Sunday, 24 May 2009

Lohia aur sahitya

लोहिया और साहित्य

23 मार्च 09 को डा. राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी का आरंभ हुआ। दिल्ली के मावलंकर हॉल में उसकी शूरूआत खांटी लोहियावादी नेता और साथी जनेश्वर मिश्रा ने की। मुझे भी उसमें शिरकत ranकरने के लिए बृजभूषण जी और आनन्द भाई ने बुलाया था। एक गोष्ठी की अध्यक्षता भी कराई। इलाहाबाद प्रवास के दौरान डा लोहिया से संपर्क हो गया था। जब 1962 में आ. चंद्रभानु गुप्ता जी ने चुनाव लड़ने के लिए कहा तो मैंने माफ़ मांग ली थी। जब मुझे अध्यक्षीय भाषण देने के लिए कहा गया तो लेखक होने के नाते मैंने साहित्यिक संस्मरण सुनाने का निश्चय किया। मैं जानता था कि वहां पर उपस्थित लोहियावादी शायद ही इस तरह की बातें सुनने न आए हों। लेकिन चंद घटनाएं सुनाई।
जब लोहिया जी अपने काफ़ले के साथ आते थे तो सबसे पहले उनकी नज़र काफ़ी हाउस का नज़ारा करती थीं। हम नए लेखक बैठे होते थे ज़रूर पूछते कुछ लिखते पढ.ते भी हो या नहीं। देश की उन्नित के साहित्य ज़रूरी है। वही देश की पहचान बनता है।
एक बार स्व विजयदेव नारायण साही ने बताया कि लोहिया जी ने निराला जी से मिलने की इच्छा प्रकट की। साही जी ने कहा कि उनके मूड पर निर्भर करता है वे कैसा व्यवहार करें। उल्टा सीधा कुछ कह दिया तो बर्दाश्त कर सकेंगे।
चलो देखते हैं। उम्र में बड़े ही होंगे। वे दोनों दोपहर बाद पहुंचे निराला जी सोकर उठे थे। उन्होंने जाते ही पूछा कहो साही कैसे आए।
साही जी ने कहा आप से लोहिया जी मिलना चाहते थे। उन्हें आपसे मिलाने लाया हूं। उन्होंने उनकी तरफ़ देखा। जवाहरलाल तो इलाहाबाद के होकर कभी नहीं मिले, आप कैसे आ गए। लगता है वे लोहिया जी को उनके बराबर रखते थे।
आप देश के बड़े कवि हैं आप से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे। निराला जी ने लंबा सा हूं किया जैसे उनकी हां में हां मिला रहे हों। निराला जी ने अपने आप ही बड़बड़ाया जवारलालआते तो उन्हें भी चाय पिलाता। उनके पास लुटिया थी बाल्टी में से पानी भरकर अंगीठी पर रख दिया। और पूछा –तुम भी कविता लिखते हो?
जी नहीं पढ़ता हूं?
क्या पढ़ा?
उन्होंने कहा आपकी राम की शक्तिपूजा। उन्होंने लंबा सा हूं किया। लोहिया जी बोले उसने मुझे प्रेरणा दी है। तब तक चाय बन गई थी।
मैं सोचता हूं कि क्या आज शायद ही ऐसा कोई राजनेता होगा जिसने राम की शक्ति पूजा पढ़ी हो प्रेरणा लेना तो दूर की बात है। चाय पीकर जब लोहिया जी निकले तो निराला जी बुदबुदा रहे थे फिर आना।

कई बातें लोहिया जी के संदर्भ में ध्यान आती हैं मुझे अंग्रज़ी हटाओ आंदोलन में जनेश्वर जी के साथ काम करने का अवसर मिला था। इस कार्यक्रम के अगले दिन मैंने सब हिंदी और अंग्रेज़ी अखबार देखे। इतने बड़े व्यक्ति के जन्म शताब्दी के आरंभ के बारे में अखबारों ने क्या रपट छापी। अंग्रेज़ी का तो उन्होंने विरोध किया था। उन्होंने रपट नहीं छापी तो बात समझ में आती है लेकिन मेरे लिए आश्चर्य की बात थी कि जनसत्ता को छोड़कर किसी भी हिंदी अखबार ने उस कार्यक्रम का नोटिस नहीं लिया था।अगर गांधी और लोहिया न होते तो इन हिंदी अखबारों का पता नहीं क्या स्थिति हुई होती।

