गांधी कितना मंहगा कितना सस्ता
अमेरिका एक मात्र ऐसा बाज़ार है जहां सब कुछ बिकता है। हर चीज़ की बोली लगती है। हीरे जवाहरात से लेकर सोने चांदी की मूर्तियों तक, आधुनिकता से लेकर इतिहास तक, हर वह वस्तु जिसको ईश्वर ने या कलाकार ने कोई शक्ल दी है वह खरीद फ़रोख्त और नीलामी की चीज़ है। मूल्य है तो उसका बाजार भी है। कोई चीज़ सजाने के काम आती है, कोई अजायबघरों में रखी जाती है। कोई पूजने के, कोई नुमायश के यानी जो बिक गया वह सज गया। उस बाज़ार में तानाशाह बिका, देवी देवता बिके, सम्राट और उनकी दसहज़ारी तलवार और ज़िरहबख्तर बिके, फ़कीर की लंगोटी और लकुटिया बिके। उस बाज़ार में हर चीज़ बिकती है और हर चीज़ खरीदी जाती है। फिर भी वह भूखा है। रूखा है। भिखारी है। मंदी का मारा है। जितना सच है उससे ज्यादा झूठ है। जब गांधी जी को गोली लगी थी तब एक शायर ने गाया था। हर चीज़ यहां पर बिकती है, हर चीज़ को बिकते देखा है चांदी के खनकते सिक्कों में...। बाद में पता चला व नज़्म भी चोरी की थी। तब यह किसे पता था गांधी जब यादगार बन जाएंगे तो उनकी भी बोली लगेगी। जिस गांधी ने कहा था कि पहले मैं ईश्वर को सत्य समझता था अब समझ में आया सत्य ही ईश्वर है। सरकार ने इन दोनों बातों को झुठला दिया।
जेम्स ओटिस उनकी उन चप्पलों का जिसके तलवे घिस गए, मैटल के गोल फ्रेम के चश्मे का, थाली और कटोरे का जिसमें अंतिम सपर लिया था, और उस जेबी घड़ी का जिसे वे सूडे में लटकाते थे निलाम पर चढ़ा दिया। क्या वाकई वह निलामी से पैसा कमाना चाहता था? इस सवाल का जवाब ओटिस के पास भले ही हो लेकिन सरकार के पास नहीं है। ओटिस का अगर यह कथन सच है कि वह गांधी की उन स्मृतियों को हिंदुस्तान को वापिस करने को तैयार है बशर्ते वह बीमार और गरीबों की देखभाल का बजट बढ़ाने और अहिंसा को प्रशस्त करने पर राज़ी हो। इतने बड़े देश की सरकार के लिए इतना छोटा सा आश्वासन देने में कौनसी कठिनाई थी। ओटिस इस देश की गरीब जनता और गांधी जी के अहिंसावादी सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए आश्वासन चाहता था। लेकिन हमारे देश की सरकार या कहिए संबंधित मंत्री कहती रहीं कि हम गांधी जी की यादों को निलाम नहीं होने देंगे। अच्छा मज़ाक है। 1995 में मैं पहला गिरमिटिया के सिलसिले में लंदन गया था। तब गांधी जी की चिट्ठयां नीलाम होने वाली थीं। सिंघवी जी तब भारतीय उच्च आयुक्त थे। तब वे रात दिन इसी काम में लगे थे कि गांधी जी के पत्र नीलाम न हों अंत में वे अपने प्रयत्न में सफल भी हो गए थे। लेकिन हमारा अमेरिकन डिप्लोमेटिक विंग अमेरिका में क्या कर रहा था। केवल हमारा सांस्कृतिक मंत्रालय मुखर था। लेकिन आश्चर्य की बात है कि बावजूद कोर्ट की रोक के नीलामी हुई। क्योंकि वहां के एन आर आइज़ के अनेक आवेदन आ चुके थे। लेकिन क्या वे आवेदन कोर्ट आदेश के ऊपर हैं? या भारतीय संविधान या कानून का उनके मन मे कोई सम्मान नहीं?
जब 1995 गांधी जी के पत्रों की नीलामी की बात उठी थी उस समय किसी तरह नाक बची थी। उसके बाद बी जे पी की सरकार भी आई यू पी ए की सरकार भी आई किसी भी सरकार ने प्रभावी कदम नहीं उठाया। कोई पूछने वाला है? 6 मार्च 09 के द हिंदू ने नवजीवन के मैंनेजिंग ट्रस्टी जीतेन्द्र देसाई का वक्तव्य छापा है “It is through Gandhi’s will prepared on Feb. 20, 1940 the Navjivan Trust can stake the claim to the Father of the Nation’s personal belongings. In his will Gandhi said he did not believe he had any property , but” any thing which by social convention or any law is considered mine, anything movable or immovable books, articles etc. I endow to the Navjivan institution whom I hereby declare as my heirs.”
सवाल है गांधी जी की वसियत के बावजूद उनके द्वारा किसी को भेंट की गई कोई भी चीज़ क्या बेची जा सकती है या उसका ट्रस्ट के अलावा कोई और मालिक हो सकता है जब तक गांधी ने स्वयं लिखित रूप में मिलकियत स्थानान्तरित न की हो? जितेन्द्र भाई ने अपने उक्त साक्षात्कार में कहा है गांधी जी ने अपने जीवनकाल में अपनी बहुत सी चीज़ें अपने निकटतम लोगों को उपहार में दी थीं। उन्होंने या तो बेच दिया होगा या दूसरों को उपहार में दे दिया हो। उन्होंने तारों से बने चश्में को तीसरे दशक में जूनागढ़ के नवाब को भेंट करने की बात कही है। गांधी का परिवार कुतियाना से आया था कुतियाना जूनागढ़ में था। स्वाभाविक है कि न तो नवाब ने चश्मा बेचा होगा न किसी को दिया होगा। गांधी ने वह चश्मा स्मृति के तौर पर नवाब को दिया होगा। वह चश्मा किसी और के द्वारा ओटिस के पास पहुंचा होगा। कहने का मतलब है कि गांधी जी की वसियत के अनुसार गांधी जी की वस्तुओं का मालिकाना अधिकार नवजीवन के पास ही है। गांधी हों या या उस स्तर के अन्य देश के निर्माता भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुख्ता इंतज़ाम करना होगा कि भारत की इस प्रकार की संपदा केलिए कुछ नियम बनाए जाएं। भले ही यू एन ओ से सहायता लेनी पड़े। गांधी जी के संदर्भ में इस तरह की समस्या अकसर आती है फिर सरकार उनकी वसियत की रोशनी में उनकी स्मृतियों और दस्तवेज़ों को संरक्षण का प्रबंध क्यों नहीं करती यह जानते हुए कि उनका लिखा एक एक लव्ज़ लाखों डार्ल्स की हैसियत रखता है।
विजया माल्या अगर न होते तो शायद देश की इतनी कीमती निधि पता नहीं किसके व्यक्तिगत संचयन का हिस्सा होती। यह उनका अपना निर्णय था। इस बात में किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए। माल्या कितने भी विवादास्पद व्यक्ति हों पर उनमें देश की निधि के प्रति कितना सम्मान है उनके इस व्यवहार से यह स्पष्ट है। मुझे चित्रलेखा का बीजगुप्त याद आता है जो व्यस्नों को जितना समझता है उतना ही सत्य को भी समझता है। लेकिन हम तो कुमारगिरियों से घिरे हैं जिनके पास सत्य का ढौंग है पर व्यस्नों का सच है।
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Monday, 9 March 2009
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