा आदिवासयों को सिर से खड़ा कर दिया। इसलिए सवाल सरकारों का नहीं यह आदिवासियों के प्रति सामाऩ्य संवेदनहीनता का है। यह बात सही है कि जो भी आता है वह यही कहता है कि आदिवासियों को अंग्रज़ों ने जंगलो में बसाया। मुंडे का सवाल था कि अंग्रेज़ पहले आए या आदिवासी पहले से थे। जंगल किसके थे, किसने उनकी परवरिश की, किसने देख भाल की, किसने जंगल के ख़तरे उठाए। आदिवासियों के बारे में कहना है कि वे गरीब नहीं हैं। उन्होंने एक से एक मूल्यवान खनिज की जान देकर रक्षा की। सम्मानित चोरों की तरह विदेशियों को नहीं बेची। वे लोग जंगल के पेड़ पौधो की भी पूजा करते हैं। फल भी तोड़ना हो तो पहले इजाज़त लेते हैं। धरती की जुताई करने से पूर्व धरती माता से क्षमा मांगते हैं। तुम्हें कष्ट होगा मुझे पेट भरने के लिए खेती करने की आज्ञा दो जिससे मैं पेट भर सकूं। इसका जवाब क्या इन तथाकथित आधुनिक वादियों के पास है। सवाल है कि इन आदिवासयों को जंगलों से क्यों उजाड़ जा रहा है? दांतेवाड़ा के आसपास पता चला है कार्पोरेटस् को जगह देने के लिए आदिवासियों के लगभग 2500 गावों को उजाड़ा गया है। अभी मैंने कनाडा की संस्था संसद की एक ई मेल में देखा कि 30 मार्च को राजस्थान में एक गांव को एक औद्योगिक घराने के गुंडो ने ज़बरदस्ती उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया। लगता है इस देश में या तो सत्ता की नकेल इन व्यवसायिक घरानों के हाथ में है। या औद्योगिक क्षेत्रों की नकेल ट्रेड यूनिनों के हाथ में है। कानपुर में फ़ैक्ट्रियों की कब्रगाह इसका प्रमाण है। सवाल यह है कि गांधी के अंतिम आदमी की चिंता किसको है, क्या सरकार को या तथाकथित मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा करने के नाम पर बेरोज़गारी के गर्त में बेहतरी का झांसा देकर उन्हें उद्योगपतियों की भूख के बायलर में धकेल देनेवाली यूनियनों को। सवाल बहुत असुविधाजनक भी है और अपने अंदर झांकने के लिए गुंजायश भी पैदा करता है। इसका तोड़ जन के पास है। किसी के पास नहीं।
डा. बनवारी लाल रायपुर से दंतेवाड़ा तक शांत मार्च कर रहे हैं। इस दुहरी हत्या के विरोध में। सरकार की नीतियां भी गरीब को मारती हैं और माओवादी भी। सवाल है कि माओवादियों को ज़मीन कैसे मिली। इसपर न माओवादियों का अधिकार है न पूंजीपतियों का। वनवासियों की जमीन के अधिकार उन्हें न देकर सरमायेदारों को सेज के लिए दी जा रही है, उनकी नदियों पर मल्टीनेशनल कब्ज़ा कर रहे हैं, उनके द्वारा परवरिश दरख्त ठेकेदार और धनपति काट रहे हैं। खनिज की लड़ाई है जिसे आदिवासियों ने जानकी बाज़ी लगाकर बचाया हुआ है। उन जानवरों को जो उनके द्वारा पालित हैं, उनकी दवादारू के उपयोग में उनके अंगो के हिस्से आते हैं उन्हें व्यवसायिक शिकारी मार रहे हैं। उनके बच्चे हर साल बिमारियों से मर जाते हैं। जो बच जाते हैं वे गरीबी की चक्की में पिसते हैं। जो बच जाते हैं उन्हें आश्चर्य होता है कि वे मौत के पंजे से कैसे बच गए। सवाल है जो माओवादी उनके हमदर्द हैं और जिनके बल पर वे लड़ रहे हैं। उनका उद्देश्य भी औद्योगिकरण ही है। उसी को वे समृद्धि का साधन मानते हैं। अब औद्योगिकरण चीन में भी व्यक्तिगत सरमाए का रूप लेता जा रहा है। आगे उसका क्या रूप होगा कहना मुश्किल है। लेकिन यह निश्चित है कि सर्वहारा का दखल सैद्धांतिक फलसफा रह जाए तो रह जाए। लेकिन उन्हें भी सेज के लिए ज़मीन चाहिए, पानी चाहिए, बिजली चाहिए, जो इन सरकारों को चाहिए वह सब कुछ इन जुझारू माओवादियों को भी चाहिएगा। उनकी सत्ता बंदूक से निकलती है शायद तब भी निकले। यह बात अलग है कि उनका तरीका जनतंत्रात्मक होते हुए भी शब्द तानाशाही से जुड़ा होगा। बंदुक अब ताकत है तो तब भी ताकत होगी। हर सत्ता के अपने पूंजीपति होते हैं। व्यवसायी होते हैं। कुछ शासन के नियम होते हैं और कुछ वे अपने नियम चलाते हैं जिनकी मौन स्वीकृति प्राप्त रहती है। उसका लाभ राज्य को भी मिलता है पार्टी को भी और व्यक्तियों को भी। यह राजनीति की प्रकृति है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है, मुसीबत में जहां से सहनुभूति की बयार आती महसूस होती है सब लोग उधर ही सिमटते चले जाते हैं भले ही उसमें हिंसा की गंध मिली हो। हिंसा अगर दूसरों के लिए संभव हो सकती है तो हमारे लिए क्यों नहीं हो सकती, दरअसल हिंसा किसी को नहीं पहचानत वह साम्यवादी निज़ाम पहचानती। उन देशों में जहां खेती जीवनाधार होता है वहां समग्र औद्योगिकरण उस देश की संस्कृति की हित को हानि पहुंचाता है। खेती को पूर्ण रूप से औद्यौगिकरण में हस्तांरित करना उस देश के सांस्कृतिक़, आर्थिक टिशूज़ के लिए कीमोथरिपी की तरह है। जबकि खेती ही उस देश का स्वास्थ्य होता है वह कोई बीमारी या कमज़ोरी नहीं होती। ये आदिवासी उस पूरी उत्पादन संस्कृति की रक्षा ही नहीं कर रहे हैं बल्कि उसे संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। अगर माओवादी उनकी सहानुभूति अपनी तथाकथित सहानुभूति की एवज़ में हिंसा के पक्ष में भुना सकते हैं तो हमारी जनतंत्रात्मक सरकारें क्यों नहीं भुना सकती। एक ही कारण हो सकता है कि सरकारों की पक्षधरताएं न्याय और 9 करोड़ लोगों के हितों से बड़ी हैं। सब जानते हैं अगर स्टालिन का अहं और तानाशाही प्रवृत्ति सर्वहारा और जनहित से बड़ा न हुआ होता तो सोवियत यूनियन का निज़ाम इतनी जल्दी न बिखरता। इंसान कितना भी शक्तिशाली बन जाए उसे हिंसा का रास्ता अंततः छोड़ना ही पड़ता। भले ही वह हिटलर हो मसोलोनी हो, स्टालिन हो या चीन में कल्चरल रेव्यूलूशन के प्रणेता हूं सबको अंत में वैचारिक और भौतिक हिंसा को बिना स्थायित्व प्रदान किए उस ज़मीन को छोड़नी पड़ी। समय जितना भी लगा हो। शांति और हिंसा में तो स्थायित्व होता भी है। तालाब के जल की तरह भले ही कुछ समय के लिए हलचल पैदा करने में सफल हो जाएं सब जानते हैं अंततः जल को शांत होना ही है। आप अपनी ज़िद में जल के स्रोत ही बंद करने पर उतारू हो जाएं तो बात अलग। पर यह भी सही कि दूसरे स्रोत खुल जाएंगे।
