Wednesday 2 December 2009

दिल्ली में 19 नवबर 09

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 ज़िलों के गन्ना किसानों का अद्भुत जमावाड़ा था। किसान एकता का यह प्रशंसनीय उदाहारण है। किसान एक होकर अगर खड़े हो गए होते तो जिस प्रकार ज़मीनों का अधिग्रहण होता रहा है वह नहीं होता। न ही रसूमों के ख़रीद फरोख्त के दामों में मनमानी होती। जैसे सरकारी नौकरों का डीए बढ़ाने का फ़ारमूला बना हुआ है उसी प्रकार फ़सलों की रसूमों का बाज़ार भाव के हिसाब से इनडेक्स फ़ारमूला भी निर्धारित होना चाहिए। उसी हिसाब से फ़सल के आने से पहले हर फसल के खरीद के दाम घोषित हो जाने चाहिएं। किसानों को भी मालूम रहे कि अमुक फ़ारमूले से रसूम के दाम निर्धारित होंगें। मैथमैटिकल समाधान सरकार के हित में भी होगा और किसान के हित में भी। अनिश्चितता की गुंजायश कम से कम होना दोनों के लिए ही लाभकारी होगा। सरकार को यह मालूम होना चाहिए कि किस रसूम की कितनी खपत संदर्भित वर्ष में संभावित है। उसी के अनुरूप बुवाई से पहले संभावनाएं घोषित कर दी जाएं तो किसान अपनी रसूम की पैदावार उसी के अनुसार नियोजित कर सकते हैं। किसान की अपनी अस्मिता है। ज़मीन पहले गरिमा और सम्मान की बात होती थी अब व्यवसाय का माध्यम हो गई। जिस प्रकार औद्योगिकरण के लिए ज़मीन की खरीद फ़रोख्त का सिलसिला शुरू हो चुका है वह यह संकेत करता है कि किसान के लिए भी ज़मीन करेंसी या बाज़ार में बेची खरीदी जाने वाली वस्तु में बदल गई है। ऐसा क्यों हुआ? शायद इसलिए कि हर व्यक्ति की तरह किसान के मूल्य बदल गए हैं। ज़मीन उसके लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ज्ञान को पैकेजों में बदलने की तरह अधिक से अधिक धन में बदलने का माध्यम रह गई है। नई पीढ़ी ख़ासतौर से यह मानने लगी है कि जमीन या किसानी स्टेटस सिंबल न होकर, व्यवसाय या सरकारी नौकरी अधिक सम्मानजनक है। ज़मीन के साथ उसका कोई भावनात्मक संबंध भी नहीं रह गया। प्रेमचंद ने गोदान और अन्य रचनाओं में जैसे पंचपरमेश्वर और भूलिप्सा जैसी कहानियों में गऊ और ज़मीन के प्रति किसानों की जिस भावनात्मकता का दिग्दर्शन कराया है वह अब बीते दिनों की चीज़ हो गई। अब गोदान के गोबर ही बचे हैं जो शहरों में जाकर बसना चाहते हैं या बस गए हैं। होरी विरल हैं। गुड़गांव और नोयडा आदि नगरों में जिस प्रकार बड़े किसानों ने ज़मीन बेच बेचकर ऐशो अशरत की ज़िंदगी बनाई है वह इस बात का प्रमाण है कि ज़मीन उनके लिए भावनात्मक या सम्मान की वस्तु नहीं रह गई। ज़मीन के मुआवज़े को लेकर जिस प्रकार आंदोलन होते हैं उस तरह के आंदोलन ज़मीन के अधिग्रहण के विरुद्ध नहीं होते। लालगढ़ का पूरा जन विरोध टाटा द्वारा दिए जाने वाले अपर्याप्त मुआवज़े को लेकर शुरू हुआ था। बाद में राजनीतिक मुद्दा बन गया। गाज़ियाबाद में भी अनिल अम्बानी को सेज के लिए दी गई ज़मीन को लेकर जो विराध हुआ था वह भी आर्थिक अधिक था बनिस्बत सैंद्धांतिक सवाल के। उसी सवाल पर मुलायम सिंह की सरकार इस चुनाव में चली गई थी। यही क्राइसिस तीस साल पुरानी सी पी एम सरकार के सामने है। अगर बाज़ार भाव पर मुआवज़ा दिला दिया जाता तो किसान किसी की न सुनते। उन्हें ज़मीन देने में आपत्ति नहीं थी बशर्ते के दाम मनोनुकूल मिलते। मज़े की बात है कि पूंजीपति की लड़ाई सरकारों को लड़नी पड़ती