Thursday, 21 January, 2010

राजनीति की गति जानी न जाए

राजनीति में कुछ लोग अब दो वजह से आते हैं एक, अधिकाधिक सत्ता और पद लाभ उठाने दूसरे अपने अंदर जमा गंदी निसारने। कभी राजनीति सेवा और बलिदान का माध्यम थी। लेकिन अब अरबपतियों की मंडी है। अपने रसूखों से वे पार्टियों को बनाने बिगाड़ने का काम करते हैं। सपा इसका ताज़ा उदाहारण है। मुलायम सिंह कभी जननेता थे। उनके बारे सामान्य मान्यता थी कि वे गरीब के दोस्त हैं, किसान के रहनुमा हैं। मैंने उन्हें बस की छत पर खड़े होकर गांव गांव किसानों से संवाद करते देखा था। तब वे चौ. चरण सिंह के साथ थे। साहित्यकारों के प्रति भी उनका दोस्ताना रुख था। जब मैं पहला गिरमिटिया पर काम कर रहा था तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका जाने के लिए 75 हज़ार रू.की राशि दी थी। अगर उस समय मदद न मिली होती तो शायद मेरे लिए जाना संभव न हो पाता। लेकिन बाद में उनका नेतृत्व हाई फ़ाई नेतृत्व हो गया। उनके लोग वे लोग हो गए जो सबके नहीं कुछ के हैं। जनेश्वर जी जैसे नेता जो समाजवाद के स्तंभ और लोहिया जी के दाहिने हाथ थे हाशिए पर हो गए। समाजवाद मात्र राजनीति करने का मंच नहीं है। जन सेवा और इबादत है। गांधी और लोहिया ने राजनीति को इसी नज़रिए से देखा था। न ही वह धन अर्जित करने और उच्च श्रेणी के लोगों धन्नासेठों को और लाभ पहुंचाने का माध्यम है। नए समाजवाद में यही सब प्रमुख हो गए। मुझे लगता है समाजवादी दृष्टि की कमी ही इसका कारण रहा होगा। यही बसपा के साथ हुआ। वहां भी अंबेडकर जी और कांशीराम का कोई प्रतिबिंब नज़र नही आता। मेरा डा. अंबेडकर से कोई न संपर्क रहा न परिचय। अलबत्ता कांशीराम जी से ज़रूर एक से अधिक बार मिलने का अवसर मिला। वे रफ़ीअहमद मार्ग पर पटेल हाऊस में एक कमरे में रहते थे। तब उनका संबंध बामसेफ़ से था। उनके पास एक पेंट और बुशर्ट रहती थी। शायद दो लुंगी। पेंट बुशर्ट धोकर डाल देते थे और लुंगी पहनकर सो जाते थे। कहीं जाना होता था न कार की दरकार होती थी और न हवाई जहाज़ की, दुपहिए पर पीछे बैठकर चल देते थे। लेकिन उनकी उत्तराधिकारी सौ सौ कारों के काफले में चलती हैं। धन तो सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बड़े लोगों वाली असुरक्षा उनमें भी है। ताम झाम का तो कहना ही क्या। एक बार मैंने दिल्ली में अंबेडकर जी को पटेल जी के बंगले से निकलकर अपने बंगले पैदल जाते देखा था,बस।
यह बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं कि समाजवाद का जो रूप सामने आ रहा है वह चकित करने वाला है। शायद समाजवाद को समझना अब और भी मुश्किल हो गया। आचार्य नरेंन्द्रदेव अद्वितिय विद्वान थे। लेकिन उन्होंने धन की तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखा। उनकी अंत्येष्टि का प्रबंध जहां तक मुझे मालूम है उनके मित्र और साथी चंद्रभानु गुप्त ने किया था। चंद्रभानु गुप्त की मृत्यु हुई उनके बैंक में चंद हज़ार रुपए थे। जिसका बटवारा अपनी वसियत में कर गए थे। बाक़ी जो कुछ था कार तक ,मोती लाल नेहरू ट्रस्ट के नाम कर दिया था। उन्हें पूंजीपतियों का आदमी कहा जाता था लेकिन उन्होंने कभी किसानों से ज़मीनें छीनकर उन्हें नहीं दी। अलबत्ता शिक्षा के काम के लिए ज़मीन घेरी। किसान को पूरा मुआवज़ा