डा. बनवारी लाल रायपुर से दंतेवाड़ा तक शांत मार्च कर रहे हैं। इस दुहरी हत्या के विरोध में। सरकार की नीतियां भी गरीब को मारती हैं और माओवादी भी। सवाल है कि माओवादियों को ज़मीन कैसे मिली। इसपर न माओवादियों का अधिकार है न पूंजीपतियों का। वनवासियों की जमीन के अधिकार उन्हें न देकर सरमायेदारों को सेज के लिए दी जा रही है, उनकी नदियों पर मल्टीनेशनल कब्ज़ा कर रहे हैं, उनके द्वारा परवरिश दरख्त ठेकेदार और धनपति काट रहे हैं। खनिज की लड़ाई है जिसे आदिवासियों ने जानकी बाज़ी लगाकर बचाया हुआ है। उन जानवरों को जो उनके द्वारा पालित हैं, उनकी दवादारू के उपयोग में उनके अंगो के हिस्से आते हैं उन्हें व्यवसायिक शिकारी मार रहे हैं। उनके बच्चे हर साल बिमारियों से मर जाते हैं। जो बच जाते हैं वे गरीबी की चक्की में पिसते हैं। जो बच जाते हैं उन्हें आश्चर्य होता है कि वे मौत के पंजे से कैसे बच गए। सवाल है जो माओवादी उनके हमदर्द हैं और जिनके बल पर वे लड़ रहे हैं। उनका उद्देश्य भी औद्योगिकरण ही है। उसी को वे समृद्धि का साधन मानते हैं। अब औद्योगिकरण चीन में भी व्यक्तिगत सरमाए का रूप लेता जा रहा है। आगे उसका क्या रूप होगा कहना मुश्किल है। लेकिन यह निश्चित है कि सर्वहारा का दखल सैद्धांतिक फलसफा रह जाए तो रह जाए। लेकिन उन्हें भी सेज के लिए ज़मीन चाहिए, पानी चाहिए, बिजली चाहिए, जो इन सरकारों को चाहिए वह सब कुछ इन जुझारू माओवादियों को भी चाहिएगा। उनकी सत्ता बंदूक से निकलती है शायद तब भी निकले। यह बात अलग है कि उनका तरीका जनतंत्रात्मक होते हुए भी शब्द तानाशाही से जुड़ा होगा। बंदुक अब ताकत है तो तब भी ताकत होगी। हर सत्ता के अपने पूंजीपति होते हैं। व्यवसायी होते हैं। कुछ शासन के नियम होते हैं और कुछ वे अपने नियम चलाते हैं जिनकी मौन स्वीकृति प्राप्त रहती है। उसका लाभ राज्य को भी मिलता है पार्टी को भी और व्यक्तियों को भी। यह राजनीति की प्रकृति है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है, मुसीबत में जहां से सहनुभूति की बयार आती महसूस होती है सब लोग उधर ही सिमटते चले जाते हैं भले ही उसमें हिंसा की गंध मिली हो। हिंसा अगर दूसरों के लिए संभव हो सकती है तो हमारे लिए क्यों नहीं हो सकती, दरअसल हिंसा किसी को नहीं पहचानत वह साम्यवादी निज़ाम पहचानती। उन देशों में जहां खेती जीवनाधार होता है वहां समग्र औद्योगिकरण उस देश की संस्कृति की हित को हानि पहुंचाता है। खेती को पूर्ण रूप से औद्यौगिकरण में हस्तांरित करना उस देश के सांस्कृतिक़, आर्थिक टिशूज़ के लिए कीमोथरिपी की तरह है। जबकि खेती ही उस देश का स्वास्थ्य होता है वह कोई बीमारी या कमज़ोरी नहीं होती। ये आदिवासी उस पूरी उत्पादन संस्कृति की रक्षा ही नहीं कर रहे हैं बल्कि उसे संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। अगर माओवादी उनकी सहानुभूति अपनी तथाकथित सहानुभूति की एवज़ में हिंसा के पक्ष में भुना सकते हैं तो हमारी जनतंत्रात्मक सरकारें क्यों नहीं भुना सकती। एक ही कारण हो सकता है कि सरकारों की पक्षधरताएं न्याय और 9 करोड़ लोगों के हितों से बड़ी हैं। सब जानते हैं अगर स्टालिन का अहं और तानाशाही प्रवृत्ति सर्वहारा और जनहित से बड़ा न हुआ होता तो सोवियत यूनियन का निज़ाम इतनी जल्दी न बिखरता। इंसान कितना भी शक्तिशाली बन जाए उसे हिंसा का रास्ता अंततः छोड़ना ही पड़ता। भले ही वह हिटलर हो मसोलोनी हो, स्टालिन हो या चीन में कल्चरल रेव्यूलूशन के प्रणेता हूं सबको अंत में वैचारिक और भौतिक हिंसा को बिना स्थायित्व प्रदान किए उस ज़मीन को छोड़नी पड़ी। समय जितना भी लगा हो। शांति और हिंसा में तो स्थायित्व होता भी है। तालाब के जल की तरह भले ही कुछ समय के लिए हलचल पैदा करने में सफल हो जाएं सब जानते हैं अंततः जल को शांत होना ही है। आप अपनी ज़िद में जल के स्रोत ही बंद करने पर उतारू हो जाएं तो बात अलग। पर यह भी सही कि दूसरे स्रोत खुल जाएंगे।
Wednesday, 13 January 2010
साहित्य अकादमी की स्वायत्तता?
देश हो या संस्था उसकी स्वायत्तता को खतरा अंदर के लोगों से होता है। या कहिए उन हां-बरदार मित्रों से होता है जो संस्था-हित से अधिक अपने स्वार्थों को ‘चिड़िया की आंख’ की तरह ताकते रहने की कुव्वत पैदा कर लेते हैं। मित्र मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि संस्था का हित चाहने वाला सदा सत्ताधारियों की नज़र में अमित्र और शत्रु ही समझा जाता है। मुझे साहित्य अकादमी में पिछले सत्र में काम करने का मौक़ा मिला था। कुछ समय तक अध्यक्ष और मेरे बीच अच्छे संबंध रहे। हालांकि वामपंथी लाबी उनके ख़िलाफ़ थी। मुझे सलाह भी दी गई कि मैं जीत गया हूं अब त्यागपत्र देकर शहीद बन जाऊं। लेकिन मैं कोशिश करता हूं कि संकटों के बावजूद मैं अपना दायित्व अंत तक निभाऊं। वही मैंने यहां भी किया। यह समस्या मेरे सामने आई आई टी कानपुर में कुलसचिव रहते हुए भी तत्कालीन निदेशक के साथ गहरे मतभेद हो जाने के वक्त भी आई थी। वे कहते थे Administration is a bulldozer. उस समय बोर्ड के चेयरमेन प्रसिद्ध उद्योगपति स्व. ललित मोहन थापर ने थापर हाउस में बुलाकर मेरे सामने नियुक्तिपत्र फेंक कर कहा था तुम एक ईमानदार आदमी हूं तुम्हारी वक़त सरकारी संस्था नहीं कर सकती इसलिए उठाओ नियुक्ति पत्र त्याग पत्र देकर मेरे यहां आ जाओ। जितना वहां पाते हो उससे दुगना मिलेगा। मैंने क्षमा मांगी तो उनकी नज़र बदल गई। आंखे तरेर कर कहा देखता हूं कैसे नौकरी करते हो। वहां बैठे अपने ही बीच के लोग शह दे रहे थे इतना बड़ी बिज़नेस टाइकून तुम्हें स्वयं बुला रहा है। तुम बदकिस्मत हो जो ठुकरा रहे हो। यहां तक कि तत्कालीन शिक्षामंत्री शीला कौल ने समझाया था रिज़ाइन करदो इतने योग्य आदमी हो कोई बड़ी जगह तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। मैंने धीरे से कहा योग्य आदमी की तो हर जग ज़रूरत होती है, आप तो