Friday, 1 May 2009

Prathmikta se door

शिक्षा जान का जंजाल
आज संसार के सबसे बड़े जनतंत्र का चुनाव हो रहा है। मुद्दे क्या हैं? कुछ नहीं। विदेशों मे जमा धन 100 दिन में ले आऐंगे जनता को क्या मिलेंगा? ऐसा लगता है अडवानी जी प्रधानमंत्री बनते ही आर्डर देंगे और स्वीटज़रलैंड के बैंक दरवाज़े खोल देंगे देश का सारा धन साइफ़न होकर देश में आ जाएगा। क्यों बेवकूफ़ बनाते हैं? आपके ज़माने में ही तो दाउद के चेले का प्रत्यार्पण का किस्सा चालू हुआ था। पुर्तगाल से लाने में कितना पैसा फुंका और कितना वक्त लगा। लिखकर देना पड़ा कुछ भी हो जाए फांसी नहीं देंगे। क़बुल की तरह फिर समर्पण। जो सरकारों को करना चाहिए और कर सकती हैं वह तो करती नहीं आसमान से तारे तोड़कर लाने की बात करती हैं। सबसे पहली प्राथमिकता तो थी बच्चों की शिक्षा की। साठ साल में कितना और क्या हुआ? वही नंगा ढाक। उस पर तीन पात भी नहीं आए। बच्चों की शिक्षा, भाषा और जन सुरक्षा। कभी सोचा कि क्यों नही आए? आपको एक दूसरे पर दोषारोपण से फ़ुर्सत मिले तो कुछ हो। बच्चे आपके मतदाता थोड़े ही हैं जो आप उनके लिए कुछ करेंगे। बड़े लोगों के बच्चों के लिए तो विदेश हैं ही। आप कहेंगे उनके मां बाप तो हैं मतदाता। मां बाप कई तरह के हैं, उनकी आवश्यकताऐं और प्राथमिकताऐं भी उतने ही तरह की हैं जितने तरह के वे स्वयं हैं। उसका फ़ायदा सरकारें उठाती हैं। जैसे जात बिरादरी ने देश को बांटा उसी तरह सरकारें जन को उनकी ज़रूरतों और प्राथिमकताओं के हिसाब से फेंट रही हैं। भाषाओं को बांटा, शिक्षा को बांटा सुरक्षा को बांटा। नेहरू जी ने तो 1945 में ही गांधी के इस प्रस्ताव को धुर से ठुकरा दिया था कि देश का संचालन हिंद स्वराज के हिसाब से हो। तीन बातें तो उनके मन माफ़िक थी ही नहीं बाकी भी नहीं थीं। गांधी ने उसमें साफ़ कहा आपको हमसे बात करनी है तो हिंदी में करनी होगी। नहीं तो जाइए अपने गांव। यह बात को नेहरू कैसे बर्दाशत करते। लेकिन संस्कृति और भाषा की बात करने वाली पार्टियां भी जब सत्ता में आई इन बातों को वे भी भूल गईं। शिक्षा तो किसी के एजेंडे में था ही नहीं। था तो बंदर बांट के साथ। पिछली सरकारों ने शिक्षा को खाने कमाने के लिए प्राइवेट सेक्टर में डाल दिया। खाओ कमाओ और बिगाड़ो। भाषा बिगाड़ो, पाठ्यक्रम बिगाड़ो और उनके ज़रिए सभ्यता संस्कृति बिगाड़ो। जहां तक सुरक्षा का सवाल है, सरकारी सुरक्षा हमारे यानी नेताओं के लिए, प्राइवेट औरों के लिए। सरकारी सुरक्षा के लिए अलग अलग वर्ग हैं। जैसे हत्याएं भी पद के हिसाब से होती हैं। जैसे जैसे भयक्रांत लोग पदासीन होते गए वैसे वैसे सुरक्षा बरीक होती गई। कई बार तो आम आदमी इन लोगों को सुरक्षा में ही मारा जात है। बेइज़्जत तो हो ही जाता है।
ख़ैर, मैं बात कर रहा था शिक्षा की। हम लोगों की शिक्षा बुनियादी शिक्षा में हुई थी। सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते थे। सब काम अपने हाथों से करते थे। एक रूपया फ़ीस जाती थी। देश आज़ाद होने के बाद श्रमदान और हाथ का काम उसका हिस्सा हो गया था। मूज़्फ्फ़रनगर के गांधीनगर की सड़क बनाने में हम बच्चों ने श्रमदान किया था। जब वहां जाता था तो सड़क देखऩे भी जाता था। अगर देश बनाने में भी बाद के लोगों ने श्रमदान किया होता तो शायद देश के प्रति ऐसी ही ललक उनमें भी होती। हैलीकाप्टरों से झांकते हुए ऊपर ऊपर से न उड़ जाते। आज शिक्षा, मेरा मतलब आरंभिक शिक्षा, सबसे अधिक अधिक रट में है। उसके बारे में कोई एक मत नहीं। पब्लिक स्कूल अपना पाठ्यक्रम चलाते हैं। अधिकतर नए स्कूलों के पास खेल के मैदान तक नहीं। किताबें इतनी की बच्चे कुबड़े हो जाएं। अधिक किताबें बच्चों के हित में नहीं रखी जातीं। इसलिए रखी जाती हैं कि मैनेजमेंट स्कूल ड्रेसेज़ और कोर्स की किताबों पर कमीशन लेकर धन कमाता है। फ़ीस इतनी कि मां बाप की कमर टेढ़ी हो जाती है। छठे पे कमीशन के नाम पर दो दो चार चार हज़ार फ़ीस बढ़ाई जा रही है। यह कोई नहीं जानना चाहता कि कितने स्कूलों ने पिछले पे कमीशन्स अपने यहां लागू किए हैं। किए भी हैं या दस्तख़त कराकर आधी पौनी तनख्वाह देकर छुट्टी पा लेते हैं। दरअसल पहले ही इतने आगे से दौड़ना शुरू किया कि अब फ़ीस बढ़ाया जाना मां बाप और बच्चों के जी का जंजाल हो गया। सारे देश में फ़ीस बढ़ाई जा रही है। उत्तर भारत में तो यह महामारी बुरी तरह फैली है। जहां तक मैं जानता हूं ब्रिटिश सरकार के जमाने में कान्वेंटस को छोड़कर लगभग सब स्कूलों में कोर्स समान थे। मेयो वगैरह तो हाई फाई थे ही। लेकिन गवर्मेंट स्कूल और म्यूनिसपेलिटी के स्कूल, मास्टरों के नाम से चलने वाले प्राइवेट स्कूलों में समानता थी। बच्चों को टार्चर किया जाता है इस हद तक कि वे मर जाते हैं।मारा पीटा पहले भी जाता था लेकिन उन्हें जान से मारने के लिए नहीं। कानपुर के जिला अदालत ने गार्जियन्स की फ़ीस बढ़ाने के खिलाफ अपील ख़ारिज कर दी। कहा नहीं जा सकता जज साहब मामले के अंदर कितनी गहराई तक गए। किन बिंदुओं पर जांच की। यह देश भर के बच्चों का मामला है। हाई कोर्ट को फ़ाइल मंगाकर जांच करनी चाहिए।
अगर इसका कोई रास्ता नहीं निकलता यह असमानता बच्चों के स्तर पर बढ़ती जाती है तो निरक्षरता फ़ीस के कारण बढ़ेगी। इस महामारी को रोकने का सत्याग्रह ही एक तरीक है। स्कूलों में नाम लिखा होने के बावजूद बच्चों को न स्कूल भेजें और न फ़ीस जमा करें।
दूसरे मां बाप अपने आराम में से कटौती करके घरों पर बीस बीस पच्चीस पच्चीस बच्चों के स्कूल चलाएं। आपस में विषय बांट कर पढ़ाएं। यह एक बड़ा आंदोलन बन सकता है। यह मानव अधिकार का मामला है। आप मां बाप पर एक सीमा तक दबाव डाल सकते हैं बच्चों के पाठ्क्रम में समान बनाएं। मातृ भाषा को प्रमुखता देना इसलिए भी ज़रूरी है कि गरीब और पिछड़े बच्चों में कुंठाएं न बढ़ें। इस समय देश की तकनीकी शिक्षा चाहे जितनी आगे हो पर आरंभिक शिक्षा बड़े भारी संकट से गुज़र रही है। अगर राष्ट्र स्तर पर इसका समाधान नहीं निकला गया तो भविष्य की पीढ़ी भारतीय कम और तकनीकी ज़्यादा होगी। तकनीक भी विदेशी। हम दूसरे देशों को थैंक्यू थैंक्यू कहते घूमेंगे।

