Saturday 25 July 2009

सामान्य आदमी और ज़मीदोज़ कलाकृतियां

7 जून 09 के हिंदू में ‘A grocer with an eye for antiques, archaeological sites’ पढ़ा तो मुझे राहुल जी के साथ हुई एक घटना याद आई। वे इलाहाबाद आए हुए थे। सवेरे महात्मा गांधी रोड़ पर टहलने जा रहे थे। साथ में स्व. व्यास जी और कोई और एक सज्जन थे। व्यासजी स्वयं एन्टीक्स का ज्ञान रखते थे और इलाहाबाद संग्राहालय के शायद पहले डायरेक्टर थे। राहुल जी एकाएक सी पी एम कालिज के सामने लगे पीपल के एक पेड़ के सामने रुक गए। कुछ देर खड़े उसकी जड़ों की तरफ़ टकटकी लगाकर देखते रहे। व्यास जी ने पूछा ‘क्या देख रहे हैं राहुल जी’। वे बोले अभी बताता हूं। दूसरे आदमी से कहा आप ज़रा दो तीन रिक्शा वालों को बुला लें। किसी के पास बेलचा हो तो लेता आए। नहीं तो हाथों से ही काम चलाएंगे। तीन चार आदमी आ गए बेलचा भी आ गया। उन्होंने स्वयं बेलचे से धीरे धीरे मिट्टी हटाई। एक मूर्ति दिखाई पड़ी। थोड़ी मिट्टी और हटाई। फिर जिन आदमियों को बुलाया था उनसे कहा इसे धीरे धीरे हिलाकर निकालना शुरू करो। झटका न लगे। लगभग घंटे भर की मशक्कत के बाद लगभग डेढ़ दो फ़िट की किसी देवी की प्राचीन मुर्ति बाहर निकल आई। वहीं उसे धुलवाई। राहूल जी इस बीच चुप रहे। व्यास जी कह रहे थे कि शायद इसे मूर्तिचोर दबा गए। राहुल जी ने कहा ‘जब ज़मीन के अंदर से दबाव बनना शुरू होता है तो मिट्टी फूलने लगती है। धरती के अंदर दबी वस्तु ऊपर आने लगती है। यह मूर्ति दसवीं शताब्दी की मालूम पड़ती है।‘ बाद में उन्होंने व्यास जी के ज़रिए म्यूज़ियम में भिजवा दी।
‘ग्रोशर्स आई’ पढ़कर मुझे उपरोक्त घटना का ध्यान आ गया। राजस्थान के ओम प्रकाश शर्मा उर्फ कुक्की बूंदी में पड़चूनिए की दुकान करते हैं। हड़ौती क्षेत्र में दबी कलाकृतियों को उन्होंने निकाला है। हालांकि वे आठवी क्लास तक पढ़े हैं लेकिन उनकी नज़र कलाकृतियों को उसी तरह पहचानते हैं जैसे राहुल जी की नज़र ने ज़मीन में दबी मूर्ति को पहचान लिया था। कुक्की ने हड़ौती की मिट्टी में दबी संस्कृति को उन कलाकृतियों के रूप में एक तरह से ईजाद किया है। सारी ज़िंदगी इसी काम में लगा दी। किसी लालच में नहीं बल्कि कलाकृति और प्राचीन संस्कृति के प्यार में । अगर कुक्की चाहते तो वे भी अनेक स्मग्लरों की तरह अपने परिवार को एक सम्मानजनक जीवन दे सकते थे। विंध्याचल पर्वत श्रेणी में नमना स्थान में उन्होंने हरप्पापूर्व संस्कृति की तांबे और पत्थर की कलाकृतियों का भंडार खोजा है। प्राचीन राक पेंटिंग्स उनके संग्रह में हैं।