दिया पर 1400 एकड़ ज़मीन एक रुपए में आई आई टी कानपुर को दे दी। टाटा और अंबानी को पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश सरकार ने जिस तरह दी, जितनी हायतोबा हुई उसका ज़िक्र करना बेकार है। मुलायम सिंह जैसे गरीब परस्त नेता अपने महामंत्री के दबाव में अपने विवेक का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए। सपा के पूर्व महामंत्री कहते हैं कि अब मैं मुलायमवादी की जगह, समाजवादी नेता जनेश्वर जी की राय मान कर समाजवादी बनूंगी। समाजवादी क्या किसी की राय मानकर या अनुयाई बनकर बन जा सकता है। यह अंदर की चिंगारी है जो समाजवादी बना देती है। सरवेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी है लड़ाई है जो इंसान की ज़िंदगी में होने वाले सतत् संघर्ष को चित्रित करती है। लहू लुहान आदमी डा. लोहिया हैं और कोई नहीं। अब मेरे सामने कुछ सवाल हैं। अमिताभ बच्चन और उनका पूरा परिवार कहां जाएगा? बच्चन परिवार के सदस्यों को कला और संस्कृति के समस्त पुरस्कारों से लाद दिया गया था। महामंत्री जो साथ जीने की कसम खाते रहे थे अब कहा हैं। रामपुर से सपा की सीट से जीती तारिका जयाप्रदा सपा के पूर्व महमंत्री के बराबर में खड़ी नज़र आईं। छोटी सरकार अनिल अंबवानी का पता चल जाएगा, अंदाज़ तो है, वे कहां जाएंगे। सबसे बड़ी बात तो संजय दत्त की है। फिल्म से उठाया और महासचिव बना दिया। इतना विवेक तो बनाने वालो में होना चाहिए कि समाजवाद तमग़ा नहीं है सेवा और समर्पण है। उनके पिता ने शांति यात्रा निकाल कर आतंकवाद का विरोध किया था। वे ही सबसे पहले कूदकर भागे। आए भी वो गए भी वो, खत्म फसाना हो गया। समाजवाद क्या ऐसा ही होता है। समाजवादी क्या अपने साथियों की सहायता करके उसको इस तरह गाते हैं जिस तरह पूर्व महा सचिव अमर सिहं उसका महानाद कर रहे हैं। ख़ासतौर से समाजवाद के प्रति समर्पित नेता जनेश्वर जी के संदर्भ में। उनकी बीमारी में उन्होंने पैसा दिया। मैं जानता हूं उत्तर प्रदेश में ऐसे कई नेता हुए जो मदद करते थे पर ज़बान पर नहीं लाते थे।
चंद्रभानु गुप्त तो राजनारायण जैसे बड़े नेताओं तक की सहायता करते थे। जब कांग्रेस टूटी और उनके साथ रहे मंत्री दूसरी कांग्रेस में चले गए तब भी वे उनकी मदद करते रहे। किदवई साहब के घर से तो शायद कोई खाली लौटता हो। गुप्ता जी के बारे में तो लखनऊ में, जिन्हें न दे मौला उसे दे आसफ़ुद्दौला के वज़न पर एक कहावत चलती थी जिसे न दे मौला उसे दे सी बी गुप्ता। जनेश्वर जी को मैं 1960 के पहले से जानता हूं । वे इलाहाबाद का चक्कर पैदल लगाते थे। सरकार में रहते हुए भी वे निर्मल छवि वाले रहे। लोहिया और समाजवाद यही दो ध्यये थे। मुझे नहीं मालूम उन्होंने ऐसी कितनी मदद कर दी कि टाइम्स आफ इंडिया के माध्यम से उदघोष करने की ज़रूरत पड़ गई।राजनीति हो या और दूसरे सेवा के क्षेत्र यह छिछोरापन ही माना जाएगा। शायद नेताओं को अपनी नेताई के संरक्षण की ज़रूर पड़ती है। खुदा ख़ैर करे।

Monday, 18 January, 2010

ज्योति बाबू चले गए।

(1914-2010)