Tuesday, 28 April 2009

चुनाव और जनतंत्र
हर पांच साल मे ﴾यदि मिड टर्म न हो﴿ राजनीतिक पार्टियां अपने गिरहबान में झाकने के बजाय जनता को वोटर का दर्जा देकर उसका जायज़ा लेती हैं कि वह पांच साल में मूर्ख से कितना अक्लमंद हुई। वे चाहती हैं कि वोटर बैल ही बना हमारी गाड़ी खींचता रहे। उसे हर तरह से पटाते हैं कि वे उसके आससमान से तारे तोड़कर लाएंगे। एक पार्टी लगभग छः साल शासन में रही। वह पार्टी धर्म की पाबंद।गंगा गोदावरी और गऊ की गले तक भक्त। दूसरी ऐसी मज़दूरों और किसानों की तानाशाही कायम करने के लिए प्रतिबद्ध, अपने हिव्ज़ सिद्धांतों को बार बार दोहराने वाली, देश में बेरोजगाररों के ग्राफ़ को रटकर वोटर को बिना अपने घर की दुर्दशा बताए रिझाने वाली। तीसरी पार्टी के उस आश्वासान की प्रतीक्षा करते करते लोग थक गए कि वह दिन कब आएगा जब गरीबी हटेगी और अच्छे दिन आएंगे। पर वोटर इन आश्वासनों की धुंध के बीच से यथासामर्थ्य रास्ता बनाने की कोशिश करते हैं। मौक़ा मिलते ही पलट देते हैं। पार्टियें भी कम चालाक नहीं। वे अपना जाति का दाव फेंकती हैं। कुछ उसमें फंसते हैं। कुछ फंसने की कीमत चाहते हैं। वोटर जनतंत्र में भी परतंत्र है। धर्म का जाति का व्यवसाय का अंकुश उस पर रखा रहात है। वह वोट अवनी मर्ज़ी से नहीं दे सकता। चुनाव जनतंत्र में देश के लिए एक संस्कार की तरह होता जा रहा है। इसको प्रदूषित करना या होते देखना अपने में एक अपराध है।
गंगा को पवित्र मानते मानते मानते हमने उसे प्रदूषित कर दिया। आज पुष्पों की जगह उसमें मृत शरीर तैरते रहते हैं। उसी प्रकार चुनाव की इस वैतरणी में जिसे सामान्य मतदाता अपने मौलिक अधिकारों की संरक्षिका मानता है मरी हुई आत्मा वाले बाहूबलि अवरोध बने शिलाखंड बनकर अड़ जाते हैं। सब पार्टियां उनका और एक्टरों का सहारा लेती है। उस वैतरणी को प्रदूषित करते जाते हैं। इनकी संख्या हर बार बढ़ जाती है। प्रदूषण कम होने के बजाए कई गुना बढ जाता है। राजनीतिक पार्टियां इसके लिए ज़िम्म्दार हैं।कुछ कम कुछ ज़्यादा। दरअसल ये पार्टियां उनके माध्यम से मतदाताओं पर आतंक जमाती हैं। ठीक उसी तरह जैसे जल में पड़ा मगरमच्छ जलचरों पर ही नहीं तट पर पानी पीनेवाला राहगीर तक उसके आतंक का शिकार हो जाता है।
मतदता भी इसके लिए उत्तरदायी हैं। जब ये मगरमच्छ उनकी तरफ़ उनके अधिकारों का अधिग्रहण करने के लिए लपकते हैं तो उन्हें पछतावा होता कि हमने तो अपनी सुरक्षा के लिए इन्हें मेड़ समझा था ये तो फ़सल को रौंधने वाले वहशी जानवर हैं। अब क्या होता है जब चिड़ियन चुग गई खेत। खेत चुगवाने वाली वही पार्टियां हैं जो घोसल में भली बनी बैठी रहती हैं मौका मिलते ही उन दरिंदों के साथ हिस्सा बांटने फुर्र से उड़कर आ जाती हैं। मतदाता उन ठगों के बहकावे में आकर सब कुछ लुटा बैठता है। अगर पार्टियां उनकी ठेकेदार हैं तो मतदाता जो चुनाव के समय सबसे बड़ी शक्ति होता हैं अपने अधिकारों की दुर्गति करने के लिए क्यों तत्पर रहता हैं। अगर पार्टियों का दिया ज़हर खाना और दूसरों को खिलाना बंद कर दें तो पार्टियों को नसीहत मिलेगी और वे इस पाप से बचेंगे।
