Saturday, 27 June 2009

मुख्यमंत्री जी बधाई, घनश्याम मारा गया

घनश्याम केवट डाकू था, अच्छा हुआ मारा गया। जिस तरह वह मारा गया उससे तो लगता है कि वह किसी को भी मार सकता था। कितना बहादुर है आपकी पुलिस उस अकेले पर 51 घंटों के बाद 500 जवान भारी पड़े। ऐसे में उसे क्या हक़ था जीने का। अगर वह जीता रहता तो वह उत्तर प्रदेश की दो लाख जवानों की सबसे बड़ी वाहिनी की बेइज़्ज़ती का कारण बनता। आपकी भी। मै तो सवेरे से मना रहा था कि चाहे जो हो आपके डी जी पी साहब का बड़बोलेपन पर आंच न आए। आप भी उस आंच की झांव से न बचतीं। 51 घंटे आपके शेर उससे जूझते रहे। वह बेशर्म नंग अकेला उनके कपड़े उतारने पर लगा रहा। ऐसा लगता था कि वह अपनी रिश्तेदारी में छकड़ों में गोलबारूद भर कर लाया था। इसिलए डी जी पी साहब कह रहे थे कि हमारे पास गोली बारूद की कमी नहीं है और न मैन पावर की। पावर में तो डी जी पी साहब, वही 21 पड़ रहा था। उस अकेले की पावर और आप सबकी पावर। बुरा मत मानिए ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही होता है। यह बहादुरी नहीं बेशर्मी है। 500 जवान गोलियां दाग रहे हैं आपको यही पता नहीं कि वह कहां बैठा है। बीच वीच में ऐसे चुप हो जाता था जैसे टैं बोल गया। जब मरने की तसदीक करने आई जी, डी आई जी या अन्य कोई आगे बढ़ा पता नहीं कहां से जी उठा और टिका दी गोली। यह तो तमीज़ से गिरी हुई बात हुई ना। एक आई जी ज़ख्मी, एक डी आई जी मरते मरते बचे। चार जवान तो मारे ही गए। आपके ए डी जी भी गोली खाते खाते बचे। वे तो चढ़ ही गए थे खपरैल पर, वह तो किस्मत ने बचा लिया। उस के खरोच भी नहीं आई।
पूर्व डी जी पी प्रकाश सिंह कह रहे थे मुठभेड़ तो पांच पांच दिन तक चल सकती है। आश्चर्य तो इस बात का है वह अकेला आदमी और दूसरी तरफ़ आदमी दर आदमी। एक से एक ज़हीन और प्रशिक्षित अफ़सर, वह अकेला। यह कहना कि पुलिस के पास मौरटर वगैरह आधुनिक हथियार नहीं थे कोई मायने नहीं रखता एक आदमी एक हथियार के सामने इतने हथियार नाकाफ़ी कैसे हो सकते हैं। मुख्यमंत्री जी, उसने दस हज़ार गोली या एक लाख गोलियां चलाई होंगी आपके पांच सौ अफ़सरों और जवानों ने लाखों लाख गोलियां झोंक दी होंगी, मानो किसी राजे महाराजा के यहां हर्ष फ़ायरिंग हो रहा हो। न हमारे पास मुख़बिर की सूचना और न हमारी सी आई डी किसी काम की। बिना टारगेट के फ़ायरिंग का मतलब अलल टप्प निशाना लगाना। आपकी सेना की तीन सर्किल्स में तैनाती थी। सब व्यर्थ जबकि वह बिना सोए खाए लगातार मोर्चा ले रहा था। आपकी फोर्स खाना भी खा रही थी, सिलसिलेवार आराम भी फरमा रही थी। जब घनश्याम भागा बकौल अखबारों के पी ए सी के कुछ लोग लेटे बैठे थे कुछ खाने में मुबतिला थे। 51 घंटे लगातार डटे रहने के बाद उसे वही मौक़ा मिला उसने भरपूर फ़ायदा उठाया। साहरा के फ़ोटोग्रफरों ने देख लिया लेकिन हमारे जवानों और अफसरों की आंख नहीं देख पाई। यह कैसी विडंबना है। दो किलो मीटर तक उस हालत में भी दौड़ता चला गया। आख़री सांस तक उसने लोहा लिया। वैसे तो लोहे से ही लोहा लिया जाता है। अगर नाले में न छुपता तो शायद ए डी जी ब्रजलाल जी अपनी पीठ थपथपाने के मौक़े से महरूम रह जाते।
मैं कई बार सोचता हूं कि कि चीन के साथ हुई लड़ाई में जनरल कौल चीन के आक्रमण की बात सुनकर सोते सोते अपने उन्हीं कपड़ों में भाग खड़े हुए थे जो पहने थे। सेना क्या करती, जनरल ही नहीं तो हुक्म कौन दे। कहते हैं बहादुरशाह को जब अंग्रज़ो ने गिरफ़तार किया तो उन्हें आधा घंटा मिला जिसमें चाहते तो भाग सकते थे। जब उनसे पूछा गया कि आपको आधा घंटा मिला था आप भाग सकते थे। उन्होंने कहा वहां जूते पहनाने वाला कोई नहीं था। हो सकता है यह बनाया हुआ चुटकुला हो। लेकिन परंपरा की बात है। यह डाकू तो पुलिस को 51 घंटे हलकान करने के बाद देश के सुरक्षा के ठेकेदारों की आंखों के सामने खुले किवाड़ों भागा था। जिस तरह व कूदकर भाग रहा था कोई भी दक्ष शूटर उसे मार सकता था। ताज्जुब है कि इतनी बड़ी फ़ोर्स में से किसी की नज़र भी उस पर नहीं पड़ी और पड़ी तो निशाना चूक गया। बल्कि भागने की ख़बर सुनते ही रिलेक्स पी ए सी के जवानों ने पहले पोजीशन ली फिर बंदूकें दीवार से टिका कर रख दी। कहीं यह तो नहीं सोचा भाग गया, जान बची सो लाखों पाए।