मंत्री हैं आपसे मैं न्याय की उम्मीद करता था। त्यागपत्र देना तो कायरता होगी। वे उठकर चली गईं थीं। उधर जब मैं थापर साहब को मनाकर के लौटा तो संभावना के अनुरूप मुझे अगले दिन निलंबन पत्र थमा दिया गया था। खैर, ओखली, सिर और मूसल का गहरा रिश्ता है। न ओखली को डरना चाहिए न सिर को, मूसल डरेगा तो सिर को कूटेगा कैसे, कहावत कैसे चरितार्थ होगी। यही अकादमी के दौराना हुआ। साल भर बाद ही पूर्व अध्यक्ष की मनमाने निर्णयों और भाषा संबंधी भेदभाव के कारण मेरे संबंध तनावपूर्ण होते गए। जब उन्होंने दोबरा चुनाव लड़कर सचिव और बी जे पी नेताओं से मिलकर अध्यक्ष बनने का मैनुप्लेशन चालू किया तो मैंने बोर्ड में विरोध किया। उन्होंने मेरा प्रस्ताव तक रिकार्ड पर नहीं रखे। उसके और भी बहुत से कारण थे जो बाद में मौक़ा मिला तो लिखूंगा। पहले दिन जनरल काउंसिल की बैठक थी। उसमें पहली बार बी जे पी और आर एस एस समर्थकों का बहुमत था। उसमें उनके ही लोग चुने गए थे। उनका जीतना तय था। मैंने तय कर लिया मैं आखरी दम तक विरोध करूंगा। मैंने किसी तरह उच्चतम सर्किल में सब कागाज़त भिजवाए, उसक नतीजा हुआ कि उन्हें बुलाकर हिंदी में समझा दिया गया कि आप अपनी उम्मीदवारी वापिस ले लें, वरना आप जानें। अगले दिन बोर्ड की मीटिंग में उन्होंने सबसे पहले अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली। मैंने उनके खिलाफ़ एक प्रस्ताव अपने तीन मित्रों से समर्थन करने की सहमति लेकर प्रस्तुत किया लेकिन वक्त पर वे चुप रहे। सत्ता का दबदबा हिंसक जानवर की दहाड़ की तरह बाद में भी गूंजता रहता है। अध्यक्ष महोदय आरंभ में ही विड्राल की घोषणा कर चुके थे। स्वाभाविक है मेरा प्रस्ताव अन नोटिस्ड चला गया।
लेकिन उस समय कि तानाशाही से अधिक खतरनाक बात अब सामने आ रही है। सामसुंग मल्टीनेशन कंपनी के साथ समझौता हुआ है कि अकादमी 24 भाषाओं में सामसुंग की तरफ़ से भी रवीन्द्र पुरस्कार देगी। सुना है विदेश मंत्रालय के कहने पर अकादमी ने यह निर्णय लिया है। सवाल है कि क्या बोर्ड या जनरल काउंसिल की बाध्यता है कि सरकार का ऐसा प्रस्ताव माने जो उस संस्था की मूल भावना व प्रकृति के विपरीत हो? इस समय साहित्य अकादमी का पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक सम्मानित माना जाता है। किसी भी देश की अकादमी आफ लेटर्स द्वारा दिया जाना वाला सम्मान संसार भर में सम्मान से देखा जाता है। सामसुंग सम्मान की क्या स्थिति होगी? सामसुंग पुरस्कार एक मल्टीनेशल कंपनी द्वारा दिया जाने वाला प्राइवेट पुरस्कार होगा। उस पर ठप्पा साहित्य अकादेमी का लगवाकर उसे अंतर्राष्ट्रीय वेलिडिटी दिलाने की चाल मात्र लगती है। विश्व की साहित्यिक सस्थाओं के बीच आदान प्रदन का तो कोई अर्थ हो सकता है लेकिन मल्टिनेशनल कंपनी का सीधा सा उद्देश्य है इस बात का विज्ञापन कि हम तुम्हारे साहित्य का प्रचार कर रहे हैं, कल दूसरी कंपनियां यही करने को कहेंगी। साहित्य अकादेमी की देखा देखी हिंदी अकादेमी या दूसरी संस्थाएं भी इस होड़ में पड़ सकती हैं। एक और खतरा है हमारे देश में विदेशी वस्तु ज़्यादा चलती है। कल हो सकता है इस बात पर असंतोष या विवाद हो कि हमें सामसुंग सम्मान की जगह साहित्य अकादेमी पुरस्कार देकर अपमानित किया गया। हो सकता है कल सामसुंग अपने इन विजेताओं को अपने देश में काम के लिए या घूमने के लिए आमंत्रित करे तब और सिर फुटव्वल होगा। आखिर बैठे बैठाए साहित्य अकादेमी यह ख़तरा क्यों मोल ले रही है। एक व्यवसायिक मल्टीनेशनल के साहित्यिक मूल्य क्या हो सकते हैं सिवाय इसके अपने व्यवसाय में किसी सम्मानित संस्था का कैसे बाज़ारीय उपयोग किया जा सकता है। एक बार इस तरह की सम्मानित संस्था अगर किसी व्यावसायिक कंपनी के प्रचार का माध्यम बनी फिर उसकी स्वायत्तता और प्रतिष्ठा कानपुर की गंगा की धारा की तरह हो जाती है जिसमें हज़ारों टन टेनरीज़ के क्रोमियम आदि मिश्रित ज़हरीले नाले गिरकर उसकी तासीर और शक्ल बदल देते हें। अलबत्ता नाम तो गंगा ही रहता है पर आदमी आचमन करता भी डरता है। यह भी एक दृष्टिकोण है कि भाषाई लेखक कब तक कड़की में जीता रहेगा। उससे बचने के अनेक तरीके हैं। सामसुंग भी अपने पैसे से नोबेल न्यास की तरह अपनी संस्था विश्व भर की भाषाओं के लिए आरंभ कर सकता है। लेकिन एक कहावत है कि जब दूध खरीदे मिल जाए तो भैंस कौन बांधे।
अकादेमी के सचिव ने मुझे पत्र लिखकर इस वर्ष के वार्षिक उत्सव में डा. लोहिया पर आयोजित किए जाने वाले राष्ट्रीय सेमिनार में आमंत्रित किया है। जब सामसुंग को सरपरस्ती दे रहे हैं तो डा लोहिया जैसे अपना काते अपना पहनो वाले ज़मीनी चिंतक पर सेमिनार करने की क्या तुक है। जब मैंने लोहेया जी पर आलेख लिखवाने के प्रसेताव रखा था तो कर्क दिया गया था अगर उन पर लिखवाया गया तो अन्य राजनीतिज्ञों की ओर से भी दबाव पड़ेगा। मैंने ईमेल द्वारा लिखा है कि समाचार पत्रों में पढ़ा है कि अकादमी अपनी स्वायत्तता मल्टीनेशनल कंपनी को बेच रही है क्या सही है। मेरा लोहिया जी से संबंध रहा है इसलिए मैं एक दिन को आ सकता हूं। कोई जवाब नहीं आयी। बाद में फोन आया कि आप एक दिन को ही आइए। मुझे कहना पड़ा पत्र का जवाब मिलने पर निश्चित करूंगा। देश का पानी बिक गया, जंगल बिक रहे हैं, हर चीज़ आन सेल है। क्या साहित्य अकादमी जैसी संवेदनलशील संस्था जो एक ऐसे छतनार दरख्त की तरह है जिस पर देश की 24 भाषाओं के घोसले हैं, उस पर भी मल्टीनेशनल का नाग सरसराता हुआ आकर घोसला बना लेगा? और एक एक करके उन भाषाओं की रचनात्मक स्वायत्तता को चट कर जाएगा जो अपनी रचनात्मकता को निर्विघ्न जी रही हैं। राजनीतिज्ञ और नौकरशाही इस संवेदनशीलता को क्या समझें पर इतने लेखक, बड़े और छोटे, जो वहां बैठे हैं, और स्वायत्तता के कस्टोडियन हैं, वे भी क्या उतने ही असंवेदनशील हो गए हैं? यह सवाल आज सामने नहीं लेकिन जब अन्य कंपनियों का दबाव बढ़ेगा तो पता नहीं भारतीय लेखको का क्या होगा। लाजवंती को बच्चा छुए या बड़ा हर हालत में मुर्झाती है। उसको माली हो या अकादेमी जैसी संस्थाएं उन्हें वातावरण और धरती के अनुसार ध्यान रखना पड़ता है। ज़्यादा केमिकल्स का विपरीत असर हो सकता है। बल्कि होता है।