उनमें से कितने किस वर्ग से आते हैं। उनकी तकलीफ़ों और ज़रूरियात से कितना ताल्लुक है। जो पार्टियां जिस आधार को बनाकर चल रही थीं वे उनसे जुड़े मूल्यों तक से बेपरवाह हो जाती हैं। एक पार्टी राम गंगा और गऊ की बात करते करते 6 साल राज कर गई लेकिन सत्ता में रहते तीनों में से कोई भी याद नहीं आया। यहां तक कि उसने गंगा को न राष्ट्र नदी घोषित किया न विदेशों से करोड़ों रुपया लेने के बावजूद प्रदूषण में कोई अंतर किया। पिछली सरकार ने केवल इतना किया कि उसे राष्ट्र नदी घोषित कर दिया। वह भी कानपुर के गृहराज्य मंत्री के प्रयत्न से। चुनाव ऐसी शै है कि जिसने जो किया उसे भी नकार कर जीत का सुख पा लेते हैं। बाद में भले कुछ भी हो। चाहे तीसरी दुनिया के देश हों या पूंजीपति और साम्यवादी सब गरीबी को दूसरे देशों से मदद लेनी की सीढ़ी बनाए रहते हैं । कहीं कम या ज्यादा, कुंडली जमाए बैठी है। गरीबी किसी एक की बपौती नहीं लेकिन बंगाल में तीस साल एक सरकार रही वहां भी टस से मस नहीं हुई। उ प्र में सरकारें रहीं नेता करोड़पति होते गए। जनता का पैर ढका न पेट और न सिर। सवाल यह है कि जनता जागती क्यों नहीं। जनता को अपना दुख नहीं सालता तो न साले। पर दूसरे का काला धन भी नहीं सालता। हमारे नेता नया नया फारमूला ढूंढते रहते हैं किसी तरह सत्ता मिले। बाद की बाद में देखी जाएगी।
काले धन का शगूफ़ा छोड़ा गया है। विदेशों में भारतीयों का धन जमा है उसे ले आया जाय तो गरीबी का काल कट जाएगा। इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। प्रधानमंत्री इऩ वेटिंग का वादा उनकी प्रतीक्षा ख़त्म करा दो तो वे सारा रुपया 100 दिन में छकड़ों में नहीं तो जहाज़ों में भर लाएंगे। वुड बी साहब थोड़ी अवधि तो बढ़ा ही दीजिए। पहले भी एक प्रधानमंत्री ऐसा ही दाव लगा चुके हैं। कुछ तथ्य पर नज़र करने की इजाज़त चाहता हूं। देखिए आपसे ज़्यादा कौन जानता है कि पुर्तगाल से दाउद के चेले को भारत लाने में कितने पापड़ बेलने पड़े थे वहां भी आपकी सरकार को पुर्तगाल की सरकार को आश्वासन देना पड़ था कि उसे सज़ा ए मौत नहीं दी जाएगी। अब वही चुनाव लड़ रहा है। अब आपही बताएं स्वीटज़रलैंड के बैंकों में आपके देश का पैसा नहीं दूसरे देशों के लोग भी हैं वे भी पैसा रखे हैं वे क्या लाने देंगें। माननीय वे आपसे यह पूछेंगे अपने देश में आपने ब्लैक औरे बेनामी धन निकलवा लिया। 22 अप्रेल के हिंदू में दो मार्क्सवादी नेताओं के वक्तव्य छपे हैं कि एन डी ए सरकार के ज़माने में मारीशस रूट से भारत का मारमुलक का धन बाहर जाता था जब संसद में हवाला धन के संदर्भ में सवाल उठाया गया तो तत्कालीन अर्थ मंत्री के पास कोई जवाब नहीं था। वैसे भी उनके इस प्रयास के जवाब में स्वीटज़रलैंड के बैंकों के अध्यक्ष का जवाब छपा था कि 1-हम ईमानदार लोगों का धन रखते हैं। 2-हमारी सरकार का कोई ऐसा आदेश नहीं, हम अपने नियम से काम करेंगे। क्या किसी सरकार का क़ानून बदलवाना इतना आसान है। इस तरह के सवाल उठाना और झूठे आश्वासन दे कर जनता को बहकाना किसी भी पार्टी के लिए जनतंत्र को अपमानित करना है। सरकारें चाहे किसी की भी हों अपने कार्यकाल में जिन कामों को पीछे सरका देती हैं उन्हीं कामों के न करने का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ती हैं।
गांधी जी ने कहा था यह आज़ादी कांग्रेस के लिए नहीं आई देश के लिए है। लेकिन दुर्भाग्य है कि नेता लोग आज़ादी अपने लिए रखना चाहते हैं गुलामी दूसरों को बांट रहे हैं।