मुझे एक सवाल बराबर परेशान कर रहा है यह ठीक है कि वह दुर्दांत डाकू था उसे मार कर पुलिस ने ठीक किया। लेकिन क्या वह कायर था? यह सवाल क्या आप अपने आप से पूछेंगी? सारा गांव ख़ाली करा लिया गया था। उसकी मदद के लिए वहां कोई नहीं थे सिवाय उसकी अपनी गन के। गोली बारूद भी असीमित नहीं था। वह पुलिस वालों की तरह ज़रेबख्तर भी नहीं पहने था। गोलियों को अपव्यय करने की स्थिति में तो क़तई नहीं था। वह पुलिस के 500 जवानों से तरकीब और किफ़ायत से लड़ा। लेकिन उसने यह पता नहीं चलने दिया कि वह अकेला है और और एक गन और सीमित कारतूस के साथ इतनी बड़ी संख्या में आई गारद से लड़ रहा है। उसने अपनी रणनीति सोच समझ कर बनाई। हर एक गोली का उसके हिसाब से सदुपयोग हो। वह उनके दबाव में न आए उल्टे उन्हें अपने दबाव में ले ले। एक आदमी के लिए इतने बड़े अमले को दबाव में लेना असंभव काम था। 51 घंटे तक उसकी रणनीति पूरी तरह कारगर रही। मुझे नहीं लगता कि इन बड़े बड़े प्रशिक्षित अफ़सरों की कोई रणनीति थी। वे तो यह सोचकर फ़ायरिंग कर कर रहे थे किसी न किसी गोली पर तो उसका नाम लिखा होगा। 51 घंटे जो गालियां दागीं उनमें से किसी पर उसका नाम नहीं मिला। बल्कि उनके चार जवानों का नाम उसकी गोलियों पर जा खुदा। 11 घायल हुए। एक साहब कह रहे थे गोली चलाता था और छुप जाता था। जब कोई यह समझकर बढ़ता था वह मारा गया वह तपाक से गोली टिका देता था। मेरे सामने एक दूसरा सवाल है क्या ऐसे हिम्मती और रणनीतिकार को मारना ठीक हुआ या पकड़ना ठीक होता? इस सवाल का जवाब पुलिस वालों के पास एक ही था मार गिराना। जब वह भाग निकला तो ए डी जी से लेकर सिपही तक सबके हाथ पांव फूल गए। क्योंकि उनका उद्देश्य तो एनकाउंटर था। वह इस बात को समझ रहा था। हो सकता था वह समर्पण कर देता। लेकिन वह जान की लड़ाई लड़ रहा था। हो सकता है उसने ज़िंदगी में एक आध लोगों को बख्श भी दिया हो पर पुलिस किसी को नहीं बख्शती। जब तक उसका हित न हो। दूसरा पक्ष भी था एक नज़र उसके बेमिसाल साहस के बारे में सोचना। रणनीति प्रवरता पर ध्यान देना। उसके डकैत होने से ऊपर उठकर उसके हिम्मती होने और रणनीतिकार होने का देश और समाज के हित में लाभ उठाने की संभावना के बारे में सोचना। वहां केवल सिपाही नहीं ए डी जी रैंक के अफ़सर उस आपरेशन का सचालन कर रहे थे। वे उच्च अधिकारियों यहां तक मुखुयमंत्री तक को समझा सकते थे कि वे उससे यह कहने क अनुमति दें कि वे उससे बात करना चाहते हैं मारना नहीं चाहते। बेगुनाह से बेगुनाह आदमी पुलिस की छवि में यही देखता है कि वे आए हैं तो कुछ न कुछ करने आए हैं। अगर पुलिस दूसरे पैराए पर भी सोचना शुरू कर दे। हो सकता है मुनाहगार भी उनकी कही बात पर सोचने लगें। सिपाही दरोगा की बात पर विश्वास करे न करे लेकिन वरिष्ठतम अधिकारी और मंत्री तक विश्वसनीय नहीं रह गए। जयप्रकाश नारायण की बात पर वे लोग विश्वास कर सकते है जिनके पास न क्षमा करने का अधिकार था, न दंड देना का। जिनके पास ये सब अधिकार हैं उनकी बात तो विश्वनीय होनी चाहिए। लेकिन नहीं है। अधिकार का सकारात्मक उपयोग न हमने सीखा और न सिखाया गया। घनश्याम एक भटका हुआ बहादुर था जिसने प्रतिशोध और सताने के जवाब में मौत देना सीखा थे। अगर उसे गिरफ़्तार करके सुधारने का प्रयत्न किया जाता तो उसकी क्षमताओं का सदुपयोग क्या संभव नहीं था? वी शांता राम की दो आंखें बारह हाथ फिल्म देखकर संपूर्णानन्द जी ने सुधार गृह नाम से खुली जेलें बनाई थीं। गुरमा मिर्ज़ापुर की जेल देखने का मौक़ा मिला है। वहां कैदी खुले रहते थे। उन्हें काम करना, उनकी ग़लतियों को सुधारना, नमाज़, कीर्तन आदि सिखाया जाता था। लेकिन अब राजनीति से किसी को फुर्सत नहीं। गांधी जी को नाटक करने वाला कहकर अपनी भड़ास निकालने वाले इन सब बातों के बारे में शायद जानते भी न हों कि कै़दियों के संदर्भ में इतना महत्त्वपूर्ण प्रयोग गांधी जी का अनुसरण करके हो चुका है। दरअसल डाकुओं को मारना या बिना सुनवाई के गरीब और बेसहारा अंडरट्रायल्स का जेलों में जीवन काट देना जनतंत्र के लिए लज्जाजनक है। गांधी में बुराई खोजकर और अपनी ख़ूबियों का ढिंढोरा पीटकर आप कहीं नहीं पहुंच सकते। यह मनोविज्ञानिक वास्तविकता है कि जब आप अपनी तारीफ़ करते हैं लोगों की नज़र तत्काल आपकी कमज़रियों पर जाता है। ख़ैर, जब समाज और सरकार के स्तर पर जरायमपेशा लोगों के पुनर्वास की योजना नहीं बनायी जाएगी और उसके पीछे ईमानदारी होगी तब तक पुलिस और तथाकथित दबंग उनकी हत्याओं को ही सबसे आसान तरीक़ा मानकर हत्यओं में संलग्न रहेंगे। अगर कापुरूषों की सेना में ऐसे हिम्मती लोगों का मन परिवर्तन करके, भर्ती किया जा सकेगा तो उनके टेलेंट का सही इस्तेमाल हो सकेगा। वैसे भी एक आदमी पर भले ही वह डकैत हो 500 शस्त्र लोगों द्वारा आक्रमण मानवाअधिकार का सवाल उठाता है। इन सवालों पर हुकूमत के नज़रिए से न ोचकर अब मानवीय दृष्टिकोण से सोचना शुरू करना ज़ररी है।