देसी रंग
हमारे भाषाई बुद्धिजीवी जिनकी बाज़ारवाद में पैठ है उन्हें केवल विदेश में ही रंग नज़र आते हैं। हमारे देश में तो हर मौसम को अलग अलग रंग सजाते हैं। पलाश जैसे गाढ़े रंग भी है, अमलतास जैसे पीले रंग पत्तों तक को अपने रंग से रंग देते हैं, कचनार के विभिन्न रंग सफेद, बैंजनी, फ़िरोज़ी जब खिलते हैं तो लगता है रंग भरी थाली बिखेर दी गई है। गर्मी में धूप की चुभन को अमलतास के रंग ऐसे राहत देते हैं जैसे आंखों में गुलाबजल डाल दिया गया हो। अमरबेल तक अपनी चुनरी रंग लेती है। चमेली, जूही, गदराया मोगरा, चांदनी सब सफ़ेद होते
लेकिन उस समय कि तानाशाही से अधिक खतरनाक बात अब सामने आ रही है। सामसुंग मल्टीनेशन कंपनी के साथ समझौता हुआ है कि अकादमी 24 भाषाओं में सामसुंग की तरफ़ से भी रवीन्द्र पुरस्कार देगी। सुना है विदेश मंत्रालय के कहने पर अकादमी ने यह निर्णय लिया है। सवाल है कि क्या बोर्ड या जनरल काउंसिल की बाध्यता है कि सरकार का ऐसा प्रस्ताव माने जो उस संस्था की मूल भावना व प्रकृति के विपरीत हो? इस समय साहित्य अकादमी का पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक सम्मानित माना जाता है। किसी भी देश की अकादमी आफ लेटर्स द्वारा दिया जाना वाला सम्मान संसार भर में सम्मान से देखा जाता है। सामसुंग सम्मान की क्या स्थिति होगी? सामसुंग पुरस्कार एक मल्टीनेशल कंपनी द्वारा दिया जाने वाला प्राइवेट पुरस्कार होगा। उस पर ठप्पा साहित्य अकादेमी का लगवाकर उसे अंतर्राष्ट्रीय वेलिडिटी दिलाने की चाल मात्र लगती है। विश्व की साहित्यिक सस्थाओं के बीच आदान प्रदन का तो कोई अर्थ हो सकता है लेकिन मल्टिनेशनल कंपनी का सीधा सा उद्देश्य है इस बात का विज्ञापन कि हम तुम्हारे साहित्य का प्रचार कर रहे हैं, कल दूसरी कंपनियां यही करने को कहेंगी। साहित्य अकादेमी की देखा देखी हिंदी अकादेमी या दूसरी संस्थाएं भी इस होड़ में पड़ सकती हैं। एक और खतरा है हमारे देश में विदेशी वस्तु ज़्यादा चलती है। कल हो सकता है इस बात पर असंतोष या विवाद हो कि हमें सामसुंग सम्मान की जगह साहित्य अकादेमी पुरस्कार देकर अपमानित किया गया। हो सकता है कल सामसुंग अपने इन विजेताओं को अपने देश में काम के लिए या घूमने के लिए आमंत्रित करे तब और सिर फुटव्वल होगा। आखिर बैठे बैठाए साहित्य अकादेमी यह ख़तरा क्यों मोल ले रही है। एक व्यवसायिक मल्टीनेशनल के साहित्यिक मूल्य क्या हो सकते हैं सिवाय इसके अपने व्यवसाय में किसी सम्मानित संस्था का कैसे बाज़ारीय उपयोग किया जा सकता है। एक बार इस तरह की सम्मानित संस्था अगर किसी व्यावसायिक कंपनी के प्रचार का माध्यम बनी फिर उसकी स्वायत्तता और प्रतिष्ठा कानपुर की गंगा की धारा की तरह हो जाती है जिसमें हज़ारों टन टेनरीज़ के क्रोमियम आदि मिश्रित ज़हरीले नाले गिरकर उसकी तासीर और शक्ल बदल देते हें। अलबत्ता नाम तो गंगा ही रहता है पर आदमी आचमन करता भी डरता है। यह भी एक दृष्टिकोण है कि भाषाई लेखक कब तक कड़की में जीता रहेगा। उससे बचने के अनेक तरीके हैं। सामसुंग भी अपने पैसे से नोबेल न्यास की तरह अपनी संस्था विश्व भर की भाषाओं के लिए आरंभ कर सकता है। लेकिन एक कहावत है कि जब दूध खरीदे मिल जाए तो भैंस कौन बांधे।
अकादेमी के सचिव ने मुझे पत्र लिखकर इस वर्ष के वार्षिक उत्सव में डा. लोहिया पर आयोजित किए जाने वाले राष्ट्रीय सेमिनार में आमंत्रित किया है। जब सामसुंग को सरपरस्ती दे रहे हैं तो डा लोहिया जैसे अपना काते अपना पहनो वाले ज़मीनी चिंतक पर सेमिनार करने की क्या तुक है। जब मैंने लोहेया जी पर आलेख लिखवाने के प्रसेताव रखा था तो कर्क दिया गया था अगर उन पर लिखवाया गया तो अन्य राजनीतिज्ञों की ओर से भी दबाव पड़ेगा। मैंने ईमेल द्वारा लिखा है कि समाचार पत्रों में पढ़ा है कि अकादमी अपनी स्वायत्तता मल्टीनेशनल कंपनी को बेच रही है क्या सही है। मेरा लोहिया जी से संबंध रहा है इसलिए मैं एक दिन को आ सकता हूं। कोई जवाब नहीं आयी। बाद में फोन आया कि आप एक दिन को ही आइए। मुझे कहना पड़ा पत्र का जवाब मिलने पर निश्चित करूंगा। देश का पानी बिक गया, जंगल बिक रहे हैं, हर चीज़ आन सेल है। क्या साहित्य अकादमी जैसी संवेदनलशील संस्था जो एक ऐसे छतनार दरख्त की तरह है जिस पर देश की 24 भाषाओं के घोसले हैं, उस पर भी मल्टीनेशनल का नाग सरसराता हुआ आकर घोसला बना लेगा? और एक एक करके उन भाषाओं की रचनात्मक स्वायत्तता को चट कर जाएगा जो अपनी रचनात्मकता को निर्विघ्न जी रही हैं। राजनीतिज्ञ और नौकरशाही इस संवेदनशीलता को क्या समझें पर इतने लेखक, बड़े और छोटे, जो वहां बैठे हैं, और स्वायत्तता के कस्टोडियन हैं, वे भी क्या उतने ही असंवेदनशील हो गए हैं? यह सवाल आज सामने नहीं लेकिन जब अन्य कंपनियों का दबाव बढ़ेगा तो पता नहीं भारतीय लेखको का क्या होगा। लाजवंती को बच्चा छुए या बड़ा हर हालत में मुर्झाती है। उसको माली हो या अकादेमी जैसी संस्थाएं उन्हें वातावरण और धरती के अनुसार ध्यान रखना पड़ता है। ज़्यादा केमिकल्स का विपरीत असर हो सकता है। बल्कि होता है।
देसी रंग
हमारे भाषाई बुद्धिजीवी जिनकी बाज़ारवाद में पैठ है उन्हें केवल विदेश में ही रंग नज़र आते हैं। हमारे देश में तो हर मौसम को अलग अलग रंग सजाते हैं। पलाश जैसे गाढ़े रंग भी है, अमलतास जैसे पीले रंग पत्तों तक को अपने रंग से रंग देते हैं, कचनार के विभिन्न रंग सफेद, बैंजनी, फ़िरोज़ी जब खिलते हैं तो लगता है रंग भरी थाली बिखेर दी गई है। गर्मी में धूप की चुभन को अमलतास के रंग ऐसे राहत देते हैं जैसे आंखों में गुलाबजल डाल दिया गया हो। अमरबेल तक अपनी चुनरी रंग लेती है। चमेली, जूही, गदराया मोगरा, चांदनी सब सफ़ेद होते
Tuesday, 10 November 2009
कहां है संविधान और कहां है जनतंत्र?