Monday, 13 April 2009

भारतीय पत्रकार का जूता और गृहमंत्री की क्षमा
7 अप्रेल 09 को गृहमंत्री पी चिदंबरं की प्रेस कान्फ़्रेंस देख रहा थी, एकाएक एक जूता उछला और उनके दाहिने कान के पास से होता हुआ निकल गया। यह इतना अचानक हुआ कि शायद ही वहां बैठे पत्रकारों को भी समझ में देर लगी होगी। लेकिन चिदंबरंम काफ़ी चौकन्ने थे। वे बचे भी और बेसाख्ता उनके मुहं से निकाला। इन्हें बाहर ले जाइए मैं इऩहें माफ़ करता हूं। आप यानी रानीतिक दल शायद यह सोचें कि चुनाव के चलते उऩ्होंने यह घोषणा की होगी। लेकिन उनकी वह तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। जब ले जाया जारहा था तब उन्होंने दो बार अंग्रेज़ी में कहा आराम से ले जाएं। यानी ज़बरस्ती न करें। यहां एक सवाल तो यह उठता है कि वहां इंटेलिजेंस का पूरा अमला होगा। उनकी नज़र एक आदमी पर रहती है। पत्रकार अगली पंक्ति में बैठा था। जूता खोलने और फेंकने मे 5 नहीं तो 3 या 4मिनट तो लगे होंगे। अगर वे चौकस होते तो जूता फेंकने से पहले ही पकड़ सकते थे कम से कम घेर तो सकते ही थे। जब गृहमंत्री इतने असुरक्षित हैं तो आम आदमी तो किस्मत से ही जी रहा है। पत्रकार बुश पर जूता फेंकने वाले पत्रकार की तरह चर्चित होना चाहता होगा। लेकिन मीडिया के द्वारा इस बात की भर्त्सना करना एक सकारात्मक प्रतिक्रिया है। उनका कहना है ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
बी जे पी के प्रवक्ता का कहना था ठीक तो नहीं हुआ पर 84 के हत्याकांड में टाइटलर को सी बी आइ द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के कारण उसने भावना में ऐसा किया। एक तो यह उस मसले पर मीटींग नहीं थी, न समुदाय विशेष की बैठक थी गृहमंत्री ने कहा था कि सी बी आइ की रपट कोर्ट के विचाराधीन है वह स्वीकार भी हो सकती है अस्वीकृत भी। प्रतीक्षा करना उचित होगा। पत्रकार के पास दो विकल्प थे। प्रोटेस्ट करने के साथ ही वह उठकर जा सकता था। सबसे बड़ी ताकत कलम की थी। जिसके सामने जूते की क्या वक़त। उसने जूते को बड़ा बना दिया। वैसे भी देश इस समय पीड़ित वर्ग के साथ है। पहले भी था। ऐसा करके देश की उस भावना को नकार। उसी वक्त तो तय होने नहीं जा रहा था। एक पत्रकार जो कलम की काम जूते से ले उसे क्या स्वयं पत्रकारिता को अलविदा नहीं कह देना चाहिए। यह तो उसका और मैनेजमेंट का मामला है। साथ ही पत्रकारिता और मीडिया की इतनी मज़बूत साख़ पर प्रश्न चिन्ह लगा है। वह भी पत्रकारिता पर ख़ासतौर से। हिंदी पत्रकारिता संयम की पर्याय रही है। उछृंखलता उसके मिजाज़ में नहीं है। इस मैं दुभाग्य पूर्ण मानता हूं। जहां तक व्यक्तीगत भावुकता का सवाल है उसमें तो कुछ भी संभव है। चिदंबरम की तत्कालिक प्रतिक्रिया को मैं गांधियन सोच मानता हूं। मुझे खुशी है पुलिस ने बिना किसी ज्यादती के पत्रकार महोदय को छोड़ दिया। इसी तरह समाज में संतुलन रह सकता है।