ज्योति बाबू का निधन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से एक दुखद घटना है। सी पी एम में वे हरिकृष्ण सुरजीत के जाने के बाद अकेले कद्दारवर नेता बचे थे जिनके पास देश की बढ़ोत्तरी क ब्ल्यू प्रिंट था। वे समर्पित कम्यूनिस्ट होने के बावजूद समन्व्य की अनवार्यता को भी महत्त्व देते थे। ज़रूरत पड़ती थी कट्टरपन से ऊपर उठकर मानवीय पक्ष का समर्थन करने से पीछे नहीं हटते थे। यह ठीक है कि उन्होंने बंगाल का मुख्यमंत्री रहते हुए सी पी एम की नीतियों को धार दी। लेकिन नानकम्यूनिस्ट वर्ग के साथ अन्याय भी नहीं हुआ। पर वे संभवतः कम्यूनिस्ट कैडर की तरह स्वतंत्र नहीं था। कैडर का वर्चस्व रहता था। उन लोगों को लगता था कि वे कैडर की बात को ही महत्त्व देते थे। बंगाल की आर्थिक उन्नति उनके लिए सर्वोपरि थी। उसके लिए पूंजी निवेश के प्रति दुराग्रही नहीं थे। सबसे बड़ा काम उन्होंने ज़मीन के पुनर्प्रबंधन का किया जिसके कारण किसानों को लाभ पहुंचा। उसी के दम पर सी पी एम आज तक गद्दीनशीन है। पंचायतों का जनतंत्रीकरण उन्हीं के काल में हुआ। सांप्रदायिक सदभाव को मज़बूत किया। लेकिन आज जिस प्रकार की राजनीति सी पी एम नेतृत्व कर रहा है वह ज्योतिबाबू की राजनीति से काफ़ी भिन्न है। यह ठीक है कि कम्युनिस्ट पार्टीज़ की नीति उनका पालितब्यूरो नियोजित करता है। लेकिन उनका व्यक्तित्व इस तरह का था कि पालितब्यूरो भी नीति निर्धारण के समय उनके दृष्टिकोण की कदर करने के लिए बाध्य हो जाता था। देश और उनके साथ पालितब्यूरो ने उस समय खुला अन्याय किया था जब सब पार्टीज़ उनके प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थी लेकिन तत्कालीन पार्टी सचिव या कहिए पालितब्यूरो तैयार नहीं हुआ था। सारा देश सकते में आ गया था। उनके स्थान पर एक अनुभवहीन व्यक्ति के नाम छींका छूट गया था। आज भी लोग उस क्षण को कोसते हैं कि अगर ज्योति बाबू प्रधानमंत्री हो जाते देश का इतिहास ही अलग होता।
दरअसल कम्यनिस्ट पार्टी कई बार एक ऐसे बच्चे के तरह व्यवहार करतीं हैं कि सिद्धान्त के नाम पर वे अपनी पसंद नापसंद को धीरे से क्रियान्वित करके सुर्ख़ रूह बन जाती हैं। बाद में सोचती हैं कि यह गलत हुआ पर स्वीकार नहीं करतीं। यही पिछले दिनों स्पीकर के सवाल पर यही हुआ। मुखर्जी साहब को पार्टी से निकाल दिया गया सिर्फ इसलिए सब जनतंत्रों में प्रचलित परंपरा के तहत उन्होंने कहा था कि स्पीकर किसी पार्टी का सदस्य नहीं रहता। इसलिए पार्टी के संयुक्त मंच से हट जाने पर स्पीकर का त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं। जब ज्योति बाबू को प्रधानमंत्री बनने देना सिद्धान्त विरुद्ध था तो स्पीकर बनने देना कैसे सिद्धांत के अंतरर्गत आ गया। सिद्धांत क्या शक्ल बदलने के साथ बदल जाते हैं। ज्योति बाबू का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए तो लाभकर था ही पार्टी का भी कम लाभ नहीं होता। दरअसल मुखर्जी साहब वरिष्ठतम व्यक्ति थे। योग्य भी। उनके पार्टी में बने रहने से हो सकता है कि वर्तमान पार्टी नेतृत्व को खतरा हो जाता। ज्योति बाबू एक वरिष्ठ सदस्य को इस तरह अपमानित करने के पक्ष में नहीं थे। मुखर्जी ने ठीक ही कहा मुझे लगा कि मेरे पिता की दूसरी बार मृत्यु हुई।
ज्योति बसु का चला जाना देश की राजनीति से एक अनुशासित, दूरअंदेश, संतुलित और दानिशमंद आदमी का चला जाना है। साहित्य जगत में भी उनकी अनुपस्थिति अनुभव की जाएगी।

Wednesday, 13 January, 2010

साहित्य अकादमी की स्वायत्तता?