मैं संविधान और जनतंत्र की बात क्यों कर रहा हूं? फिर सोचता हूं सब ही कर रहे हैं तो मैं भी कर रहा हूं तो क्या गुनाह कर रहा हूं? जब संज्ञाएं और शब्द अर्थ खो देते हैं तो उनका कोई महत्त्व नहीं रहता। ऐसे में अर्थहीन शब्द बोलना गुनाह नहीं रहता। जब किसी भाषा का कोई महत्त्व नहीं रहता तो शब्दों का ही क्या मतलब रह जाता है। भाषा से भले ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी न बनें पर साहित्य, इतिहास, समाजविज्ञान के मूल में भाषा ही होती है। संविधान की भी भाषा ही है। उसमें सब भारतीय भाषाओं को समान माना। हिंदी और अंग्रेज़ी को संपर्क भाषाएं मान लिया गया। एक साज़िश की गई कि हिंदी राज भाषा बना दी गई। दोनों भाषाएं, एक विदेशी भाषा और वह भाषा जिसमें आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी एक नाव में सवार हो गई। हिंदी राजभाषा बनाकर दूसरी भाषाओं की आंख की किरकिरी बना दी गई। यह भाषाओं को बांटने की सोची समझी राजनीतिक साज़िश थी। उसका विकृत नतीजा 9 नवंबर 09 को महाराष्ट्र की विधान सभा में देखने को मिला। यह संविधान का सम्मान है या विधान सभा का या आदमियत का? अब इस सवाल को राजनीतिज्ञ ही सुलझाएंगे। इसे न बुद्धीजीवी सुलझा सकते हैं और न साधु संत और न विधिवेत्ता। जिन्होंने यह अवलेह घोटा है उन्हें ही चखना पड़ेगा। तीन क्या चार भाषाओं में शपथ ली गई। मराठी में, संस्कृत में, हिंदी में और अंग्रजी में। मराठी में तो ली जानी थी। एक तो मनसा के अध्यक्ष राज ठाकरे का तानाशाही हुक्मनामा, दूसरे राज्य की भाषा। हुक्म डराने वाला था कि मराठी में शपथ न लेने पर दंडित किया जाएगा। तुम कौन, जन प्रतिनिधियों के नाम संविधान विरोधी हुक्मनामा जारी करने वाले? आप अपील करते तो भी एक बात थी। ऐसा करना भी अधिकार के बाहर की बात थी। एक बाहरी आदमी का सदन के चुने गए सदस्यों को हुक्म जारी करना सदन और अध्यक्ष की अवमानना है। दुसरे संविधान में किसी भी भाषा में शपथ लेने की दी गई छूट और संवैधानिक अधिकार में ख़लअंदाज़ी है। यह नया तानाशाह पिछले सप्ताह भर से संविधान विरोधी आदेशों की बरसात कर रहा था लेकिन न तो सरकार ने इसका वरोध किया और न इस असंवैधिनक स्वयंभू तानाशाह के खिलाफ़ कानूनी कार्यवाही की गई। दो ही बातें हो सकती हैं या तो सरकार डरती है या फिर तरह दे रही थी। गैरकानूनी काम के खिलाफ़ तत्काल कार्यवाही न करना उसे वैधता देना है। अराजकता पैदा करना है। सपा के चुने हुए सदस्य अबु आज़मी का यह अधिकार था कि वह किसी भी भाषा में शपथ ले। उन्होंने इस अधिकार का उपयोग किया। वैसे भी अपने को लोहिया जी का अनुयायी मानने वाला व्यक्ति अपने नेता का भाषा वाले निर्देश का पालन उसी पकार कर रहा था जिस प्रकार मनसा के आततायी सदस्यों ने राज ठाकरे के निराधार और असंवैधानिक आदेश का पालन किया।
आप यानी ठाकरे परिवार हिंदी से क्यों नाराज़ है? राज ठाकरे तो ज़हर घोले बैठा है,हिंदी के खिलाफ़ भी और हिंदी वालों के खिलाफ़ भी। जबकि देवनागरी यानी लिपि को बहुत अच्छी तरह मराठी ने अपनाई है। शायद इसीलिए कि मराठी और हिंदी भाषियों की डोर दोनों को बांधे रहेगी। पराडकर जी ने हिंदी पत्रकारिता को परवान चढ़ाया। दरअसल हिंदी के समर्थक अहिंदी भाषी ही रहे, गांधी, तिलक, और स्वामी दयानंद से लेकर पराडकर जी तक। इस बार अंग्रेज़ी में शपथ ली गई तो मनसा के गुंडे कहूं या महान प्रदेश भक्त क्यों नहीं बोले, क्या वह मराठी की सगी थी? संस्कृत में ली गई। वह मराठी नहीं थी। सिर्फ हिंदी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि मनसा के सदस्यों ने सम्मानित राजनीति पार्टी के सम्मानित सदस्य को पीटा। राज ठाकरे जी , मैं आपके नाम के आगे जी इस लिए लगा रहा हूं कि आप एक पार्टी के नेता हैं। नहीं तो शायद नाम भी न लेता। मराठी गुंडा कहना मुझे गवारा नहीं हुआ। आप आइए उत्तर प्रदेश में देखिए मराठी कितने सम्मान के साथ रखे जाते हैं। शिक्षा संस्थाओं में अध्यापक ही नहीं प्रचार्य भी बड़ी संख्यां में हैं। इसलिए नहीं के बहुत योग्य हैं बल्कि इसलिए स्थानीय लोगों के साथ वे घुल मिल गए हैं। आई आई टी कानपुर के पहले निदेशक मराठी थे। उन्होंने उन लोगों के अधिकार को नज़रअंदाज़ करके जिनकी ज़मीने आई आई टी बसाने के लिए ली गई थीं, मराठियों का नौकरियांदीं। लेकिन कभी स्थानीय लोगों ने उफ़ नहीं की। आपके यहां जब टैक्सी चलीं तो उच्च वर्गीय मराठियों को स्वयं चलाना गवारा नहीं हुआ। वे उत्तर भारत से ड्राइवर ले गए। जब उन्होंने स्वयं अपनी बना ली तो मुंबई के मानुस की भृकुटि तन गई। आजकल आई आई टी कानपुर के निदेशक भी मराठी हैं। यही नहीं दूसरी बार हुए हैं। रजिस्ट्रार भी मराठी मानुस है। लेकिन किसी के ज़ायके में कोई फ़र्क नहीं। अगर आपकी तरह सोचने लगें तो इतने बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग कैसा अनुभव करेंगे। यही दूसरे प्रदेशों में भी होगा। हिंदुस्तान मानवीय रिश्तों का सम्मान करना जानता है। उत्तर भारत तो ख़ासतौर से। दक्षिण और देश के अन्य भागों में विज्ञान की पी जी स्तर की शिक्षा की कम संस्थाएं थीं। सब जगह से बच्चे कानपुर लखनऊ आदि बड़े शहरों में पढ़ने आते थे। यही मेडिकल शिक्षा की स्थिति थी। कभी किसी ने न भाषा का सवाल उठाया और न परदेसी होने का, जो आप उठा रहे हैं। श्रीमन्, आप नहीं जानते, जानते हैं तो समझना नहीं चाहते कि देश को अलगाववाद की किस आग में झोंक रहे हैं। राजनीतिज्ञ तो अपनी रोटी सेक लेता है आम आदमी का चूल्हा भी नहीं सुलगता। अब ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिज्ञों से बड़े स्वार्थी इन्द्र भी नहीं। क्षमा करें गांधी ने तो संसद को ही वेश्या बताया था हमारे राजनीतिज्ञों ने तो जनतंत्र को भी उसी पैराय पर ला खड़ा किया। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल में उनकी भाषा को पशेमान किया था। बंगला-वंगला कुछ नहीं उर्दू सब कुछ है। राज साहब भी उसी रास्ते पर हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा वह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन मनसा ने यह सोचे समझे बिना चिंगारी फेंक दी कि जो तरह देंगे वे तक हाथ जला बैठेंगे। तटस्थ रहेंगे तो मौजे ए तलातुम उनको भी नहीं बक्शेगी।