गिरिराज किशोर, 11/210 सूटरगंज कानपुर 28001

Monday, 6 April 2009

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सरकार समाज और देहदान
कानपुर में हरिद्वार से संचालित गायत्री केंद्र, शांति कुंज के एक कर्मठ कार्यकर्ता श्री सेंगर ने देहदान की योजना इस दृष्टि से चलाई की मेडिकल कालिजों के छात्रों को डिसेक्शन के लिए मानव देह नहीं मिलती इसलिए देहदान के लिए लोगों को तैयार किया जाए। आरंभ में कुछ कठिनाई अवश्य हुई लेकिन बाद में लोगों के सहयोग से देहदान के लिए लोग सहमति देने लगे। नगर के कुछ महत्तवपूर्ण लोगों के सामने शपथ पत्र भरवाते थे देहदानियों को सर्टिफ़िकेट वितरित करते थे। शहर के अनेक लोगों ने शपथ ली है अभी यह प्रक्रिया जारी है। अब तक जहां तक मुझे बताया गया गणेश शंकर मेडिकल कालिज, कानपुर को जो यू पी सरकार द्वरा संचालित है, 9 मृतदेह दान में मिल चुकी हैं।
किसी भी धर्म में इस प्रकार देहदान करना वर्जित है। वैसे भी देह के साथ अनेक अंधविश्वास और मोह माया जुड़े होते हैं। मनुष्य अपनी देह को जितना प्यार करता है वह किसी को नहीं करता। वह जिस तरह उसे पालता पोसता है वैसे शायद ही अपने बच्चों को पालता हो। उसके बावजूद जीते जी निस्पृह भाव से देहदान पत्र पर जीते जी हस्ताक्षर कर देना संत मानसिकता का प्रमाण है। एक दो ऐसे मामले भी सामने आए हैं कि मृत्यू के बाद पंडितों या परंपरावादी लोगों ने अपने संबंधियों की देह वापिस मांगी। दरअसल हम सबसे अधिक मृत्यु के अंधकार के पीछ क्या है इससे डरते हैं। सबसे बड़ा सवाल होता है सद्गति होगी नहीं। ख़ैर, यह जानना नहीं चाहते कि मृत्यु क्या है। ओशो जन्म और मृत्यु को उत्सव मानते थे। उनके शव को गा बजाकर समाधि दी गई थी।
कानपुर के डी ए वी कालिज हिंदी विभाग के वरिष्ठ सदस्य और हिंदी के नामी ग्रमी कवि डा. प्रतीक मिश्र का अभी दो सप्ताह पूर्व सहारनपुर एक साहित्यिक कार्यक्रम में जाते हुए शाहजहां पुर में संभवतः हृदय गति रुक जाने से रेल में देहावसान हो गया। उन्होंने अपनी देह पहले ही दान कर दी थी। उसके बारे में अपने परिवार को भी पहले से हिदायत दे दी थी। अतः परिवारों और इष्ट मित्रों नें देह लाकर कानपुर मेडिकल कालिज को दे दी। मैं भी उस समय वहां उपस्थित था। यह दुखद क्षण था। साहित्य जगत के काफ़ी लोग थे। हिंदी के अध्यापक चार छः थे, जबकि नगर में ही कम से कम बीस डिग्री कालिज होंगे।राजनीती के लोग तो ऐसे मामलों अनजान रहते हैं। जहां तक मुझे मालूम है देहदान का आरंभ सबसे पहले आई एन ए में रहीं लेफ्टिनेन्ट श्रीमती मानवती आर्या ने अपने पति की देह मेडिकल कालिज को दे कर की थी। उनके पति कानपुर के सम्मानित पत्रकार थे। वे अपने पति की इच्छा अनुसार अकेले ही उनकी देह एनाटॉनामी विभाग को सुपुर्द कर आई थीं। स्वयं भी जब कभी बाहर जाती हैं तो अपने गले में लिखकर लटका लेती हैं कि यदि उन्हें यात्रा में कुछ हो जाए तो उनकी देह निकटतम मेडिकल कालिज में बच्चों के अध्ययन हेतु देकर अमुक पते पर मेरे बेटों को सूचित कर दिया जाए। महिलाओं के संदर्भ में ऐसा करना और भी कठिन है।
देहदाता का परिवार तो अपना दायित्व बख़ूबी निबाह देता है। सरकार और समाज का भी दायित्व है कि वह उसके लिए अपने कालिजों संस्थाओं को निर्देश दे कि मृत देहों का उचित सम्मान हो। उनको प्राप्त करने का समुचित प्रबंध हो। मेडिकल के छात्र और उनके माता पिता लाखों रुपया शिक्षा पर खर्च करते हैं। मानवदेह के डिसेक्शन से ही पहले साल की शिक्षा आरंभ होती है। देह प्राप्त होना सबसे मुश्किल कार्य है। कीमती से कीमती एपरेटस बाज़ार से खरीदा जा सकता है पर मानवदेह मिलना मुश्किल होता जा रहा है। पहले लावारिस देह मेडिकल कालिजों को दे दी जाती थी। अब बेच लेते हैं जिससे उनके शरीर के हिस्से अधिक पैसे में बिक सकें और अच्छी कमाई हो जाय। सरकार को देहदानियों की देह के सम्मान का पूरा प्रबंध करना चाहिए। उनके कफ़न आदि का, उन्हें लाने ले जाने का। देह दानियों के नाम बाहर बोर्ड पर लिखे जाएं जिससे पता चले कि बच्चों की शिक्षा के लिए अमुक सन् में इन दानियों ने देह दान की। विभागाध्यक्ष या प्रचार्य स्वयं देह प्रप्त करें। जब तक देह का डिसेक्शन न हो देह को शीशे के केज में रखी जाए संबंधी आकर देखना चाहें तो देख सकें। हाल साफ़ सुथरे रखे जाएँ। जिस मेडिकल कालिज में प्रतीक जी की देह दी गई थी वहां चारों तरफ़ गंदगी थी। एक मेज़ पर ले जाकर रख दी गई थी। लोग चारों तरफ़ खड़े होकर कुछ देर तक अपनी श्रद्धांजलि देते रहे थे। अगर परिवार के सदस्यों के सामने उनकी देह को किसी उचित व्यवस्था के साथ संजो दिया जाए तो वे संतुष्टी के साथ विदा हों।
जो लोग अपने संस्कारों के खिलाफ़ जाकर ऐसा करते हैं वे देश सेवक और सेनानी हैं। वे अपने मानसिक बंधनों को तोड़ कर देह देश को अच्छे डाक्टर बनाने के लिए अपनी सबसे प्यारी निधि का जनहित में उत्सर्ग करते हैं। डाक्टरों को भी यह पता हो कि किस व्यक्ति की देह पर चाकू चलाकर उन्होंने मेडिकल के पाठ की पहली शिक्षा ली। जब कभी वे लालच में किसी मरीज़ की उपेक्षा करें तो उन्हें इस बात का स्मरण रहे। हो सकता है मरीज़ भी उसी देहदानी की श्रेणी का हो जिसकी देह के माध्यम से उन्होंने पहला पाठ पढ़ा।