ओम प्रकाश शर्मा उर्फ कुक्की मानते हैं कि मैं जानता था कि कि बूंदी प्राचीन सभ्यता की कलाकृतियों से भरा पड़ा है। मेरा मानना है कि गराडा नदी के किनारे 35 किलो मीटर लंबी पट्टी में सैंकड़ों चट्टानी गुफाएं है। इतनी लंबी आरकियोलाजिकल कलाकृतियां की पट्टी शायद ही दुनिया में कहीं हो। उनके पास 400 बी सी का सबसे पुराना सिक्का है। हालांकि वह समान्य पढ़ा लिखा है लेकिन उसने सब आर्कीयोलियोजिकल उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया है, जहां जहां इस क्षेत्र में दुनिया में काम हुआ है, उसका इल्म है। उस व्यक्ति को इस बात का दुख है उसका काम दुनिया में किसी से कम नहीं। पश्चिम देशों में इस क्षेत्र में काम करने वाले तत्काल प्रशंसा प्राप्त कर लेते हैं। मैं दो दशक से अपने परिश्रम की स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
राहुल जी ने भी शिक्षा की दृष्टि से बड़ी बड़ी डिग्रियां प्राप्त नहीं थे। लेकिन उन्होंने गुना था। उसी ने उन्हें अनेक विषयों का उद्भट विद्वान बनाया। कुक्की में समर्पण है। अपने काम के प्रति लगाव है। इस तरह के बहुत से लोग मुफ्फ़सिल जगहों मे अभी भी मिल जाएंगे जिनके पास प्राचीन कलाकृतियां हैं लेकिन वे सरकार और पुलिस के डर के मारे निकालने में डरते हैं। दरअसल लोगों की नियमों के प्रति अनभिज्ञता भी इसका कारण है। बहुत से लोगों को वे लोकेशन्स मालूम हैं जहां प्राचीन कलाकृतियां दबी पड़ी हैं। वे दो कारणों से नहीं बताते 1. स्थानीयता का मोह, 2. पुलिस का भय। कुछ साल पहले कानपुर में नीव खुदाई के समय ज़मीन से काफ़ी सोने के सिक्के निकले थे वहां लूट मच गई थी। बाद में पुलिस ने बरामदी भी की, पर सब नहीं कर पाई। प्रसिद्ध कवि स्व. डा. जगदीश गुप्त हरदोई के शायद बिलग्राम के पास किसी गांव के रहने वाले थे। उनको तांबे के बने हथियार टेराकेटाज़ भांडे आदि प्राचीन कलाकृतियों का ज़खीरा मिल गया था। उस ज़माने में विभिन्न संग्राहलयों में महीने में एक बार बाज़ार लगता था। उसमें कलक्टर्स अपनी अपनी कलाकृतियों के साथ एकत्रित होते थे संग्राहालय उन कलाकृतियों को अच्छे दामों पर खरीदते थे। जगदीश जी ने नागवासुकी पर पहला मकान बनवाया तब बताया था धरती का पैसा धरती मे लगा दिया। लेकिन शायद बूंदी के इस अमच्योर आरक्योलिजिस्ट को इस बात का इंतज़ार है कि उसके काम को अंतर्राष्ट्रीय एकेडेमिक दुनिया में स्वीकृति मिले। कम से कम भारत सरकार तो उसके काम का संज्ञान ले। अफ़सरान कलाविद् बनकर देश विदेश का दौरे करते हैं और उस अल्प ज्ञान के आधार पर विशिष्टता प्राप्त करते हैं।
हमारा देश प्राचीन देश है। अनेक संस्कृतियां पली बढ़ी हैं। उनका इतिहास सदियों में फैला हुआ है। हर संस्कृति के साथ कला, संस्कृति और भाषा का विकास जुड़ा होता है। क्योंकि उसका रिकार्ड सुरक्षित नहीं रखा गया इसलिए सब काम अंदाज़ और प्रयोगशालाओं से चलता है। बीच बीच में अनेक दैवी संकट आए गए उसका नतीजा हुआ कि वे सब कला व संस्कृति के प्रतीक या चिन्ह पृथ्वी ने अपने गर्भ मे सुरक्षित कर लिए। पृथ्वी आसानी से नहीं देती। उसके लिए पहचान, ज्ञान और साधना ज़रूरी है। कुक्की में ज़रूर ये बाते हैं। लेकिन सामान्य आदमी इन गुणों से संपन्न नहीं होता। वह इस तरह की घटनाओं को इतिहास से जोड़कर नहीं देखता। शायद उसे पता भी न हो कि इतिहास क्या है और उसका महत्व क्या है। ज़मीन से निकली मूर्तियां धर्म के खाते में चल जाती