देश हो या संस्था उसकी स्वायत्तता को खतरा अंदर के लोगों से होता है। या कहिए उन हां-बरदार मित्रों से होता है जो संस्था-हित से अधिक अपने स्वार्थों को ‘चिड़िया की आंख’ की तरह ताकते रहने की कुव्वत पैदा कर लेते हैं। मित्र मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि संस्था का हित चाहने वाला सदा सत्ताधारियों की नज़र में अमित्र और शत्रु ही समझा जाता है। मुझे साहित्य अकादमी में पिछले सत्र में काम करने का मौक़ा मिला था। कुछ समय तक अध्यक्ष और मेरे बीच अच्छे संबंध रहे। हालांकि वामपंथी लाबी उनके ख़िलाफ़ थी। मुझे सलाह भी दी गई कि मैं जीत गया हूं अब त्यागपत्र देकर शहीद बन जाऊं। लेकिन मैं कोशिश करता हूं कि संकटों के बावजूद मैं अपना दायित्व अंत तक निभाऊं। वही मैंने यहां भी किया। यह समस्या मेरे सामने आई आई टी कानपुर में कुलसचिव रहते हुए भी तत्कालीन निदेशक के साथ गहरे मतभेद हो जाने के वक्त भी आई थी। वे कहते थे Administration is a bulldozer. उस समय बोर्ड के चेयरमेन प्रसिद्ध उद्योगपति स्व. ललित मोहन थापर ने थापर हाउस में बुलाकर मेरे सामने नियुक्तिपत्र फेंक कर कहा था तुम एक ईमानदार आदमी हूं तुम्हारी वक़त सरकारी संस्था नहीं कर सकती इसलिए उठाओ नियुक्ति पत्र त्याग पत्र देकर मेरे यहां आ जाओ। जितना वहां पाते हो उससे दुगना मिलेगा। मैंने क्षमा मांगी तो उनकी नज़र बदल गई। आंखे तरेर कर कहा देखता हूं कैसे नौकरी करते हो। वहां बैठे अपने ही बीच के लोग शह दे रहे थे इतना बड़ी बिज़नेस टाइकून तुम्हें स्वयं बुला रहा है। तुम बदकिस्मत हो जो ठुकरा रहे हो। यहां तक कि तत्कालीन शिक्षामंत्री शीला कौल ने समझाया था रिज़ाइन करदो इतने योग्य आदमी हो कोई बड़ी जगह तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। मैंने धीरे से कहा योग्य आदमी की तो हर जग ज़रूरत होती है, आप तो मंत्री हैं आपसे मैं न्याय की उम्मीद करता था। त्यागपत्र देना तो कायरता होगी। वे उठकर चली गईं थीं। उधर जब मैं थापर साहब को मनाकर के लौटा तो संभावना के अनुरूप मुझे अगले दिन निलंबन पत्र थमा दिया गया था। खैर, ओखली, सिर और मूसल का गहरा रिश्ता है। न ओखली को डरना चाहिए न सिर को, मूसल डरेगा तो सिर को कूटेगा कैसे, कहावत कैसे चरितार्थ होगी। यही अकादमी के दौराना हुआ। साल भर बाद ही पूर्व अध्यक्ष की मनमाने निर्णयों और भाषा संबंधी भेदभाव के कारण मेरे संबंध तनावपूर्ण होते गए। जब उन्होंने दोबरा चुनाव लड़कर सचिव और बी जे पी नेताओं से मिलकर अध्यक्ष बनने का मैनुप्लेशन चालू किया तो मैंने बोर्ड में विरोध किया। उन्होंने मेरा प्रस्ताव तक रिकार्ड पर नहीं रखे। उसके और भी बहुत से कारण थे जो बाद में मौक़ा मिला तो लिखूंगा। पहले दिन जनरल काउंसिल की बैठक थी। उसमें पहली बार बी जे पी और आर एस एस समर्थकों का बहुमत था। उसमें उनके ही लोग चुने गए थे। उनका जीतना तय