गिरिराज किशोर, 11/210 सूटरगंज कानपुर, 208001
शब्द875

Sunday, 5 April 2009

लोहिया और साहित्य

23 मार्च 09 को डा. राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी का आरंभ हुआ। दिल्ली के मावलंकर हॉल में उसकी शूरूआत खांटी लोहियावादी नेता और साथी जनेश्वर मिश्रा ने की। मुझे भी उसमें शिरकत करने के लिए बृजभूषण जी और आनन्द भाई ने बुलाया था। एक गोष्ठी की अध्यक्षता भी कराई। इलाहाबाद प्रवास के दौरान डा लोहिया से संपर्क हो गया था। जब 1962 में आ. चंद्रभानु गुप्ता जी ने चुनाव लड़ने के लिए कहा तो मैंने माफ़ मांग ली थी। जब मुझे अध्यक्षीय भाषण देने के लिए कहा गया तो लेखक होने के नाते मैंने साहित्यिक संस्मरण सुनाने का निश्चय किया। मैं जानता था कि वहां पर उपस्थित लोहियावादी शायद ही इस तरह की बातें सुनने न आए हों। लेकिन चंद घटनाएं सुनाई।
जब लोहिया जी अपने काफ़ले के साथ आते थे तो सबसे पहले उनकी नज़र काफ़ी हाउस का नज़ारा करती थीं। हम नए लेखक बैठे होते थे ज़रूर पूछते कुछ लिखते पढ.ते भी हो या नहीं। देश की उन्नित के साहित्य ज़रूरी है। वही देश की पहचान बनता है।
एक बार स्व विजयदेव नारायण साही ने बताया कि लोहिया जी ने निराला जी से मिलने की इच्छा प्रकट की। साही जी ने कहा कि उनके मूड पर निर्भर करता है वे कैसा व्यवहार करें। उल्टा सीधा कुछ कह दिया तो बर्दाश्त कर सकेंगे।
चलो देखते हैं। उम्र में बड़े ही होंगे। वे दोनों दोपहर बाद पहुंचे निराला जी सोकर उठे थे। उन्होंने जाते ही पूछा कहो साही कैसे आए।
साही जी ने कहा आप से लोहिया जी मिलना चाहते थे। उन्हें आपसे मिलाने लाया हूं। उन्होंने उनकी तरफ़ देखा। जवाहरलाल तो इलाहाबाद के होकर कभी नहीं मिले, आप कैसे आ गए। लगता है वे लोहिया जी को उनके बराबर रखते थे।
आप देश के बड़े कवि हैं आप से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे। निराला जी ने लंबा सा हूं किया जैसे उनकी हां में हां मिला रहे हों। निराला जी ने अपने आप ही बड़बड़ाया जवारलालआते तो उन्हें भी चाय पिलाता। उनके पास लुटिया थी बाल्टी में से पानी भरकर अंगीठी पर रख दिया। और पूछा –तुम भी कविता लिखते हो?
जी नहीं पढ़ता हूं?
क्या पढ़ा?
उन्होंने कहा आपकी राम की शक्तिपूजा। उन्होंने लंबा सा हूं किया। लोहिया जी बोले उसने मुझे प्रेरणा दी है। तब तक चाय बन गई थी।
मैं सोचता हूं कि क्या आज शायद ही ऐसा कोई राजनेता होगा जिसने राम की शक्ति पूजा पढ़ी हो प्रेरणा लेना तो दूर की बात है। चाय पीकर जब लोहिया जी निकले तो निराला जी बुदबुदा रहे थे फिर आना।

कई बातें लोहिया जी के संदर्भ में ध्यान आती हैं मुझे अंग्रज़ी हटाओ आंदोलन में जनेश्वर जी के साथ काम करने का अवसर मिला था। इस कार्यक्रम के अगले दिन मैंने सब हिंदी और अंग्रेज़ी अखबार देखे। इतने बड़े व्यक्ति के जन्म शताब्दी के आरंभ के बारे में अखबारों ने क्या रपट छापी। अंग्रेज़ी का तो उन्होंने विरोध किया था। उन्होंने रपट नहीं छापी तो बात समझ में आती है लेकिन मेरे लिए आश्चर्य की बात थी कि जनसत्ता को छोड़कर किसी भी हिंदी अखबार ने उस कार्यक्रम का नोटिस नहीं लिया था।अगर गांधी और लोहिया न होते तो इन हिंदी अखबारों का पता नहीं क्या स्थिति हुई होती।