Monday, 22 June 2009

कहां आ रहे हैं हिंदी-चानी

जून 09 के सभी समाचर पत्रों में एक ख़बर छपी है ‘सावधान, आ रहे हैं हिंदी-चीनी’। हिंदी चीनी जब साथ छपा देखता हूं तो मैं चौंक जाता हूं । चाऊ एन लाइ और नेहरू ने हिंदी चीनी भाई भाई का नारा लगाया था उसका नतीजा जो हुआ उसने सबसे पहले नेहरू की ही बलि ली। ईश्वर के लिए दोनों को साथ साथ न रखो। कुछ पता नहीं कब क्या हो जाए। अभी तक तो यही देखने में आया कि चीनी हिंदी न साथ रहे, न आए, न गए। भारत एक दिशा चलता है चीन दूसरी दिशा। चीन और चीन के गुर्गे भारत पर मौक़ा मिलते ही झपटते हैं और हर काम के लिए उसे दोषी करार दे देते हैं। यह तो हिंदुस्तान की सहनशीलता है कि हर हाल ख़ुशी हर हाल अमीरी है बाबा, जब आशिक मस्त फ़कीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा। जब पोरस हारा तो उसने न अपना आपा खोया और न दूसरों को खोने दिया। लेकिन यह समाचार बिल्कुल भिन्न था। दरअसल अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा साहब ने अपने देश के लोगों को आगाह करने के लिए विंस्कानसन में हुई एक बैठक में यह कहा थी। अपने देश के बच्चों की शिक्षा को लेकर वे चिंतित हैं। उनका मानना है कि हिंदी चीनी अधिक मेहनती और मेधावी हैं। अमेरिका के बच्चे फिसड्डी होते जा रहे हैं। इस तरह की चिंता व्यक्त करने वाले वे पहले राष्ट्रपति हैं। उनकी यह चेतावनी कि अब कमर कसकर सावधान होने की ज़रूरत है क्योंकि हिंदी और चीनी अमेरिका आ रहे हैं। अमेरिकन बच्चों को डराने के लिए कि हव्वा आ रहा है। यह ओबामा के मन का डर है। मेरे विचार से ओबामा ने शपथ लेने के दो तीन महीने में अपने देश की शिक्षा का जायज़ा ले लिया और अपने देश को आगाह कर दिया कि देश की शिक्षा पद्धति में सुधार लाने की ज़रूरत है। इस तरह की चिंता हमारे देश के किसी नेता ने कभी व्यक्त नहीं की। जिस देश में शिक्षा शिक्षाविदों की जगह दोयम दर्जे के नौकरशाह चलाएं वहां कौन कह सकता है कि नेता शिक्षा के प्रति चिंतित हैं। हमारे नेता गाहे बगाहे ज़िक्र कर दिया करते हैं। अमेरिका आज भी सबसे शक्तिशाली और अमीर देश है। उसके बावजूद ओबामा चिंतित है कि अमेरिका 100 वर्ष तक समृद्धिशाली और शक्तिशाली देश रहा अगर छात्र वीडियो गेम और टी वी में समय बिताएंगे तो हिंदी चीनी आ धमकेंगे। हिंदी चीनी बच्चे वीडियो गेम्स कम खेलते हैं और टी वी भी कम देखते हैं वे मेधावी और परिश्रमी भी हैं। अमेरिका पी एच डी़ ग्रेजुएट्स, इंजिनियर्स, वैज्ञानिक सबसे अधिक पैदा करता था अब उसमें गिरावट आई है। जब शिक्षा की बात आती है तो वह दूसरे देशों से ऊपर नहीं है। दुनिया के देश प्रतिस्पर्धाधर्मी होते जा रहे हैं हमें भी अपनी गति बढ़ानी होगी। संदेश के साथ साथ यह चुनौती भी है।
हिंदुस्तान में चीन और अमेरिका से अधिक विश्विद्यालय हैं। इसके बावजूद बेरोज़गारी का प्रतिशत भारत में इन दोनों से अधिक है। नए विश्विवद्यालय और आई आई टी खुल गए हैं या खुलने की प्रक्रिया में हैं। प्राइवेट मेडिकल कालिज, बिज़नेस मैनेजमेंट संस्थान भी खुल रहे हैं। लेकिन बहुत कम ऐसे संस्थान हैं जिनका उद्देश्य शिक्षा हो। अधिकतर प्राइवेट संस्थाएं उन्हें आमदनी का ज़रिया बनाए हुए हैं। 14 जून के अखबारों में निकला था कि कानपुर विश्विद्यालय के स्वपोषित बी एड कालिजों ने एक अरब सत्तर लाख रुपया निर्धारित फ़ीस के अलावा इकट्ठा किया। यह कैसी विडंबना है। स्वपोषित इंजिनियरिंग बिजनेस-मैनेजमेंट कालिज तो लाखों में केपिटेशन फीस वसूल करते हैं। अभी उत्तर प्रदेश में 18 हज़ार सिपाहियों की भरती हुई थी। सरकार बदलते ही उन नियुक्तियों को निरस्त कर दिया गया। लोग एक से तीन लाख रुपया देकर भर्ती हुए थे। उसके लिए लोगों ने घर ज़मीन ज़ेवर बेचकर रिश्वत देने के लिए धन जमा किया था। ज्वायन कराने के बाद नई सरकार ने उनको बर्खास्त कर दिया। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्टे के आदेश ने उन्हें बहाल कर दिया। इस बीच 100 से अधिक लोगो ने इस सदमे के कारण आत्महत्याऐं कर लीं कि सब कुछ बिक गया अब गुज़ारा कैसे होगा। सरकारों में लगता है मनुष्य नहीं रहते केवल कुर्सियां होती हैं। कुर्सियों में संवेदना नहीं होती। सवाल है कि ओबामा साहब को ऐसा लगना कि हिंदी या चीनी आ रहे हैं अपने देश में बढ़ती बेरोज़गारी की दृष्टि से भले ही ठीक है पर भारत के नज़रिए से चिंताजनक है। वे लोग जो यहां से वहां जा रहे हैं उनको संस्थाएं उनकी ज़रूरत के हिसाब से तैयार करती हैं। इस देश की ज़रूरत के हिसाब से उन्हें न तैयार किया जाता है और न वे उन्हें जानते समझते हैं। जिन प्रोबलम्स से वे जूझते हैं अधिकतर बाहरी देशों की होती हैं जो प्रोजेक्ट के रूप में वहां से आती हैं। इसलिए वे खपते भी वहीं हैं। वे मारे जाएं या पीटे जाएं रहंगे वहीं। इसका कारण मां बाप भी हैं वे होश संभालते नहीं उन्हें ठूस ठूस कर यह समझाना शुरू कर दिया जाता है कि उन्हें मैनेमेंट या इंजिनियरिंग या दूसरे विषय जिनकी वहां मांग है पढ़कर अमेरिका या जर्मनी आदि देशों में जाना है। इसलिए नहीं कि इससे देश का गौरव बढ़ेगा बल्कि इसलिए कि डालर मिलेंगे। उसके लिए बच्चों को बचपन से तैयार किया जाता है। मातृभाषा से विमुख करके पब्लिक स्कूलों में पढ़ाना, उनकी साहित्य संस्कृति और संवेदना की रीढ़ तोड़ना सबसे पहला काम होता है। मैकोले का यही गुरूमंत्र था। मां बाप यह तक जानने की कोशिश नहीं करते कि उनके बच्चे स्कूलों में क्या सीख रहे हैं। वे केवल टेस्ट कापियों में दिए गए नंबर देखकर उनकी गिटपिट सुनकर आश्वस्त हो जाते हैं कि बच्चा उनकी मनचाही दिशा में जा रहा है। उन्हें तब पता चलता है जब बच्चों का मानवीय संवेदना कोश ख़ाली हो चुका होता है। जब वे उनके सुख दुख पैसे से तोलने लगते हैं। दरअसल, ओबामा साहब हम टैक्नीकलाजी में प्रशिक्षित गुलाम बेचते हैं। उन पर कोई प्रतिबंध नहीं कि वे कितनी अवधि के बाद अपने वतन लौट आएंगे। लौटेंगे भी या नहीं। या तभी लौटेंगे जब निकाले जाएंगे। वे ग्रीन कार्ड ले लें या नागरिकता ले लें मुझे नहीं मालूम कि उनके पितृ देश से पूछा भी जाता है या नहीं। न इस तरह के अनुबंध का कोई प्रावधान ही है कि अगर उनके यहां कोई हादसा हो जाए तो उसका कोई मुआवज़ा मूल देश या घरवालों को देंगे। देंगे तो किस हिसाब से। आस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ जो नृशंस व्यवहार हो रहा है, मां बाप की बुढ़ापे की लकड़ी तोड़ी जा रही है उसकी चिंता न वहां की सरकार को है और न हमारी सरकार को। हुज़ूर, आपके महान देश में भारतीय छात्रों की कैंपसों में हत्याएं हुई हैं। किसने क्या किया। ओबामा साहब इससे सस्ता सौदा और क्या होगा? दरअसल अंतर्राष्ट्रीय कानून या परंपराएं योरोपिय और पश्चिमी देशों की जरूरतों के नज़रिए से बनाए गए हैं। अब जब मंदी के फेर में विकसित दुनिया पड़ी तो आपको इसका गणित समझ में आया कि अगर हमारे देश का युवा वर्ग चीनी और हिंदी जैसा मेधावी और मेहनती होता तो इतना धन बाहर न जाता। आप तो बेहतर समझते हैं गरीब का बच्चा चाहे देश हो विदेश, आसायश में वक्त बरबाद नहीं करता अपनी हालत सुधारने के लिए पहले हाथ पैर मारता है। आपने तो स्वयं सहा है। अमीर और साधन संपन्न मग़रूर भी हो जाता है और अपने शौकों की परवरिश बच्चे की तरह करता है। हमारे देश के अधिकतर मेधावी बच्चे उसी गरीब वर्ग के होते हैं। लेकिन उनको संवेदनाहीन बना के दूसरे देशों में भेजा जाता है। इसे आप संवेदना का वन्ध्याकरण भी कह सकते हैं। जिससे वे आपके लिए समस्या न बने। इतना उत्साह भर दिया जाता है कि देशज दुख सुख उन्हें सालते नहीं।
आपका यह कथन भले ही हमें अपने बच्चों की फिलहाल प्रशंसा महसूस हो। हम कुछ समय हर्षित भी हो लें पर वह आपके बच्चों को ईर्ष्या से भरने के लिए काफ़ी हैं। नतीजा वही होगा जो आस्ट्रेलिया में हो रहा है। उन्हें बचाने के लिए बहुत कुछ कहा और किया जाएगा पर अंततः यही होगा उनका न शहीदों में नाम रहेगा न देश भक्तों में। जो लौटेंगे वे सपनों का मलबा लादे। आपका यह भाषण हमारे पक्ष में न होकर विरुद्ध है। ईर्ष्या ऐसी आग है जो नज़र नहीं आती पर धीरे धीरे आधार को ख़ाक कर देती है।