ईस्ट इंडिया द्वारा पेशवाओं को पुणे से निकाल दिए जाने पर उत्तर भारत ने ही उनकी पेशवाई की इज़्जत बचाई थी। उत्तर भारत के लोगों ने ही उनका साथ दिया था। आज भी बिठुर के खंडहर पेशावाओं पर गोरों के प्रकोप की गवाही दे रहे हैं। वहीं उन सबकी याद को नानाराव पार्क, मैसेकर घाट यानी नानाराव घाट, तात्या टोपे के स्मारक उनका परिवार उन सबकी याद ताज़ा कराते हैं। वे माहराष्ट्र से अधिक उत्तर भारत के पुरखे हैं। कई मराठी धुलेकर जी आदि सम्मानीय जननेता रहे हैं। वे सब मराठी भी बोलते थे हिंदी भी बोलते थे। आज भी उत्तर भात में रहने वाले मराठी दोनों भाषाएं बोलते हैं। कोई नहीं कहता हिन्दी ही बोलिए। वे सम्मान से ही नहीं रह रहे रोज़ीरोटी भी कमा रहे हैं। महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीयों की तरह उन पर किसी तरह की न बंदिश है न संकट है। न होना चाहिए। बाल ठाकरे का यह इलज़ाम कि अब्बु आज़मी को हिंदी में शपथ लेने से रोका नहीं गया निहायत अपरिपक्व है। लगता है कि वाक़ई खून पानी से अधिक गाढ़ा होता है। भतीजे और भाषा का पक्ष लेना संविधान के सम्मान से अधिक ज़रूरी है। ताज्जुब की बात है कि अंग्रेज़ी में शपथ लेनेवालों के लिए इस वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने कुछ नहीं कहा कि उससे महाराष्ट्र और मराठी की अवमानना नहीं हुई, शायद सम्मान बढ़ा। जिन पेशावाओं को अंग्रेज़ों ने बेइज़्जत किया हिंदी वालों ने उनका साथ दिया वह हिंदी शिवसेना और मनसा की दुश्मन है और अंग्रेज़ी सगी। भाषा कोई गैर नहीं होती न उसके प्रवाह को रोका जा सकता है। ठाकरे साहबान, इंसान से अधिक भाषाएं आपस में लेन देन करती हैं। हम जितने संकुचित और छोटे दिलों के हैं भाषाएं कहीं ज्यादा फ़राख़दिल हैं। एक ज़माना था जब ब्रिटिश संसद में अंग्रेज़ी बोलने वालों पर मनसा की तरह फ्रांसिसी भाषा प्रेमी मनसा की तरह आक्रमण करके हाथ पैर तोड़ देते थे। लेकिन क्या वे अंग्रेज़ी का कुछ बिगाड़ पाए। भाषा अपना रास्ता बनाने के साथ साथ अपने रास्ते के अवरोध भी स्वयं हटाती है। हिंदी भी यही कर रही है अपनी बहनों का सम्मान रखते हुए आगे बढ़ रही है। हिंदी का लिपि के कारण दामन चोली का साथ है। दामन उतारोगे तो बेपर्दगी होगी, चोली उतारोगे तो शर्मज़दा होगे।
आप यानी ठाकरे परिवार हिंदी से क्यों नाराज़ है? राज ठाकरे तो ज़हर घोले बैठा है,हिंदी के खिलाफ़ भी और हिंदी वालों के खिलाफ़ भी। जबकि देवनागरी यानी लिपि को बहुत अच्छी तरह मराठी ने अपनाई है। शायद इसीलिए कि मराठी और हिंदी भाषियों की डोर दोनों को बांधे रहेगी। पराडकर जी ने हिंदी पत्रकारिता को परवान चढ़ाया। दरअसल हिंदी के समर्थक अहिंदी भाषी ही रहे, गांधी, तिलक, और स्वामी दयानंद से लेकर पराडकर जी तक। इस बार अंग्रेज़ी में शपथ ली गई तो मनसा के गुंडे कहूं या महान प्रदेश भक्त क्यों नहीं बोले, क्या वह मराठी की सगी थी? संस्कृत में ली गई। वह मराठी नहीं थी। सिर्फ हिंदी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि मनसा के सदस्यों ने सम्मानित राजनीति पार्टी के सम्मानित सदस्य को पीटा। राज ठाकरे जी , मैं आपके नाम के आगे जी इस लिए लगा रहा हूं कि आप एक पार्टी के नेता हैं। नहीं तो शायद नाम भी न लेता। मराठी गुंडा कहना मुझे गवारा नहीं हुआ। आप आइए उत्तर प्रदेश में देखिए मराठी कितने सम्मान के साथ रखे जाते हैं। शिक्षा संस्थाओं में अध्यापक ही नहीं प्रचार्य भी बड़ी संख्यां में हैं। इसलिए नहीं के बहुत योग्य हैं बल्कि इसलिए स्थानीय लोगों के साथ वे घुल मिल गए हैं। आई आई टी कानपुर के पहले निदेशक मराठी थे। उन्होंने उन लोगों के अधिकार को नज़रअंदाज़ करके जिनकी ज़मीने आई आई टी बसाने के लिए ली गई थीं, मराठियों का नौकरियांदीं। लेकिन कभी स्थानीय लोगों ने उफ़ नहीं की। आपके यहां जब टैक्सी चलीं तो उच्च वर्गीय मराठियों को स्वयं चलाना गवारा नहीं हुआ। वे उत्तर भारत से ड्राइवर ले गए। जब उन्होंने स्वयं अपनी बना ली तो मुंबई के मानुस की भृकुटि तन गई। आजकल आई आई टी कानपुर के निदेशक भी मराठी हैं। यही नहीं दूसरी बार हुए हैं। रजिस्ट्रार भी मराठी मानुस है। लेकिन किसी के ज़ायके में कोई फ़र्क नहीं। अगर आपकी तरह सोचने लगें तो इतने बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग कैसा अनुभव करेंगे। यही दूसरे प्रदेशों में भी होगा। हिंदुस्तान मानवीय रिश्तों का सम्मान करना जानता है। उत्तर भारत तो ख़ासतौर से। दक्षिण और देश के अन्य भागों में विज्ञान की पी जी स्तर की शिक्षा की कम संस्थाएं थीं। सब जगह से बच्चे कानपुर लखनऊ आदि बड़े शहरों में पढ़ने आते थे। यही मेडिकल शिक्षा की स्थिति थी। कभी किसी ने न भाषा का सवाल उठाया और न परदेसी होने का, जो आप उठा रहे हैं। श्रीमन्, आप नहीं जानते, जानते हैं तो समझना नहीं चाहते कि देश को अलगाववाद की किस आग में झोंक रहे हैं। राजनीतिज्ञ तो अपनी रोटी सेक लेता है आम आदमी का चूल्हा भी नहीं सुलगता। अब ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिज्ञों से बड़े स्वार्थी इन्द्र भी नहीं। क्षमा करें गांधी ने तो संसद को ही वेश्या बताया था हमारे राजनीतिज्ञों ने तो जनतंत्र को भी उसी पैराय पर ला खड़ा किया। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल में उनकी भाषा को पशेमान किया था। बंगला-वंगला कुछ नहीं उर्दू सब कुछ है। राज साहब भी उसी रास्ते पर हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा वह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन मनसा ने यह सोचे समझे बिना चिंगारी फेंक दी कि जो तरह देंगे वे तक हाथ जला बैठेंगे। तटस्थ रहेंगे तो मौजे ए तलातुम उनको भी नहीं बक्शेगी।
ईस्ट इंडिया द्वारा पेशवाओं को पुणे से निकाल दिए जाने पर उत्तर भारत ने ही उनकी पेशवाई की इज़्जत बचाई थी। उत्तर भारत के लोगों ने ही उनका साथ दिया था। आज भी बिठुर के खंडहर पेशावाओं पर गोरों के प्रकोप की गवाही दे रहे हैं। वहीं उन सबकी याद को नानाराव पार्क, मैसेकर घाट यानी नानाराव घाट, तात्या टोपे के स्मारक उनका परिवार उन सबकी याद ताज़ा कराते हैं। वे माहराष्ट्र से अधिक उत्तर भारत के पुरखे हैं। कई मराठी धुलेकर जी आदि सम्मानीय जननेता रहे हैं। वे सब मराठी भी बोलते थे हिंदी भी बोलते थे। आज भी उत्तर भात में रहने वाले मराठी दोनों भाषाएं बोलते हैं। कोई नहीं कहता हिन्दी ही बोलिए। वे सम्मान से ही नहीं रह रहे रोज़ीरोटी भी कमा रहे हैं। महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीयों की तरह उन पर किसी तरह की न बंदिश है न संकट है। न होना चाहिए। बाल ठाकरे का यह इलज़ाम कि अब्बु आज़मी को हिंदी में शपथ लेने से रोका नहीं गया निहायत अपरिपक्व है। लगता है कि वाक़ई खून पानी से अधिक गाढ़ा होता है। भतीजे और भाषा का पक्ष लेना संविधान के सम्मान से अधिक ज़रूरी है। ताज्जुब की बात है कि अंग्रेज़ी में शपथ लेनेवालों के लिए इस वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने कुछ नहीं कहा कि उससे महाराष्ट्र और मराठी की अवमानना नहीं हुई, शायद सम्मान बढ़ा। जिन पेशावाओं को अंग्रेज़ों ने बेइज़्जत किया हिंदी वालों ने उनका साथ दिया वह हिंदी शिवसेना और मनसा की दुश्मन है और अंग्रेज़ी सगी। भाषा कोई गैर नहीं होती न उसके प्रवाह को रोका जा सकता है। ठाकरे साहबान, इंसान से अधिक भाषाएं आपस में लेन देन करती हैं। हम जितने संकुचित और छोटे दिलों के हैं भाषाएं कहीं ज्यादा फ़राख़दिल हैं। एक ज़माना था जब ब्रिटिश संसद में अंग्रेज़ी बोलने वालों पर मनसा की तरह फ्रांसिसी भाषा प्रेमी मनसा की तरह आक्रमण करके हाथ पैर तोड़ देते थे। लेकिन क्या वे अंग्रेज़ी का कुछ बिगाड़ पाए। भाषा अपना रास्ता बनाने के साथ साथ अपने रास्ते के अवरोध भी स्वयं हटाती है। हिंदी भी यही कर रही है अपनी बहनों का सम्मान रखते हुए आगे बढ़ रही है। हिंदी का लिपि के कारण दामन चोली का साथ है। दामन उतारोगे तो बेपर्दगी होगी, चोली उतारोगे तो शर्मज़दा होगे।
