Showing posts with label patr. Show all posts
Showing posts with label patr. Show all posts

Sunday, 12 September 2010

13 सितंबर 10

प्रिय अखिलेश जी,
आशा है मेरे इस चौथे पत्र लिखने को अन्यथा न लेंगे। मुझे प्रियंवद और सुधा अरोड़ा ने बताया है कि ज्ञानपीठके निदेशक का उन दोनों के पास पत्र पहुंचा है कि वे ज्ञानपीठ उनकी पुस्तकें भेजने के लिए तैयार है।. इस पत्र ने मेरे सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं-
1. क्या पत्र उन सब लोगों को गया है जिन्होंने किताबें वापिस मांगी थी। जिन्होंने सबसे पहले पत्र लिखा , जैसे मैंने, उनको कोई सूचना नहीं।
2. शायद अमर उजाला में छपा था कि निदेशक/संपादक प्रकरण पर इस माह के अंत में निर्णय लिया जाएगा। प्रियंवद और शायद अन्य लेख -कों के पत्र में यह शर्त थी की वर्तमान पदासीन अधिकारी के रहने पर पुस्तकें वापिस नहीं ली जाएंगी।
3. यदि अभी यह तय होना शेष है तो क्या विचाराधीन अधिकारी द्वारा ऐसा पत्र लेखकों को लिखना न्याय संगत है? या किसी नीति के तहत लिखा गया है। कुछ को लिखना कुछको न लिखना शंका की स्थिति पैदा करती है।
4. यह निर्णय न्यासी मंडल का है या स्वयं निदेशक का अपना?
5. ये सवाल स्थिति को प्रश्नाकुल बनाती है।
श्री अखिलेश जैन, प्रबंध न्यासी,ज्ञानपीठ नई दिल्ली।

आपका

गिरिराज किशोर