Monday, 15 June 2009

साहित्य, संवेदना भाषा परंपरा

साहित्य यानी भाषाई साहित्य हमारी पहचान है। लेकिन माना जाता है कि जो साहित्य अंग्रज़ी में लिखा जा रहा है वह देश की पहचान है। ज़िंदगी से हम जूझते हैं उसके साथ दो दो दो हाथ हम भाषाई लोग करते हैं, भूख और तिरस्कार हम ओटते हैं। लेकिन वे लोग जो अपनी भाषा की जगह बाहरी भाषा में उसका रूपांतरण कर देते हैं, और जिसको विदेशी भाषा भाषी स्वाद बदलने के लिए या अपनी ज्ञान वृद्धि के लिए सोर्स सामग्री मानकर, अपना गवेषणा का आधार उस आयातित ज्ञान मंजुषा को सजा कर ख़ुश होते हैं, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित करते हैं। मैं इस बात के खिलाफ़ नहीं कि हमारा अनुभव बाहर न जाए। ज़रूर जाए पर उसकी दो शर्तें होनी चाहिएं एक तो ज़मीनी अनुभव यानी लेखक जिसे ज़मीन से जु़ड़कर अर्जित करता है और उसे अपने अनुभव की भाषा में अभिव्यक्त करता है उस प्रक्रिया के साथ संलग्नता। दूसरी जातिय पहचान। अनुभव की भाषा ही अनुभवों को बिंब और जीवंतता देती है। मैं य़ह नहीं कहता कि अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं में संवेदनात्मक बिंब और जीवन के जीवंत चित्र संभव नहीं होते। ख़ूब होते हैं। शेक्सपियर मे मिलने वाली भाषाई चित्रात्मकता कालीदास से सर्वथा भिन्न है। चाहे प्रकृति हो या मानव मन की स्थितियां हों। कोई भी बड़े से बड़ा विदेशी कलाकार या लेखक मेघों को विरहिणी प्रेमिका का दूत बनाकर पर्वत पर्वत, जंगल जंगल, मौसम मौसम प्रीयतम के पास संदेश लेकर भेजने की कल्पना नहीं कर सकता। अगर करेगा तो परिवेश के साथ उसकी अंतरंगता कालीदास जितनी गहरी शायद न हो। इसी तरह शेक्सपियर की तरह ‘कमज़ोरी का नाम ही औरत है’ कहने में भारतीय लेखक को बहुत कसरत करनी पड़ेगी। दुर्गा काली सरस्वती सब सामने आ खड़ी होंगी। वातावरण और प्रकृति, संवेदना और भाषाई अभिव्यक्ति का अंतरंग स्त्रोत होती है। हम अपनी मातृ भाषा में ही जीते हैं। वही हमारे अनुभव और अभिव्यक्ति की कमलनाल है।
सवाल उठता है कि इस कमलनाल को हम दूसरी भाषाओं में कैसे प्रत्यारोपित करते हैं। क्या क़लम बांधते हैं? क़लम परिवर्धन नहीं करती। वह अपने स्टेम पर ही अपने रंग का प्रस्फुटन करती है। इसीलिए कलम के नीचे फूटने वाली देसी कल्लों को तोड़ते रहते हैं। वैसे कलम बांधकर उसे सुरक्षित रखना भी एक कला है। दूसरा विकल्प है विदेशी संस्कार या सभ्यता के लिए हम अपने साहित्य को पनीर की तरह उपयोग में लाते हैं। यानी जिस देसी पौध पर कलम बांध रहे हैं वह मूल रूप में मौजूद रहता है लेकिन रंग वही होते हैं जो आयातित संस्कार उसमें कलमबंद किए गए हैं। हिंद स्वराज में विदेशी सभ्यता को शैतान की सभ्यता कहा गया है। साहित्य चाहे वह किसी भी देश या सभ्यता से ताल्लुक रखता हो वह केवल समाज का ही नहीं अपनी संस्कृति और सभ्यता का भी संवाहक होता है। हमारा साहित्य हमारे जातिय संस्कारों और चिंतन को अभिव्यक्त करता है। भाषा, अनुभव, अनुभूति और चिंतन सब कुछ उसे अपनी जड़ों से मिलता है। लेकिन हमारे अनेक लेखक जो अंग्रेज़ी में लिखते हैं अधिकतर की विषय वस्तु विदेशी पाठकों को ख़ुश करने वाली होती है। सेक्स एक ऐसा माल है जो विदेशी बाज़ार में ख़ूब खपता है। जब ‘व्हाइट टाइगर’ को बुकर सम्मान मिला तब बुकर संस्था के पूर्व अध्यक्ष ने कहा था कि भारतीय अंग्रेज़ी लेखक अधिकतर सेक्स ओरियन्टेड उपन्यास लिखते हैं। अपने देश के बारे में क्यों नहीं लिखते? अंग्रेज़ी में लिखने वाले भारतीय लेखकों पर इस तरह के विदेशी विद्वान आलोचकों की बात का कोई असर होता है या नहीं यह तो कह सकना किठन है हालांकि देश के अनेक विद्वानों को सेक्स के प्रति उनका अतिरिक्त आग्रह अखरता है। क्या उनके ऊपर बाज़ार का दबाव है। जब टाल्सटाय का उपन्यास ‘वार एण्ड पीस’ आया था तो सामान्य पाठक रूस के बारे में कम जानते थे। लेकिन संवेदना और जीवनाअनुभव की व्यापकता के कारण भारत के ही नहीं संसार भर के पाठकों ने उसे हाथों हाथ लिया था। स्व. रोडारमल द्वारा किया अनुवाद गोदान का अंग्रेज़ी अनुवाद अमेरिका में उसके व्यापक सामाजिक संदर्भों के कारण शिद्दत के साथ पढ़ा जाता है।
इन सब बातों के पीछे मेरे कहने का तात्पर्य केवल यह है भले ही राजनीतिक कारणों या अंग्रज़ी की चकाचौंध से हिंदी और भारतीय भाषाओं का साहित्य हाशिए पर है लेकिन भारत के जीवन की विविधता भारतीय भाषाओं के साहित्य में है। उदाहारण के लिए संसार के 19वीं सदी के सबसे ऐतिहासिक और त्रासद भारत विभाजन पर उपन्यास अंग्रज़ी में नहीं लिखा गया जबकि बड़े बड़े अंग्रेज़ीदां प्रशासक और विचारक विभाजन से जुड़े थे। उन्होंने जीवनियां लिखीं लेकिन साहित्य ओर उस समय की बनते बिगड़ते सांस्कृतिक परिवेश की तरफ़ न्यूनतम नज़र गई। अलबत्ता हिंदी उर्दू में ज़रूर लिखे गए। यशपाल का झूठा सच, उदास नस्लें भीष्म जी का तमस इसके उदाहारण हैं। जब मैं मारक्वेस की रचनाऐ़ं पढ़ता हूं, ख़ासतौर से हंड्रेड ईयर्स आफ सालिट्यूड पढ़ते हुए तो मैं चकित रह जाता हूं कि अपने सीमित देशज परिवेश में विश्व की संस्कृति को अपने अंदाज़ में समेट लेते हैं। चाहे नियोग हो या उन ख़ित्तों में होने वाली लड़ाईयां हों या अंधविश्वास हों। लोक कथाएं हों या परास्वप्न हों और हज़ारो मील दूर भारत से आने वाली कथा परंपरा और भविष्यवाणियों के संदर्भ और भोजपत्र पर संस्कृत में लिखा इतिहास हो। संवेदना और कथा संदर्भों का ऐसा विलक्षण जुगाड़ और ऊनको आत्मसात करने की अद्भुत क्षमता ही उसे महान बनाती है। एक समानान्तर महाभारत की संकल्पना अपनी धरती और परिवेश में रोपित करना इस बात का द्योतक है कि लेखक इस ख़तरे को उठाने के लिए तत्पर है कि अस्वीकृति उसकी रचनातमकता को किसी हालत मे छोटा नहीं कर पाएगी। वह भी अपनी भाषा में। शायद ज़मीन से जुड़कर रेंगने की अदम्य शक्ति ही लेखक को ऊपर और ऊपर उठाती है। मैं अंग्रेज़ी काम भर की जानता हूं। लेकिन जब भारतीय अंग्रेज़ी लेखकों की रचनाएं पढ़ता हूं तो मुझे अकसर महसूस होता कि जिस तरह वे स्लैंग का इस्तेमाल करते हैं वह मूल विदेशी लेखकों के स्लैंग प्रयोग से भिन्न होता है सच कहूं तो कमज़ोर होता है। कई बार तो नक़ल लगता है। अंग्रेज़ी के एक भारतीय उपन्यास में भाई बहिन के प्रेम संबंध को काफ़ी खुलेपन से प्रदर्शित किया गया है। उसके बारे में संभवतः टाइम मैगज़ीन में राइटअप पढ़कर काफ़ी आतंकित हुआ था। बोल्ड तो था। नग्नता शायद किसी शक्तिशाली तानाशाह के विरोध से भी अधिक बोल्ड होती है। लेकिन संलग्नता और समरसता की दृष्टि से वह कमज़ोर था। दरअसल वह लेखक की ख़ता नहीं। जिस पृष्ट भूमि से कोई भी भारतीय लेखक आता है उसमें उन स्थितियों के लिए जिन्हें वह गढ़ रहा है अगर उसमें उनके अनुसार न सटीक बिंब हों और न भाषा संसार तो वह गढ़ा हुआ कहा जाएगा। स्थितियों से अपरिचितता रचनात्मक संवेदना को क्षति पहुंचाती है। भाषा उधार ली हुई हो तो लुहार की तरह ढांचा खड़ा करके बढईगिरी करके सजाना अनिवार्य हो जाता है। यह तब तक करना होता जब तक वह संवेदना समाज पर आरोपित न कर दी जाय। क्या यह संभव है कि आयातित माल को अपना उत्पाद मानकर हम हम आत्मसात कर लें? यह किसी भी संवेदनशील साहित्यिक समाज के लिए कठिन परीक्षा होगी।