Thursday, 5 November 2009
अपणी ढोणी
राजस्थानी के लिए तो समझना कठिन नहीं है कि अपणी ढोणी क्या है। लेकिन बिना देखे और जाने किसी दूसरे प्रदेश वासी के लिए शायद आसान न हो। किसी भी प्रदेश के रहने वाले क्यों न हों, हम लोग अपनी ग्रामीण संस्कृति की न शब्दावली से रले मिले रहे और न जीवन से। बस सुने सुनाए नाम याद रह गए हों तो बात अलग है। लेकिन उनका नाता आम आदमी से क्या है, संवेदना से क्या है, उसकी अर्थवत्ता क्या है यह सब समझना आसान नहीं है। किसी भी शब्द के अर्थ से तब तक समरसता नहीं होती जब तक जीवन में उसका उपयोग न हो और संवेदना से रिश्ता न बने। यह बात इस बार संगमन के कार्यक्रम मे उदयपुर गए तो समझ में आई। मेरे मेज़बान, संबंधी तथा मेडिकल कालेज के बालरोग विभाग के अध्यक्ष डा ए पी गुप्ता ने अंतिम दिन कहा कि आज बाहर खाना खाया जाए। कहां? वे बोले एक ऐसी जगह जो आपने पहले कभी देखी नहीं होगी। मैंने कहा इस बात का ध्यान रखिएगा मैं और मेरी पत्नी पूरी तरह निरामिष हैं। वे दोनों स्वयं भी निरामिष हैं। इसीलिए अपणी ढोणी ले चल रहे हैं। वहां प्याज़ और लहसुन का प्रयोग भी कम प्रयोग होता है। यह नाम एकाएक समझ में नहीं आया। जब उन्होंने बताया इसका मतलब है अपनी झोपड़ी या कुटिया। भोजनालयों के अंगीठी, रसोई, साझाचूल्हा आदि नाम तो हमारी तरफ़ चलते थे। यह नया नाम था। वह ढोणी शहर से दूरी पर एक पहाड़ी पर थी। एकदम ऊबड़ खाबड, गांव का सा वातावरण। कार एक तरफ़ खड़ी की। थोड़ी दूर एक गेट था जिस पर बंदनवारें लटकी थी। ढोल बज रहा था। गेट पर एक आदमी पगड़ी वगड़ी बांधे राजस्थानी धोती पहने अंदर जाने वालों के तिलक लगाकर स्वागत कर रह था। उसकी थाली में लोग रूपये डाल देते थे। चढ़ाई के बाद ऊपर पहुंचे। वहां खाटें बिछीं थी। कुर्सियां भी थीं। राजस्थानी लोकगीत पर एक महिला ग्रामीण नृत्य कर रही थी। छाछ और पापड़ अतिथियों को पेश किया जा रहा था। एक छोटी ढोनी जादूगरी की थी। कहीं कपुतली का नाच हो रहा था। ऊंट की सवारी का इंतज़ाम था। यानी पूरा देहाती मेले का तामझाम था।तभी बारिश होने लगी।जिसको जहां जग मिली घुस गया। जादू की ढोनी जो ठंडी पड़ी थी गर्मा गई। जादूगर ने एक के तीन कबूतर बना दिए। बोला हाथ की सफ़ाई, पेट की कमाई।
असली बात थी जिम्मन की। ज़मीन में पटोरे बिछे थे। सामने चौकियां लगी थीं। हर जाति, धर्म का आदमी उस पंगत में मौजूद था। सब लोग खुशी से सजे बैठे थे। मैं सोच रहा था। हम लोग कितने आधुनिक हो गए। इन रवायतों को भूल गए। इसीलिए उसकी पुनर्प्रस्तुति का आयोजन करके कितने ख़ुश होते हैं। कई राजस्थानी टहलुए खाना परस रहे थे। लग रहा था जैसे किसी ब्याह शादी की पंगत हो। गट्टे की सब्ज़ी, पनीर, आलू, रायता दाल घी, बाटी, ताज़ा निकला मक्खन, गुड़ मक्का बाजरे की रोटी। यानी सब राजस्थानी ठाठ में रचे बसे थे। हालांकि छोटे स्तर पर ऐसा देहाती आयोजन कभी कभार परिवारों में भी किया जा सकता है। लकिन सब क्या, अधिकतर घरों में, डायनिंग टेबिल स्थायी रूप से थिर हो गई। उसे कौन खिसका सकता है। सब से महत्त्वपूर्ण था मनुहार का कार्यक्रम। पहले एक बार गर्म गर्म जलेबी परसी गई। फिर एक आदमी आया। उसके हाथ मेंजलेबी से भरी थाली थी। वह सबको अपनी तरफ़ से नाम देता जा रहा था और सीधे मुहं में जलेबी रखता जा रहा था। एक के बाद एक जब तक वह मुंह ही न फेर ले। वह मुंह में जलेबी रखता जाता था कहता जाता था वाह जी राम नारायण, एक राम के नाम की। महिला हुई तो ज़नाना नाम, मुसलमान हुआ तो कहता हां जी हमीदा बीबी। सब पंगत हंस हंस कर लोटपोट थी। उसके हाथ से जलेबी खाने और अपना नया नामकरण कराने में हर किसी को मज़ा आ रहा था।
सबसे बड़ी बात हिंदू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्मण, और अन्य जाति सब उसके ही हाथ से बिना भेद भाव के खा रहे थे। तबसे मेरे दिमाग में यह सवाल घूम रहा है गांव के एक प्रायोजित वातावरण में इन स्थितियों में हम फूले नहीं समाते लेकिन इस आत्मीयता को ज़िंदगी की वास्तविकता बना लेने में हमें गुरेज़ है। गांव हमारे लिए सपने की चीज़ हो गई। मसनूई गांव बनाकर उसमें कुछ समय जीना हमें तरोताज़ा कर देता है। वाह जी वाह!
असली बात थी जिम्मन की। ज़मीन में पटोरे बिछे थे। सामने चौकियां लगी थीं। हर जाति, धर्म का आदमी उस पंगत में मौजूद था। सब लोग खुशी से सजे बैठे थे। मैं सोच रहा था। हम लोग कितने आधुनिक हो गए। इन रवायतों को भूल गए। इसीलिए उसकी पुनर्प्रस्तुति का आयोजन करके कितने ख़ुश होते हैं। कई राजस्थानी टहलुए खाना परस रहे थे। लग रहा था जैसे किसी ब्याह शादी की पंगत हो। गट्टे की सब्ज़ी, पनीर, आलू, रायता दाल घी, बाटी, ताज़ा निकला मक्खन, गुड़ मक्का बाजरे की रोटी। यानी सब राजस्थानी ठाठ में रचे बसे थे। हालांकि छोटे स्तर पर ऐसा देहाती आयोजन कभी कभार परिवारों में भी किया जा सकता है। लकिन सब क्या, अधिकतर घरों में, डायनिंग टेबिल स्थायी रूप से थिर हो गई। उसे कौन खिसका सकता है। सब से महत्त्वपूर्ण था मनुहार का कार्यक्रम। पहले एक बार गर्म गर्म जलेबी परसी गई। फिर एक आदमी आया। उसके हाथ मेंजलेबी से भरी थाली थी। वह सबको अपनी तरफ़ से नाम देता जा रहा था और सीधे मुहं में जलेबी रखता जा रहा था। एक के बाद एक जब तक वह मुंह ही न फेर ले। वह मुंह में जलेबी रखता जाता था कहता जाता था वाह जी राम नारायण, एक राम के नाम की। महिला हुई तो ज़नाना नाम, मुसलमान हुआ तो कहता हां जी हमीदा बीबी। सब पंगत हंस हंस कर लोटपोट थी। उसके हाथ से जलेबी खाने और अपना नया नामकरण कराने में हर किसी को मज़ा आ रहा था।
सबसे बड़ी बात हिंदू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्मण, और अन्य जाति सब उसके ही हाथ से बिना भेद भाव के खा रहे थे। तबसे मेरे दिमाग में यह सवाल घूम रहा है गांव के एक प्रायोजित वातावरण में इन स्थितियों में हम फूले नहीं समाते लेकिन इस आत्मीयता को ज़िंदगी की वास्तविकता बना लेने में हमें गुरेज़ है। गांव हमारे लिए सपने की चीज़ हो गई। मसनूई गांव बनाकर उसमें कुछ समय जीना हमें तरोताज़ा कर देता है। वाह जी वाह!