था। मैंने तय कर लिया मैं आखरी दम तक विरोध करूंगा। मैंने किसी तरह उच्चतम सर्किल में सब कागाज़त भिजवाए, उसक नतीजा हुआ कि उन्हें बुलाकर हिंदी में समझा दिया गया कि आप अपनी उम्मीदवारी वापिस ले लें, वरना आप जानें। अगले दिन बोर्ड की मीटिंग में उन्होंने सबसे पहले अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली। मैंने उनके खिलाफ़ एक प्रस्ताव अपने तीन मित्रों से समर्थन करने की सहमति लेकर प्रस्तुत किया लेकिन वक्त पर वे चुप रहे। सत्ता का दबदबा हिंसक जानवर की दहाड़ की तरह बाद में भी गूंजता रहता है। अध्यक्ष महोदय आरंभ में ही विड्राल की घोषणा कर चुके थे। स्वाभाविक है मेरा प्रस्ताव अन नोटिस्ड चला गया।
लेकिन उस समय कि तानाशाही से अधिक खतरनाक बात अब सामने आ रही है। सामसुंग मल्टीनेशन कंपनी के साथ समझौता हुआ है कि अकादमी 24 भाषाओं में सामसुंग की तरफ़ से भी रवीन्द्र पुरस्कार देगी। सुना है विदेश मंत्रालय के कहने पर अकादमी ने यह निर्णय लिया है। सवाल है कि क्या बोर्ड या जनरल काउंसिल की बाध्यता है कि सरकार का ऐसा प्रस्ताव माने जो उस संस्था की मूल भावना व प्रकृति के विपरीत हो? इस समय साहित्य अकादमी का पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक सम्मानित माना जाता है। किसी भी देश की अकादमी आफ लेटर्स द्वारा दिया जाना वाला सम्मान संसार भर में सम्मान से देखा जाता है। सामसुंग सम्मान की क्या स्थिति होगी? सामसुंग पुरस्कार एक मल्टीनेशल कंपनी द्वारा दिया जाने वाला प्राइवेट पुरस्कार होगा। उस पर ठप्पा साहित्य अकादेमी का लगवाकर उसे अंतर्राष्ट्रीय वेलिडिटी दिलाने की चाल मात्र लगती है। विश्व की साहित्यिक सस्थाओं के बीच आदान प्रदन का तो कोई अर्थ हो सकता है लेकिन मल्टिनेशनल कंपनी का सीधा सा उद्देश्य है इस बात का विज्ञापन कि हम तुम्हारे साहित्य का प्रचार कर रहे हैं, कल दूसरी कंपनियां यही करने को कहेंगी। साहित्य अकादेमी की देखा देखी हिंदी अकादेमी या दूसरी संस्थाएं भी इस होड़ में पड़ सकती हैं। एक और खतरा है हमारे देश में विदेशी वस्तु ज़्यादा चलती है। कल हो सकता है इस बात पर असंतोष या विवाद हो कि हमें सामसुंग सम्मान की जगह साहित्य अकादेमी पुरस्कार देकर अपमानित किया गया। हो सकता है कल सामसुंग अपने इन विजेताओं को अपने देश में काम के लिए या घूमने के लिए आमंत्रित करे तब और सिर फुटव्वल होगा। आखिर बैठे बैठाए साहित्य अकादेमी यह ख़तरा क्यों मोल ले रही है। एक व्यवसायिक मल्टीनेशनल के साहित्यिक मूल्य क्या हो सकते हैं सिवाय इसके अपने व्यवसाय में किसी सम्मानित संस्था का कैसे बाज़ारीय उपयोग किया जा सकता है। एक बार इस तरह की सम्मानित संस्था अगर किसी व्यावसायिक कंपनी के प्रचार का माध्यम बनी फिर उसकी स्वायत्तता और प्रतिष्ठा कानपुर की गंगा की धारा की तरह हो जाती है जिसमें हज़ारों टन टेनरीज़ के क्रोमियम