Thursday, 11 June 2009

सामान्य आदमी और ज़मीदोज़ कलाकृतियां
7 जून 09 के हिंदू में ‘A grocer with an eye for antiques, archaeological sites’ पढ़ा तो मुझे राहुल जी के साथ हुई एक घटना याद आई। वे इलाहाबाद आए हुए थे। सवेरे महात्मा गांधी रोड़ पर टहलने जा रहे थे। साथ में व्यास जी और कोई और एक सज्जन थे। व्यासजी स्वयं एन्टीक्स का ज्ञान रखते थे और इलाहाबाद संग्राहालय के शायद डायरेक्टर थे। राहुल जी एकाएक सी पी एम कालिज के सामने लगे पीपल के एक पेड़ के सामने रुक गए। कुछ देर खड़े उसकी जड़ों की तरफ़ टकटकी लगाकर देखते रहे। व्यास जी ने पूछा ‘क्या देख रहे हैं राहुल जी’। वे बोले अभी बताता हूं। दूसरे आदमी से कहा आप ज़रा दो तीन रिक्शा वालों को बुला लें। किसी के पास बेलचा हो तो लेता आए। नहीं तो हाथों से ही काम चलाएंगे। तीन चार आदमी आ गए बेलचा भी आ गया। उन्होंने स्वयं बेलचे से धीरे धीरे मिट्टी हटाई। एक मूर्ति दिखाई पड़ी। थोड़ी मिट्टी और हटाई। फिर जिन आदमियों को बुलाया उनसे कहा इसे धीरे धीरे हिलाकर निकालना शुरू करो। झटका न लगे। लगभग घंटे भर की मशक्कत के बाद लगभग डेढ़ दो फ़िट की किसी देवी की प्राचीन मुर्ति बाहर निकल आई। वहीं उसे धुलवाई। राहूल जी इस बीच चुप रहे। व्यास जी कह रहे थे कि शायद इसे मूर्तिचोर दबा गए। राहुल जी ने कहा ‘जब ज़मीन के अंदर से दबाव बनना शुरू होता है तो मिट्टी फूलने लगती है। धरती के अंदर दबी वस्तु ऊपर आने लगती है। यह मूर्ति दसवीं शताब्दी की मालूम पड़ती है।‘ बाद में उन्होंने व्यास जी के ज़रिए म्यूज़ियम में भिजवा दी।
‘ग्रोशर्स आई’ पढ़कर मुझे उपरोक्त घटना का ध्यान आ गया। राजस्थान के ओम प्रकाश शर्मा उर्फ कुक्की बूंदी में पड़चूनिए की दुकान करते हैं। हड़ौती क्षेत्र में दबी कलाकृतियों को उन्होंने निकाला है। हालांकि वे आठवी क्लास तक पढ़े हैं लेकिन उनकी नज़र कलाकृतियों को उसी तरह पहचानती है जैसे राहुल जी की नज़र ने ज़मीन में दबी मूर्ति को पहचान लिया था। कुक्की ने हड़ौती की मिट्टी में दबी संस्कृति को उन कलाकृतियों के रूप में एक तरह से ईजाद किया है। सारी ज़िंदगी इसी काम में लगा दी। किसी लालच में नहीं बल्कि कलाकृति और प्रचीन संस्कृति के प्यार में । अगर कुक्की चाहते तो वे भी अनेक स्मग्लरों की तरह अपने परिवार को एक सम्मानजनक जीवन दे सकते थे। विंध्याचल पर्वत श्रेणी में नमना स्थान में उन्होंने हरप्पापूर्व संस्कृति की तांबे और पत्थर की कलाकृतियों का भंडार खोजा है। प्राचीन राक पेंटिंग्स उनके संग्रह में हैं।
ओम प्रकाश शर्मा उर्फ कुक्की मानते हैं कि मैं जानता था कि कि बूंदी प्रचीन सभ्यता की कलाकृतियों से भरा पड़ा है। मेरा मानना है कि गराडा नदी के किनारे 35 किलो मीटर लंबी पट्टी में सैंकड़ों चट्टानी गुफाएं है। इतनी लंबी आरकियोलाजिकल कलाकृतियां की पट्टी शायद ही दुनिया में कहीं हो। उसके पास 400 बी सी का ,सबसे पुराना सिक्का है। हालांकि वह समान्य पढ़ा लिखा है लेकिन उसने सब आर्कीयोलियोजिकल उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया है, जहां जहां इस क्षेत्र में दुनिया में काम हुआ है, उसका इल्म है। उसे इस बात का दुख है उसका काम दुनिया में किसी से कम नहीं। पश्चिम देशों में इस क्षेत्र में काम करने वाले तत्काल प्रशंसा प्राप्त कर लेते हैं। मैं दो दशक से अपने परिश्रम की स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
राहुल जी ने भी शिक्षा की दृष्टि से बड़ी बड़ी डिग्रियां प्राप्त नही थे। लेकिन उन्होंने गुना था। उसी ने उन्हें अनेक विषयों का उद्भट विद्वान बनाया। कुक्की में समर्पण है। अपने काम के प्रति लगाव है। इस तरह के बहुत से लोग मुफ्फ़सिल जगहों मे अभी भी मिल जाएंगे जिनके पास प्राचीन कलाकृतियां हैं लेकिन वे सरकार और पुलिस के डर के मारे निकालने में डरते हैं। दरअसल लोगों की नियमों के प्रति अनभिज्ञता भी इसका कारण है। बहुत से लोगों को वे लोकेशन्स मालूम हैं जहां प्राचीन कलाकृतियां दबी पड़ी हैं। वे दो कारणों से नहीं बताते 1. स्थानीयता का मोह, 2. पुलिस का भय। कानपुर में मकान बनवाते समय ज़मीन से काफ़ी सोने के सिक्के निकले थे वहां लूट मच गई थी। बाद में पुलिस ने बरामदी भी की, पर सब नहीं कर पाई। डा. जगदीश गुप्त हरदोई के शायद बिलग्राम के पास किसी गांव के रहने वाले थे। उनको तांबे के बने हथियार टेराकेटाज़ भांडे आदि प्रचीन कलाकृतियों का ज़खीरा मिल गया था। उस ज़माने में विभिन्न संग्रहलयों में महीने में एक बार वाज़ार लगता था। उसमें कलक्टर्स अपनी अपनी कलाकृतियों के साथ एकत्रित होते थे संग्रहालय उन कलाकृतियों को अच्छे दामों पर खरीदते थे। जगदीश जी ने नागवासुकी पर पहला मकान बनवाया तब बताया था धरती का पैसा धरती मे लगा दिया। लेकिन शायद बूंदी के इस अम्यचोर आरक्योलिजिस्ट को इस बात का इंतज़ार है कि उसके काम को अंतर्राष्ट्रीय एकेडेमिक दुनिया मे स्वीकृति मिले। कम से कम भारत सरकार तो उसके काम का संज्ञान ले।