Monday, 9 March 2009

गांधी कितना मंहगा कितना सस्ता

अमेरिका एक मात्र ऐसा बाज़ार है जहां सब कुछ बिकता है। हर चीज़ की बोली लगती है। हीरे जवाहरात से लेकर सोने चांदी की मूर्तियों तक, आधुनिकता से लेकर इतिहास तक, हर वह वस्तु जिसको ईश्वर ने या कलाकार ने कोई शक्ल दी है वह खरीद फ़रोख्त और नीलामी की चीज़ है। मूल्य है तो उसका बाजार भी है। कोई चीज़ सजाने के काम आती है, कोई अजायबघरों में रखी जाती है। कोई पूजने के, कोई नुमायश के यानी जो बिक गया वह सज गया। उस बाज़ार में तानाशाह बिका, देवी देवता बिके, सम्राट और उनकी दसहज़ारी तलवार और ज़िरहबख्तर बिके, फ़कीर की लंगोटी और लकुटिया बिके। उस बाज़ार में हर चीज़ बिकती है और हर चीज़ खरीदी जाती है। फिर भी वह भूखा है। रूखा है। भिखारी है। मंदी का मारा है। जितना सच है उससे ज्यादा झूठ है। जब गांधी जी को गोली लगी थी तब एक शायर ने गाया था। हर चीज़ यहां पर बिकती है, हर चीज़ को बिकते देखा है चांदी के खनकते सिक्कों में...। बाद में पता चला व नज़्म भी चोरी की थी। तब यह किसे पता था गांधी जब यादगार बन जाएंगे तो उनकी भी बोली लगेगी। जिस गांधी ने कहा था कि पहले मैं ईश्वर को सत्य समझता था अब समझ में आया सत्य ही ईश्वर है। सरकार ने इन दोनों बातों को झुठला दिया।
जेम्स ओटिस उनकी उन चप्पलों का जिसके तलवे घिस गए, मैटल के गोल फ्रेम के चश्मे का, थाली और कटोरे का जिसमें अंतिम सपर लिया था, और उस जेबी घड़ी का जिसे वे सूडे में लटकाते थे निलाम पर चढ़ा दिया। क्या वाकई वह निलामी से पैसा कमाना चाहता था? इस सवाल का जवाब ओटिस के पास भले ही हो लेकिन सरकार के पास नहीं है। ओटिस का अगर यह कथन सच है कि वह गांधी की उन स्मृतियों को हिंदुस्तान को वापिस करने को तैयार है बशर्ते वह बीमार और गरीबों की देखभाल का बजट बढ़ाने और अहिंसा को प्रशस्त करने पर राज़ी हो। इतने बड़े देश की सरकार के लिए इतना छोटा सा आश्वासन देने में कौनसी कठिनाई थी। ओटिस इस देश की गरीब जनता और गांधी जी के अहिंसावादी सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए आश्वासन चाहता था। लेकिन हमारे देश की सरकार या कहिए संबंधित मंत्री कहती रहीं कि हम गांधी जी की यादों को निलाम नहीं होने देंगे। अच्छा मज़ाक है। 1995 में मैं पहला गिरमिटिया के सिलसिले में लंदन गया था। तब गांधी जी की चिट्ठयां नीलाम होने वाली थीं। सिंघवी जी तब भारतीय उच्च आयुक्त थे। तब वे रात दिन इसी काम में लगे थे कि गांधी जी के पत्र नीलाम न हों अंत में वे अपने प्रयत्न में सफल भी हो गए थे। लेकिन हमारा अमेरिकन डिप्लोमेटिक विंग अमेरिका में क्या कर रहा था। केवल हमारा सांस्कृतिक मंत्रालय मुखर था। लेकिन आश्चर्य की बात है कि बावजूद कोर्ट की रोक के नीलामी हुई। क्योंकि वहां के एन आर आइज़ के अनेक आवेदन आ चुके थे। लेकिन क्या वे आवेदन कोर्ट आदेश के ऊपर हैं? या भारतीय संविधान या कानून का उनके मन मे कोई सम्मान नहीं?
जब 1995 गांधी जी के पत्रों की नीलामी की बात उठी थी उस समय किसी तरह नाक बची थी। उसके बाद बी जे पी की सरकार भी आई यू पी ए की सरकार भी आई किसी भी सरकार ने प्रभावी कदम नहीं उठाया। कोई पूछने वाला है? 6 मार्च 09 के द हिंदू ने नवजीवन के मैंनेजिंग ट्रस्टी जीतेन्द्र देसाई का वक्तव्य छापा है “It is through Gandhi’s will prepared on Feb. 20, 1940 the Navjivan Trust can stake the claim to the Father of the Nation’s personal belongings. In his will Gandhi said he did not believe he had any property , but” any thing which by social convention or any law is considered mine, anything movable or immovable books, articles etc. I endow to the Navjivan institution whom I hereby declare as my heirs.”
सवाल है गांधी जी की वसियत के बावजूद उनके द्वारा किसी को भेंट की गई कोई भी चीज़ क्या बेची जा सकती है या उसका ट्रस्ट के अलावा कोई और मालिक हो सकता है जब तक गांधी ने स्वयं लिखित रूप में मिलकियत स्थानान्तरित न की हो? जितेन्द्र भाई ने अपने उक्त साक्षात्कार में कहा है गांधी जी ने अपने जीवनकाल में अपनी बहुत सी चीज़ें अपने निकटतम लोगों को उपहार में दी थीं। उन्होंने या तो बेच दिया होगा या दूसरों को उपहार में दे दिया हो। उन्होंने तारों से बने चश्में को तीसरे दशक में जूनागढ़ के नवाब को भेंट करने की बात कही है। गांधी का परिवार कुतियाना से आया था कुतियाना जूनागढ़ में था। स्वाभाविक है कि न तो नवाब ने चश्मा बेचा होगा न किसी को दिया होगा। गांधी ने वह चश्मा स्मृति के तौर पर नवाब को दिया होगा। वह चश्मा किसी और के द्वारा ओटिस के पास पहुंचा होगा। कहने का मतलब है कि गांधी जी की वसियत के अनुसार गांधी जी की वस्तुओं का मालिकाना अधिकार नवजीवन के पास ही है। गांधी हों या या उस स्तर के अन्य देश के निर्माता भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुख्ता इंतज़ाम करना होगा कि भारत की इस प्रकार की संपदा केलिए कुछ नियम बनाए जाएं। भले ही यू एन ओ से सहायता लेनी पड़े। गांधी जी के संदर्भ में इस तरह की समस्या अकसर आती है फिर सरकार उनकी वसियत की रोशनी में उनकी स्मृतियों और दस्तवेज़ों को संरक्षण का प्रबंध क्यों नहीं करती यह जानते हुए कि उनका लिखा एक एक लव्ज़ लाखों डार्ल्स की हैसियत रखता है।
विजया माल्या अगर न होते तो शायद देश की इतनी कीमती निधि पता नहीं किसके व्यक्तिगत संचयन का हिस्सा होती। यह उनका अपना निर्णय था। इस बात में किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए। माल्या कितने भी विवादास्पद व्यक्ति हों पर उनमें देश की निधि के प्रति कितना सम्मान है उनके इस व्यवहार से यह स्पष्ट है। मुझे चित्रलेखा का बीजगुप्त याद आता है जो व्यस्नों को जितना समझता है उतना ही सत्य को भी समझता है। लेकिन हम तो कुमारगिरियों से घिरे हैं जिनके पास सत्य का ढौंग है पर व्यस्नों का सच है।