हैं। वस्तुएं बाज़ार के घाट उतर जाती हैं। सिक्के आदि लूट में शामिल होकर भट्टी की भेट चढ़ जाते हैं। इसके लिए किसी को दोष देना उचित नहीं। यह हमारी अल्पज्ञता है। कानपुर में जो सोने के सिक्कों की लूट मची थी उनमें जो बरामद नहीं हुए वे बिक गए होंगे और हो सकता है गला दिए गए हों। ऐसा करने वालों को यह पता नहीं कि उन्होंने देश का कितना नुकसान कर दिया। मुझे स्मरण है कि कई वर्ष पूर्व एक आई ए एस अफसर पर चार्ज लगा था कि कुछ प्रचीन मूर्तियां अपनी कार में रखवाकर रफ़ुचक्कर हो गए थे। मेरे कहने का मतलब है कि पढ़े लिखे और जानकार लोग भी इस लालच से अपने को बचा नहीं पाते। एन्टीक्स एकत्रित करना फ़ैशान भी है सम्मान सूचक भी है। लेकिन यह भी ज़रूरी है कि इस बात का ध्यान रखें कि अपने इस शौक से हम देश के इतिहास को तो नुकसान नहीं पहुंच रहे हैं। पृथ्वी हमारे बहुत से ऐसे रहस्यों को बचाए और छिपाए हुए है जो हमारे बारे में अनेक ऐसी सूचनाएं दे सकती है जिसे जानकर हम अपना और बीते समय का मूल्यांकन कर सकते हैं और अपने जड़ों का पता लगा सकते हैं। अनेक ऐसे टीले और ढूह पड़े हैं, पहाड़ों में गुफाएं हैं जो हमें हमारी जडों का पता ही नहीं बतातीं बल्कि हमारा सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास भी बताती हैं। आज जनजातियां हाशिए पर हैं। उनके अधिकारों पर आधुनिकता ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया है अमेरिका में रेड इंडिन्स के साथ भी ऐसा ही हुआ और आज तीसरी दुनिया के देश भी इस बीमारी के शिकार हैं। ये गुफाएं जहां भित्ति चित्र हज़ारों साल पहले उकेरे गए थे आज हमारे कला वैशिष्ठ्य के प्रमाण बन कर सामने आते हैं। हम उनकी कला पारंगतता के श्रेय लेने से नहीं चूकते। यह सवाल हमेशा परेशान करता है हम उनके जंगल, उनकी गुफाएं सब लिए ले रहे हैं उन्हें दे क्या रहे हैं। जब तक कला मानकों पर मनु्ष्य को तोलना नहीं सीखेंगे सभ्य होने पर गर्व नहीं कर सकते। प्रकाश शर्मा उर्फ कुक्की के बारे में पढ़कर मुझे लगा कि तथाकथित सभ्य कहलाने वाला समाज कुक्की जैसे कलाविदों को सम्मान नहीं देता तो जनजातियों के उन कला साधकों को क्या सम्मान देंगे जो इतनी समृद्ध कला परंपरा बिना नाम गाम के छोड़ गए।

4 comments:

Arvind Mishra said...

इन प्रतिभाओं का भला किसे ख्याल है अब अपनी पानी गोट ज़माने में लगे हैं !

cmpershad said...

काश! ओम प्रकाश शर्मा कहीं पाश्चात्य देश में होते! क्या अब भी कोई रास्ता है कि सरकार और आर्कियोलोजिकल सोसाइटी आफ़ इंडिया जाग जाए और ऐसे स्थानों का परिक्षण करें।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

प्रतिभाओं का समुचित नियोजन वर्तमान व्यवस्था के लिए दूर की कौड़ी है...
इसलिए यह ही वाज़िब है जो आप कर रहे हैं इस आलेख के जरिए...

anup said...

आपने बड़ी अच्‍छी जानकारी उपलब्‍ध कराई है. और ऐसे लोगों के प्रति व्‍याप्‍त उदासीनता तकलीफदेह है. पता नहीं हम ऐसे लोगों की कद्र करना कब सीखेंगे.