Sunday, 24 May 2009

Lohia aur sahitya

लोहिया और साहित्य

23 मार्च 09 को डा. राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी का आरंभ हुआ। दिल्ली के मावलंकर हॉल में उसकी शूरूआत खांटी लोहियावादी नेता और साथी जनेश्वर मिश्रा ने की। मुझे भी उसमें शिरकत ranकरने के लिए बृजभूषण जी और आनन्द भाई ने बुलाया था। एक गोष्ठी की अध्यक्षता भी कराई। इलाहाबाद प्रवास के दौरान डा लोहिया से संपर्क हो गया था। जब 1962 में आ. चंद्रभानु गुप्ता जी ने चुनाव लड़ने के लिए कहा तो मैंने माफ़ मांग ली थी। जब मुझे अध्यक्षीय भाषण देने के लिए कहा गया तो लेखक होने के नाते मैंने साहित्यिक संस्मरण सुनाने का निश्चय किया। मैं जानता था कि वहां पर उपस्थित लोहियावादी शायद ही इस तरह की बातें सुनने न आए हों। लेकिन चंद घटनाएं सुनाई।
जब लोहिया जी अपने काफ़ले के साथ आते थे तो सबसे पहले उनकी नज़र काफ़ी हाउस का नज़ारा करती थीं। हम नए लेखक बैठे होते थे ज़रूर पूछते कुछ लिखते पढ.ते भी हो या नहीं। देश की उन्नित के साहित्य ज़रूरी है। वही देश की पहचान बनता है।
एक बार स्व विजयदेव नारायण साही ने बताया कि लोहिया जी ने निराला जी से मिलने की इच्छा प्रकट की। साही जी ने कहा कि उनके मूड पर निर्भर करता है वे कैसा व्यवहार करें। उल्टा सीधा कुछ कह दिया तो बर्दाश्त कर सकेंगे।
चलो देखते हैं। उम्र में बड़े ही होंगे। वे दोनों दोपहर बाद पहुंचे निराला जी सोकर उठे थे। उन्होंने जाते ही पूछा कहो साही कैसे आए।
साही जी ने कहा आप से लोहिया जी मिलना चाहते थे। उन्हें आपसे मिलाने लाया हूं। उन्होंने उनकी तरफ़ देखा। जवाहरलाल तो इलाहाबाद के होकर कभी नहीं मिले, आप कैसे आ गए। लगता है वे लोहिया जी को उनके बराबर रखते थे।
आप देश के बड़े कवि हैं आप से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे। निराला जी ने लंबा सा हूं किया जैसे उनकी हां में हां मिला रहे हों। निराला जी ने अपने आप ही बड़बड़ाया जवारलालआते तो उन्हें भी चाय पिलाता। उनके पास लुटिया थी बाल्टी में से पानी भरकर अंगीठी पर रख दिया। और पूछा –तुम भी कविता लिखते हो?
जी नहीं पढ़ता हूं?
क्या पढ़ा?
उन्होंने कहा आपकी राम की शक्तिपूजा। उन्होंने लंबा सा हूं किया। लोहिया जी बोले उसने मुझे प्रेरणा दी है। तब तक चाय बन गई थी।
मैं सोचता हूं कि क्या आज शायद ही ऐसा कोई राजनेता होगा जिसने राम की शक्ति पूजा पढ़ी हो प्रेरणा लेना तो दूर की बात है। चाय पीकर जब लोहिया जी निकले तो निराला जी बुदबुदा रहे थे फिर आना।

कई बातें लोहिया जी के संदर्भ में ध्यान आती हैं मुझे अंग्रज़ी हटाओ आंदोलन में जनेश्वर जी के साथ काम करने का अवसर मिला था। इस कार्यक्रम के अगले दिन मैंने सब हिंदी और अंग्रेज़ी अखबार देखे। इतने बड़े व्यक्ति के जन्म शताब्दी के आरंभ के बारे में अखबारों ने क्या रपट छापी। अंग्रेज़ी का तो उन्होंने विरोध किया था। उन्होंने रपट नहीं छापी तो बात समझ में आती है लेकिन मेरे लिए आश्चर्य की बात थी कि जनसत्ता को छोड़कर किसी भी हिंदी अखबार ने उस कार्यक्रम का नोटिस नहीं लिया था।अगर गांधी और लोहिया न होते तो इन हिंदी अखबारों का पता नहीं क्या स्थिति हुई होती।