आदि मिश्रित ज़हरीले नाले गिरकर उसकी तासीर और शक्ल बदल देते हें। अलबत्ता नाम तो गंगा ही रहता है पर आदमी आचमन करता भी डरता है। यह भी एक दृष्टिकोण है कि भाषाई लेखक कब तक कड़की में जीता रहेगा। उससे बचने के अनेक तरीके हैं। सामसुंग भी अपने पैसे से नोबेल न्यास की तरह अपनी संस्था विश्व भर की भाषाओं के लिए आरंभ कर सकता है। लेकिन एक कहावत है कि जब दूध खरीदे मिल जाए तो भैंस कौन बांधे।
अकादेमी के सचिव ने मुझे पत्र लिखकर इस वर्ष के वार्षिक उत्सव में डा. लोहिया पर आयोजित किए जाने वाले राष्ट्रीय सेमिनार में आमंत्रित किया है। जब सामसुंग को सरपरस्ती दे रहे हैं तो डा लोहिया जैसे अपना काते अपना पहनो वाले ज़मीनी चिंतक पर सेमिनार करने की क्या तुक है। जब मैंने लोहेया जी पर आलेख लिखवाने के प्रसेताव रखा था तो कर्क दिया गया था अगर उन पर लिखवाया गया तो अन्य राजनीतिज्ञों की ओर से भी दबाव पड़ेगा। मैंने ईमेल द्वारा लिखा है कि समाचार पत्रों में पढ़ा है कि अकादमी अपनी स्वायत्तता मल्टीनेशनल कंपनी को बेच रही है क्या सही है। मेरा लोहिया जी से संबंध रहा है इसलिए मैं एक दिन को आ सकता हूं। कोई जवाब नहीं आयी। बाद में फोन आया कि आप एक दिन को ही आइए। मुझे कहना पड़ा पत्र का जवाब मिलने पर निश्चित करूंगा। देश का पानी बिक गया, जंगल बिक रहे हैं, हर चीज़ आन सेल है। क्या साहित्य अकादमी जैसी संवेदनलशील संस्था जो एक ऐसे छतनार दरख्त की तरह है जिस पर देश की 24 भाषाओं के घोसले हैं, उस पर भी मल्टीनेशनल का नाग सरसराता हुआ आकर घोसला बना लेगा? और एक एक करके उन भाषाओं की रचनात्मक स्वायत्तता को चट कर जाएगा जो अपनी रचनात्मकता को निर्विघ्न जी रही हैं। राजनीतिज्ञ और नौकरशाही इस संवेदनशीलता को क्या समझें पर इतने लेखक, बड़े और छोटे, जो वहां बैठे हैं, और स्वायत्तता के कस्टोडियन हैं, वे भी क्या उतने ही असंवेदनशील हो गए हैं? यह सवाल आज सामने नहीं लेकिन जब अन्य कंपनियों का दबाव बढ़ेगा तो पता नहीं भारतीय लेखको का क्या होगा। लाजवंती को बच्चा छुए या बड़ा हर हालत में मुर्झाती है। उसको माली हो या अकादेमी जैसी संस्थाएं उन्हें वातावरण और धरती के अनुसार ध्यान रखना पड़ता है। ज़्यादा केमिकल्स का विपरीत असर हो सकता है। बल्कि होता है।
देसी रंग
हमारे भाषाई बुद्धिजीवी जिनकी बाज़ारवाद में पैठ है उन्हें केवल विदेश में ही रंग नज़र आते हैं। हमारे देश में तो हर मौसम को अलग अलग रंग सजाते हैं। पलाश जैसे गाढ़े रंग भी है, अमलतास जैसे पीले रंग पत्तों तक को अपने रंग से रंग देते हैं, कचनार के विभिन्न रंग सफेद, बैंजनी, फ़िरोज़ी जब खिलते हैं तो लगता है रंग भरी थाली बिखेर दी गई है। गर्मी में धूप की चुभन को अमलतास के रंग ऐसे राहत देते हैं जैसे आंखों में गुलाबजल डाल दिया गया हो। अमरबेल तक अपनी चुनरी रंग लेती है। चमेली, जूही, गदराया मोगरा, चांदनी सब सफ़ेद होते