हिंदुस्तान दैनिक 30 मई 10 में एन सी शाह के शोध के माध्यम से छपे एक समाचार ने मेरा बचपन मुझे याद दिला दिया। सुल्ताना डाकू पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी आख्यान के नायक की तरह था। स्कूलों में नाटक खेले जाते थे, नौटंकियां और सांग होते थे। वह डाकू कम नायक ज़्यादा था। वह वेष बदलने में माहिर था। अकसर अग्रेज़ अफसरों को मूर्ख बनाकर निकल जाता था। कभी कलक्टर बन जाता था कभी कमिश्नर और कभी एस पी। उसके बारे में अनेक ऐसी किंवदन्तियां प्रचलित थीं कि अमीरों को लूटता था और गरीबों का साथी था। कई बार वह वेष बदलकर ऐसे बेसहारा परिवारों की मदद के लिए पहुंच जाता था जहां बेटी की बारात आने वाली होती थी और घर में भुनी भांग नहीं होती थी। पीछे पुलिस होती थी। वह साधु या साहुकार के वेश में आता जो धन देना होता देकर निकल जाता। पीछे से पुलिस आती देखती जहां कुछ देर पहले पैसा न हाने के कारण मुर्दनी छाई थी वहां शादी की तैयारियां चालू है। तहकीकात करने पर पता चलता कि एक सेठ या महात्मा आया धन देकर चला गया। वे मार पीट करते पर इससे ज़्यादा न वे बता पाते और न वे जान पाते। पुलिस वाले भी समझ जाते कि सुल्ताना फिर हाथ से निकल गया। कई बार तो वह आला अफसरों से बैठकर बात कर जाता, नाई बनकर उनकी हजामत तक बना जाता। उसके जाने के बाद जान पाते कि वह सुल्ताना से बात हो रही थी। वह चाहता तो उन्हें आराम से हलाक कर सकता था। वे रोमांचित हो उठते थे और सीने पर क्रास बनाने लगते थे। ईशू ने बचा लिया।
सुल्ताना कभी धोखे से वार नहीं करता था। अफसरों को मूर्ख बनाने में उसे मज़ा आता था। आम जनता की हमदर्दी के कारण उसे पकड़ना अंग्रेज़ों के लिए टेढी खीर था। अगर कभी हाथ भी आ जाता था तो चकमा देकर निकल जाता था। एक किंवदंति थी कि वह किसी बच्चे को गोद नहीं लेता अपने बच्चे को भी नहीं। बताते हैं उसे शाप था कि जिस दिन बच्चे को गोद में उठाएगा वही उसका अंतिम दिन होगा। पूरा किस्सा तो श्री शाह के शोध में होगा। लेकिन कहते हैं कि स्थिति ऐसी उत्पन्न हुई या की गई कि उसने बच्चा गोद में उठा लिया। उसी दिन वह पकड़ लिया गया। उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई। कहा जाता है कि फांसी से पहले उसकी मां मिलने आई तो उसने मिलने से यह कहकर मना कर दिया कि आज यह दिन तेरे कारण देखने को मिला। इससे यही पता चलता है कि उसे वास्तव में डाकू बनने का कितना पछतावा था।
मेरा बचपन आल्हउदल और शाहआलम के आख्यानों की तरह सुल्ताना डाकू के किस्से सुनते बीता। लेकिन डा शाह के शोध के इस हिस्से ने मुझे रोमांचित कर दिया। यह तो सुना था कि फांसी से पहले किसी अंग्रेज़ अफसर ने आश्वासन दिया था कि वह बाद में उसके परिवार की देख भाल करेगा। यह एक बड़ा रहस्योदघाटन है कि जिस पुलिस अफसर फ्रेड्रिक यंग ने उसे फांसी दिलवाई वही उसकी पत्नी और बेटे को अपने साथ लंदन ले गया, उनकी परवरिश की और बेटे को पढ़ा लिखाकर आई सी एस बनाया। डा शाह का शोध हालांकि मैंने नही पढ़ा लेकिन दो परस्पर विरोधी और एक तरह से जानी दुश्मनों की संवेदना भरी कथा है। मि. यंग का सुल्ताना के आख्यानों में प्रमुख भूमिका थी। सुल्ताना यंग को तरह तरह के रूप रखकर बहुत छकाता था। शायद हिंदुस्तानी अधिकारी ऐसे डाकू को कानूनी ज़द में लाकर फांसी दिलाने के बजाए एनकाउंटर करके बार बार होने वाली अपनी बेइज्ज़ती का बदला लेता। उसके परिवार के साथ यह सलूक तो अकल्पनीय है।
मैंने अपने छात्र जीवन में सुल्ताना डाकू नाटक में यंग की भूमिका की थी। यंग का एक संवाद मुझे स्मरण है। सुल्ताना जब नाई बनकर यंग की हजामत बनाते हुए कुछ सुचनाएं इकट्ठी करके निकल जाता है तो यंग को पता चलता है। पहले सिपाहियों को दौड़ाता है फिर स्वगत कहता है सुल्ताना काश पुलिस में होता। इससे लगता है यंग उसकी क्षमता को समझता था। शाह ने लिखा है कि दोनों मज़बूत इरादे और चरित्र के इंसान थे। शाह का शोध यंग के द्वारा अंग्रेज़ हुकूमत को रोज़ाना भेजी जाने वाली रिपोर्टों पर आधारित है। मुझे खुशी है कि मैंने नाटक में एक ऐसे अधिकारी की भूमिका की जिसने इंसानियत की ऐसी मिसाल कायम की जिसका सानी मिलना लगभग असंभव है। डाकू माने जाने वाले जिस इंसान को फांसी दिलाई उसी के बेटे को अंग्रेज़ होते हुए भी ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च प्रशासकीय पद के लायक बनाया।
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Thursday, 3 June 2010
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