Wednesday, 9 September 2009
हिंदी राजभाषा होने का अर्थ
मैं यह कह सकता हूं और कहना भी चाहता हूं कि हिंदी का राजभाषा होना हमारे लिए सम्मान की बात है पर चाह कर भी कह नहीं पाता। ‘राजभाषा’ नेहरू सरकार द्वारा हिंदी के धंधेबाज़ों को दिया गया स्वर्ण खिलौना है। हिंदी के लिए राजभाषा नाम उस वक्त निर्मित यानी कॉयन किया था जब उसे राष्ट्रभाषा बनाने की जद्दोजहद जारी थी। यह काम किसी हिंदी वाले ने ही किया होगा सरकार की नज़रों में चढ़ने के लिए। क्योंकि अंग्रेज़ी पोषित भारतीय विद्वानों के लिए तो यह संभव नहीं था। उन्होंने तो ‘स्टेट लेंग्वेज’ की तरह अधकचरा अंग्रेज़ी पर्याय सूझ रहा होगा, उन सज्जन ने उसे हिंदी में तबदील कर दिया होगा। क्योंकि मेरे अल्पज्ञान के अनुसार तो संसार भर में उस समय हर देश की भाषा को नेशनल लैंग्वेज यानी राष्ट्रभाषा ही कहा जाता था। किसी देश में राज भाषा वाली स्थिति शायद ही रही हो। हमारे देश में हिंदी को राष्ट्र भाषा के नाम से संबोधित करना कुफ़्र तोलने की तरह था। बीच का रास्ता राजभाषा ही हो सकता था। यह ऐसा ही था जैसे पटेल बहुमत के बावजूद प्रधानमंत्री नहीं बन सके तो उन्हें उप-प्रधानमंत्री बना दिया गया। राजभाषा से क्या भाषा का विकास हुआ? भाषा को राजसम्मत नाम देकर उसका गौरव कभी नहीं बढ़ता। भाषा का संवर्धन साहित्य में प्रयुक्त उन ध्वनियों से होता है जो शब्द विभिन्न स्रोतों से आकर समाहित होते हैं। यह तभी संभव है जब किसी भाषा की स्वायत्तता एक ईकाई की तरह अक्षुण्य हो। राजभाषा और हिंदी भाषा का विचित्र समीकरण है। राजाभाषा की सरकारी कार्यालयों में सीमित भूमिका है जैसे 1. हिंदी भाषी राज्यों के अंग्रेज़ी न जानने वाली जनता के लिए अंग्रेज़ी की प्रामाणिक मानी जाने वाली दस्तावेज़ों/ शासनादेशों का अनुवाद करके लोगों तक पहुंचाना। लिखा है कि प्रामाणिक दस्तावेज़ अंग्रेज़ी की ही मानी जाएगी। 2.दफ़तरों में हिंदी उपस्कर यानी टंकनक, शब्द कोषों और टेककों का होना सुनिशचित करना। अब उसमें कंप्यूटर भी जुड़ गया। राष्ट्र स्तर पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में निर्मित राजभाषा सलाहाकार समिति के सदस्य देश भर में सरकारी खर्च पर घूम घूमकर देखेंगे कि राजभाषा का काम सुचारू रूप से चल रहा है या नहीं। 3. हिंदी निदेशालय हिंदी का प्रचार प्रसार देखेगा। 4. तकनीकी शब्दवली आयोग शब्दकोष बनाएगा जो अधिकतर कार्यालयों के बुकशेल्फ़ों में शोभायमान रहेगा आदि।
गांधी जी ने हिंद स्वराज के 18वें अध्याय में 100 साल पहले एक महत्त्वपूर्ण वाक्य लिखा था ‘सारे भारत के लिए जो भाषा चाहिए , वह हिंदी ही होगी।‘ इस वाक्य का राजभाषा एक फूहड़ मज़ाक है। आज़ादी के बाद बकौल इतिहासकार रामचंद्र गूहा के इस सबसे समझदार आदमी की बातों को रद्दी की टोकरी में, चाहे ग्रामो उत्थान की बात हो या हिंदी की उनके अनुयाइयों की सरकार ने ही फेंका। इस काम में उस समय के हिंदी के अलंबारदार भी अपनी चुप्पी के साथ शरीक थे। हिंद स्वराज के 20वें अध्याय में उन्होंने अंग्रेज़ों को यह कहकर ललकारा था भारत की भाषा अंग्रेज़ी नहीं है, हिंदी है। वह आपको सीखनी पड़ेगी। और हम तो आपके साथ अपनी भाषा में ही व्यवहार करेंगे। हुआ उलटा, ललकार भारतियों पर ही लागू कर दी गई। भारत को सब भाषाएं भूलकर अंग्रेज़ीमय होना होगा। सरकार अंग्रेज़ी में ही काम करेगी। हुकूमत का उद्देश्य पूरा हुआ। जब पंद्रह पंद्रह साल की अवधि बढ़ाकर हिंदी को ही संपर्क भाषा बनाने का मसला टाला जा रहा था तो डा लोहिया ने कहा था ज़िंदा कौमें इंतज़ार नहीं करतीं। गांधी की तरह उनकी बात भी देश ने इस कान से सुनकर उस कान से निकाल दी। ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे। उल्टे नमाज़ की जगह रोज़े गले पड़ गए। राज भाषा बनाकर, जिस हिंदी को आज़ादी के दौरान पूरा देश प्यार करता था उसी हिंदी के लिए दूसरी भाषाओं के दिलों में साज़िशन ज़हर भर दिया गया। अंग्रेज़ी जीत गई या जिता दी गई। काश हिंदीवालों ने सोचा होता कि राजभाषा का यह टुकड़ा गले मे ऐसा फंसेगा न निकालते बनेगा न सटकते। वही स्थिति हिंदी की हुई कि जैसी सत्ता के लालच में बंटवारा मानकर आज देश चारों तरफ़ से घिर गया। भाई भी दुश्मन हो गए। अब भी वक्त है कह सको तो कह दो राजभाषा का पद जिसको देना हो दे दो हमें हमारा मोहब्बत प्यार लौटा दो।
गांधी जी ने हिंद स्वराज के 18वें अध्याय में 100 साल पहले एक महत्त्वपूर्ण वाक्य लिखा था ‘सारे भारत के लिए जो भाषा चाहिए , वह हिंदी ही होगी।‘ इस वाक्य का राजभाषा एक फूहड़ मज़ाक है। आज़ादी के बाद बकौल इतिहासकार रामचंद्र गूहा के इस सबसे समझदार आदमी की बातों को रद्दी की टोकरी में, चाहे ग्रामो उत्थान की बात हो या हिंदी की उनके अनुयाइयों की सरकार ने ही फेंका। इस काम में उस समय के हिंदी के अलंबारदार भी अपनी चुप्पी के साथ शरीक थे। हिंद स्वराज के 20वें अध्याय में उन्होंने अंग्रेज़ों को यह कहकर ललकारा था भारत की भाषा अंग्रेज़ी नहीं है, हिंदी है। वह आपको सीखनी पड़ेगी। और हम तो आपके साथ अपनी भाषा में ही व्यवहार करेंगे। हुआ उलटा, ललकार भारतियों पर ही लागू कर दी गई। भारत को सब भाषाएं भूलकर अंग्रेज़ीमय होना होगा। सरकार अंग्रेज़ी में ही काम करेगी। हुकूमत का उद्देश्य पूरा हुआ। जब पंद्रह पंद्रह साल की अवधि बढ़ाकर हिंदी को ही संपर्क भाषा बनाने का मसला टाला जा रहा था तो डा लोहिया ने कहा था ज़िंदा कौमें इंतज़ार नहीं करतीं। गांधी की तरह उनकी बात भी देश ने इस कान से सुनकर उस कान से निकाल दी। ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे। उल्टे नमाज़ की जगह रोज़े गले पड़ गए। राज भाषा बनाकर, जिस हिंदी को आज़ादी के दौरान पूरा देश प्यार करता था उसी हिंदी के लिए दूसरी भाषाओं के दिलों में साज़िशन ज़हर भर दिया गया। अंग्रेज़ी जीत गई या जिता दी गई। काश हिंदीवालों ने सोचा होता कि राजभाषा का यह टुकड़ा गले मे ऐसा फंसेगा न निकालते बनेगा न सटकते। वही स्थिति हिंदी की हुई कि जैसी सत्ता के लालच में बंटवारा मानकर आज देश चारों तरफ़ से घिर गया। भाई भी दुश्मन हो गए। अब भी वक्त है कह सको तो कह दो राजभाषा का पद जिसको देना हो दे दो हमें हमारा मोहब्बत प्यार लौटा दो।
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