Friday, 1 May 2009

Prathmikta se door

शिक्षा जान का जंजाल
आज संसार के सबसे बड़े जनतंत्र का चुनाव हो रहा है। मुद्दे क्या हैं? कुछ नहीं। विदेशों मे जमा धन 100 दिन में ले आऐंगे जनता को क्या मिलेंगा? ऐसा लगता है अडवानी जी प्रधानमंत्री बनते ही आर्डर देंगे और स्वीटज़रलैंड के बैंक दरवाज़े खोल देंगे देश का सारा धन साइफ़न होकर देश में आ जाएगा। क्यों बेवकूफ़ बनाते हैं? आपके ज़माने में ही तो दाउद के चेले का प्रत्यार्पण का किस्सा चालू हुआ था। पुर्तगाल से लाने में कितना पैसा फुंका और कितना वक्त लगा। लिखकर देना पड़ा कुछ भी हो जाए फांसी नहीं देंगे। क़बुल की तरह फिर समर्पण। जो सरकारों को करना चाहिए और कर सकती हैं वह तो करती नहीं आसमान से तारे तोड़कर लाने की बात करती हैं। सबसे पहली प्राथमिकता तो थी बच्चों की शिक्षा की। साठ साल में कितना और क्या हुआ? वही नंगा ढाक। उस पर तीन पात भी नहीं आए। बच्चों की शिक्षा, भाषा और जन सुरक्षा। कभी सोचा कि क्यों नही आए? आपको एक दूसरे पर दोषारोपण से फ़ुर्सत मिले तो कुछ हो। बच्चे आपके मतदाता थोड़े ही हैं जो आप उनके लिए कुछ करेंगे। बड़े लोगों के बच्चों के लिए तो विदेश हैं ही। आप कहेंगे उनके मां बाप तो हैं मतदाता। मां बाप कई तरह के हैं, उनकी आवश्यकताऐं और प्राथमिकताऐं भी उतने ही तरह की हैं जितने तरह के वे स्वयं हैं। उसका फ़ायदा सरकारें उठाती हैं। जैसे जात बिरादरी ने देश को बांटा उसी तरह सरकारें जन को उनकी ज़रूरतों और प्राथिमकताओं के हिसाब से फेंट रही हैं। भाषाओं को बांटा, शिक्षा को बांटा सुरक्षा को बांटा। नेहरू जी ने तो 1945 में ही गांधी के इस प्रस्ताव को धुर से ठुकरा दिया था कि देश का संचालन हिंद स्वराज के हिसाब से हो। तीन बातें तो उनके मन माफ़िक थी ही नहीं बाकी भी नहीं थीं। गांधी ने उसमें साफ़ कहा आपको हमसे बात करनी है तो हिंदी में करनी होगी। नहीं तो जाइए अपने गांव। यह बात को नेहरू कैसे बर्दाशत करते। लेकिन संस्कृति और भाषा की बात करने वाली पार्टियां भी जब सत्ता में आई इन बातों को वे भी भूल गईं। शिक्षा तो किसी के एजेंडे में था ही नहीं। था तो बंदर बांट के साथ। पिछली सरकारों ने शिक्षा को खाने कमाने के लिए प्राइवेट सेक्टर में डाल दिया। खाओ कमाओ और बिगाड़ो। भाषा बिगाड़ो, पाठ्यक्रम बिगाड़ो और उनके ज़रिए सभ्यता संस्कृति बिगाड़ो। जहां तक सुरक्षा का सवाल है, सरकारी सुरक्षा हमारे यानी नेताओं के लिए, प्राइवेट औरों के लिए। सरकारी सुरक्षा के लिए अलग अलग वर्ग हैं। जैसे हत्याएं भी पद के हिसाब से होती हैं। जैसे जैसे भयक्रांत लोग पदासीन होते गए वैसे वैसे सुरक्षा बरीक होती गई। कई बार तो आम आदमी इन लोगों को सुरक्षा में ही मारा जात है। बेइज़्जत तो हो ही जाता है।
ख़ैर, मैं बात कर रहा था शिक्षा की। हम लोगों की शिक्षा बुनियादी शिक्षा में हुई थी। सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते थे। सब काम अपने हाथों से करते थे। एक रूपया फ़ीस जाती थी। देश आज़ाद होने के बाद श्रमदान और हाथ का काम उसका हिस्सा हो गया था। मूज़्फ्फ़रनगर के गांधीनगर की सड़क बनाने में हम बच्चों ने श्रमदान किया था। जब वहां जाता था तो सड़क देखऩे भी जाता था। अगर देश बनाने में भी बाद के लोगों ने श्रमदान किया होता तो शायद देश के प्रति ऐसी ही ललक उनमें भी होती। हैलीकाप्टरों से झांकते हुए ऊपर ऊपर से न उड़ जाते। आज शिक्षा, मेरा मतलब आरंभिक शिक्षा, सबसे अधिक अधिक रट में है। उसके बारे में कोई एक मत नहीं। पब्लिक स्कूल अपना पाठ्यक्रम चलाते हैं। अधिकतर नए स्कूलों के पास खेल के मैदान तक नहीं। किताबें इतनी की बच्चे कुबड़े हो जाएं। अधिक किताबें बच्चों के हित में नहीं रखी जातीं। इसलिए रखी जाती हैं कि मैनेजमेंट स्कूल ड्रेसेज़ और कोर्स की किताबों पर कमीशन लेकर धन कमाता है। फ़ीस इतनी कि मां बाप की कमर टेढ़ी हो जाती है। छठे पे कमीशन के नाम पर दो दो चार चार हज़ार फ़ीस बढ़ाई जा रही है। यह कोई नहीं जानना चाहता कि कितने स्कूलों ने पिछले पे कमीशन्स अपने यहां लागू किए हैं। किए भी हैं या दस्तख़त कराकर आधी पौनी तनख्वाह देकर छुट्टी पा लेते हैं। दरअसल पहले ही इतने आगे से दौड़ना शुरू किया कि अब फ़ीस बढ़ाया जाना मां बाप और बच्चों के जी का जंजाल हो गया। सारे देश में फ़ीस बढ़ाई जा रही है। उत्तर भारत में तो यह महामारी बुरी तरह फैली है। जहां तक मैं जानता हूं ब्रिटिश सरकार के जमाने में कान्वेंटस को छोड़कर लगभग सब स्कूलों में कोर्स समान थे। मेयो वगैरह तो हाई फाई थे ही। लेकिन गवर्मेंट स्कूल और म्यूनिसपेलिटी के स्कूल, मास्टरों के नाम से चलने वाले प्राइवेट स्कूलों में समानता थी। बच्चों को टार्चर किया जाता है इस हद तक कि वे मर जाते हैं।मारा पीटा पहले भी जाता था लेकिन उन्हें जान से मारने के लिए नहीं। कानपुर के जिला अदालत ने गार्जियन्स की फ़ीस बढ़ाने के खिलाफ अपील ख़ारिज कर दी। कहा नहीं जा सकता जज साहब मामले के अंदर कितनी गहराई तक गए। किन बिंदुओं पर जांच की। यह देश भर के बच्चों का मामला है। हाई कोर्ट को फ़ाइल मंगाकर जांच करनी चाहिए।
अगर इसका कोई रास्ता नहीं निकलता यह असमानता बच्चों के स्तर पर बढ़ती जाती है तो निरक्षरता फ़ीस के कारण बढ़ेगी। इस महामारी को रोकने का सत्याग्रह ही एक तरीक है। स्कूलों में नाम लिखा होने के बावजूद बच्चों को न स्कूल भेजें और न फ़ीस जमा करें।
दूसरे मां बाप अपने आराम में से कटौती करके घरों पर बीस बीस पच्चीस पच्चीस बच्चों के स्कूल चलाएं। आपस में विषय बांट कर पढ़ाएं। यह एक बड़ा आंदोलन बन सकता है। यह मानव अधिकार का मामला है। आप मां बाप पर एक सीमा तक दबाव डाल सकते हैं बच्चों के पाठ्क्रम में समान बनाएं। मातृ भाषा को प्रमुखता देना इसलिए भी ज़रूरी है कि गरीब और पिछड़े बच्चों में कुंठाएं न बढ़ें। इस समय देश की तकनीकी शिक्षा चाहे जितनी आगे हो पर आरंभिक शिक्षा बड़े भारी संकट से गुज़र रही है। अगर राष्ट्र स्तर पर इसका समाधान नहीं निकला गया तो भविष्य की पीढ़ी भारतीय कम और तकनीकी ज़्यादा होगी। तकनीक भी विदेशी। हम दूसरे देशों को थैंक्यू थैंक्यू कहते घूमेंगे।

Tuesday, 28 April 2009

चुनाव और जनतंत्र
हर पांच साल मे ﴾यदि मिड टर्म न हो﴿ राजनीतिक पार्टियां अपने गिरहबान में झाकने के बजाय जनता को वोटर का दर्जा देकर उसका जायज़ा लेती हैं कि वह पांच साल में मूर्ख से कितना अक्लमंद हुई। वे चाहती हैं कि वोटर बैल ही बना हमारी गाड़ी खींचता रहे। उसे हर तरह से पटाते हैं कि वे उसके आससमान से तारे तोड़कर लाएंगे। एक पार्टी लगभग छः साल शासन में रही। वह पार्टी धर्म की पाबंद।गंगा गोदावरी और गऊ की गले तक भक्त। दूसरी ऐसी मज़दूरों और किसानों की तानाशाही कायम करने के लिए प्रतिबद्ध, अपने हिव्ज़ सिद्धांतों को बार बार दोहराने वाली, देश में बेरोजगाररों के ग्राफ़ को रटकर वोटर को बिना अपने घर की दुर्दशा बताए रिझाने वाली। तीसरी पार्टी के उस आश्वासान की प्रतीक्षा करते करते लोग थक गए कि वह दिन कब आएगा जब गरीबी हटेगी और अच्छे दिन आएंगे। पर वोटर इन आश्वासनों की धुंध के बीच से यथासामर्थ्य रास्ता बनाने की कोशिश करते हैं। मौक़ा मिलते ही पलट देते हैं। पार्टियें भी कम चालाक नहीं। वे अपना जाति का दाव फेंकती हैं। कुछ उसमें फंसते हैं। कुछ फंसने की कीमत चाहते हैं। वोटर जनतंत्र में भी परतंत्र है। धर्म का जाति का व्यवसाय का अंकुश उस पर रखा रहात है। वह वोट अवनी मर्ज़ी से नहीं दे सकता। चुनाव जनतंत्र में देश के लिए एक संस्कार की तरह होता जा रहा है। इसको प्रदूषित करना या होते देखना अपने में एक अपराध है।
गंगा को पवित्र मानते मानते मानते हमने उसे प्रदूषित कर दिया। आज पुष्पों की जगह उसमें मृत शरीर तैरते रहते हैं। उसी प्रकार चुनाव की इस वैतरणी में जिसे सामान्य मतदाता अपने मौलिक अधिकारों की संरक्षिका मानता है मरी हुई आत्मा वाले बाहूबलि अवरोध बने शिलाखंड बनकर अड़ जाते हैं। सब पार्टियां उनका और एक्टरों का सहारा लेती है। उस वैतरणी को प्रदूषित करते जाते हैं। इनकी संख्या हर बार बढ़ जाती है। प्रदूषण कम होने के बजाए कई गुना बढ जाता है। राजनीतिक पार्टियां इसके लिए ज़िम्म्दार हैं।कुछ कम कुछ ज़्यादा। दरअसल ये पार्टियां उनके माध्यम से मतदाताओं पर आतंक जमाती हैं। ठीक उसी तरह जैसे जल में पड़ा मगरमच्छ जलचरों पर ही नहीं तट पर पानी पीनेवाला राहगीर तक उसके आतंक का शिकार हो जाता है।
मतदता भी इसके लिए उत्तरदायी हैं। जब ये मगरमच्छ उनकी तरफ़ उनके अधिकारों का अधिग्रहण करने के लिए लपकते हैं तो उन्हें पछतावा होता कि हमने तो अपनी सुरक्षा के लिए इन्हें मेड़ समझा था ये तो फ़सल को रौंधने वाले वहशी जानवर हैं। अब क्या होता है जब चिड़ियन चुग गई खेत। खेत चुगवाने वाली वही पार्टियां हैं जो घोसल में भली बनी बैठी रहती हैं मौका मिलते ही उन दरिंदों के साथ हिस्सा बांटने फुर्र से उड़कर आ जाती हैं। मतदाता उन ठगों के बहकावे में आकर सब कुछ लुटा बैठता है। अगर पार्टियां उनकी ठेकेदार हैं तो मतदाता जो चुनाव के समय सबसे बड़ी शक्ति होता हैं अपने अधिकारों की दुर्गति करने के लिए क्यों तत्पर रहता हैं। अगर पार्टियों का दिया ज़हर खाना और दूसरों को खिलाना बंद कर दें तो पार्टियों को नसीहत मिलेगी और वे इस पाप से बचेंगे।
उनमें से कितने किस वर्ग से आते हैं। उनकी तकलीफ़ों और ज़रूरियात से कितना ताल्लुक है। जो पार्टियां जिस आधार को बनाकर चल रही थीं वे उनसे जुड़े मूल्यों तक से बेपरवाह हो जाती हैं। एक पार्टी राम गंगा और गऊ की बात करते करते 6 साल राज कर गई लेकिन सत्ता में रहते तीनों में से कोई भी याद नहीं आया। यहां तक कि उसने गंगा को न राष्ट्र नदी घोषित किया न विदेशों से करोड़ों रुपया लेने के बावजूद प्रदूषण में कोई अंतर किया। पिछली सरकार ने केवल इतना किया कि उसे राष्ट्र नदी घोषित कर दिया। वह भी कानपुर के गृहराज्य मंत्री के प्रयत्न से। चुनाव ऐसी शै है कि जिसने जो किया उसे भी नकार कर जीत का सुख पा लेते हैं। बाद में भले कुछ भी हो। चाहे तीसरी दुनिया के देश हों या पूंजीपति और साम्यवादी सब गरीबी को दूसरे देशों से मदद लेनी की सीढ़ी बनाए रहते हैं । कहीं कम या ज्यादा, कुंडली जमाए बैठी है। गरीबी किसी एक की बपौती नहीं लेकिन बंगाल में तीस साल एक सरकार रही वहां भी टस से मस नहीं हुई। उ प्र में सरकारें रहीं नेता करोड़पति होते गए। जनता का पैर ढका न पेट और न सिर। सवाल यह है कि जनता जागती क्यों नहीं। जनता को अपना दुख नहीं सालता तो न साले। पर दूसरे का काला धन भी नहीं सालता। हमारे नेता नया नया फारमूला ढूंढते रहते हैं किसी तरह सत्ता मिले। बाद की बाद में देखी जाएगी।
काले धन का शगूफ़ा छोड़ा गया है। विदेशों में भारतीयों का धन जमा है उसे ले आया जाय तो गरीबी का काल कट जाएगा। इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। प्रधानमंत्री इऩ वेटिंग का वादा उनकी प्रतीक्षा ख़त्म करा दो तो वे सारा रुपया 100 दिन में छकड़ों में नहीं तो जहाज़ों में भर लाएंगे। वुड बी साहब थोड़ी अवधि तो बढ़ा ही दीजिए। पहले भी एक प्रधानमंत्री ऐसा ही दाव लगा चुके हैं। कुछ तथ्य पर नज़र करने की इजाज़त चाहता हूं। देखिए आपसे ज़्यादा कौन जानता है कि पुर्तगाल से दाउद के चेले को भारत लाने में कितने पापड़ बेलने पड़े थे वहां भी आपकी सरकार को पुर्तगाल की सरकार को आश्वासन देना पड़ था कि उसे सज़ा ए मौत नहीं दी जाएगी। अब वही चुनाव लड़ रहा है। अब आपही बताएं स्वीटज़रलैंड के बैंकों में आपके देश का पैसा नहीं दूसरे देशों के लोग भी हैं वे भी पैसा रखे हैं वे क्या लाने देंगें। माननीय वे आपसे यह पूछेंगे अपने देश में आपने ब्लैक औरे बेनामी धन निकलवा लिया। 22 अप्रेल के हिंदू में दो मार्क्सवादी नेताओं के वक्तव्य छपे हैं कि एन डी ए सरकार के ज़माने में मारीशस रूट से भारत का मारमुलक का धन बाहर जाता था जब संसद में हवाला धन के संदर्भ में सवाल उठाया गया तो तत्कालीन अर्थ मंत्री के पास कोई जवाब नहीं था। वैसे भी उनके इस प्रयास के जवाब में स्वीटज़रलैंड के बैंकों के अध्यक्ष का जवाब छपा था कि 1-हम ईमानदार लोगों का धन रखते हैं। 2-हमारी सरकार का कोई ऐसा आदेश नहीं, हम अपने नियम से काम करेंगे। क्या किसी सरकार का क़ानून बदलवाना इतना आसान है। इस तरह के सवाल उठाना और झूठे आश्वासन दे कर जनता को बहकाना किसी भी पार्टी के लिए जनतंत्र को अपमानित करना है। सरकारें चाहे किसी की भी हों अपने कार्यकाल में जिन कामों को पीछे सरका देती हैं उन्हीं कामों के न करने का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ती हैं।
गांधी जी ने कहा था यह आज़ादी कांग्रेस के लिए नहीं आई देश के लिए है। लेकिन दुर्भाग्य है कि नेता लोग आज़ादी अपने लिए रखना चाहते हैं गुलामी दूसरों को बांट रहे हैं।