है। सरकारें पूंजीपतियों के पाले में खड़ी नज़र आने लगती हैं। लेकिन बड़े किसान भी छोटे किसानों और मज़दूरों के साथ पूंजीपतियों वाला व्यवहार करते हैं। ज़मीन कब्ज़ाने से लेकर हिस्सा बांट और मज़दूरी तक में। किसानों के नेता इस दिशा में पूरी तरह निष्क्रिय रहते हैं। यह उसे किसानों का हक़ मानते हैं। यह परंपरा ज़मीदारी जाने के बाद भी इस देश के लोगों के ख़ून में हैं। जैसे देश में जो अमीर है वह अमीर होता जा रहा है और जो गरीब वह गरीब होता जा रहा है उसी तरह किसानी में भी है।
मुझे सन् तो याद नहीं, संभवतः आज़ादी के बाद छठे दशक में कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू जी ने सोवियत यूनियन की तरह कोपरेटिव फ़ार्मिंग लागू करने का प्रस्ताव रखा था। उसका विरोध मुख्यतः दो नेताओं ने किया था चंद्रभानु गुप्ता और चौ चरण सिंह ने। गुप्ता जी ने कहा था आपने गांव नहीं देखा, किसान जान दे देगा पर अपनी ज़मीन नहीं देगा। चौ साहब ने कहा था प्रधानमंत्री भले ही देश के लाभ की बातकर रहे हों पर वे नहीं जानते किसान धरती को अपनी मां समझता है मां से बच्चे को अलग करना क्या संभव है। तब राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनतंत्र था। प्रधानमंत्री का विरोध अनुशासनहीनता नहीं मानी जाती थी। गोविंदाचार्य जैसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री का मुखौटा कहने मात्र से पार्टी से निकाल दिया गया था। जसवंत सिंह को जिन्ना पर अपनी मान्यता स्पष्ट करने पर पार्टीबदर कर दिया गया जो मात्र एक साहित्यिक कार्य था। ये सवाल संदर्भ जन्य होने के कारण यहां आ गए। तब पार्टी ने नेहरू जी का साथ न देकर इन दोनों नेताओं का समर्थन किया था। लेकिन अब किसानों और धरती के बीच का यह रिश्ता लगभग न्यूनतम हो गया। बहुत कम किसान रह गए जो ज़मीन के साथ पूर्ववत रिश्ता बनाए हैं। वह उनका अंदरूनी रिश्ता भी हो सकता है और मजबूरी का रिश्ता भी। नई पीढ़ी या तो फसल के वक्त हिस्से की रसूम लेने गांव जाती है या अच्छे दाम मिलने पर उसे बेचने का डौल बैठाने। गांधी जी ने गांवों की तरफ़ लौटने की बात चाहे हिंद स्वराज के माध्यम से कही हो या अपने जीवन का गांवों की आमदनी गावों पर ख़र्च करने के फ़लसफ़े के आधार पर, दोनों बातें इसलिए कहीं थीं कि किसान गावों से विमुख होकर शहर की तरफ़ न भागें। वे जानते थे कि अगर ऐसा हुआ तो गांव शहरों के गर्भ में समा जाएंगे। उनका देशपालक का दर्जा ख़त्म हो जाएगा। आत्म निर्भर न रह कर शहरों पर निर्भर हो जाएंगे। होना तो यह चाहिए था कि किसान नगरों का संरक्षण करते। लेकिन गांधी का यह सपना तत्कालीन और संभावित प्रधानमंत्री ने गावों के सशक्तिकरण के उनके 1945 के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि जो गांव स्वयं सांस्कृतिक अंधकार में हैं वे देश को क्या समृद्ध करेंगे। मेरा इसमें कोई विश्वास नहीं। अगर नेतृत्व जन के विश्वास को इस तरह झिंझोड़ता रहेगा है तो वह भी इस स्टेज पर, जब जन अपने नए विश्वासों और आस्थाओं के निर्माण की आरंभिक प्रक्रिया में हो तो उसके विश्वास कभी मज़बूत आधार ग्रहण नहीं कर पाएंगे। गांधी ने गावों को देश की उस आर्थिक व्यवस्था को जो सदियों से इस देश का आधार रही थी और समय की कसौटी पर खरी उतरी थी अधिक आधुनिक तरह से पुनर्निर्मित करने का सपना देखा था। औद्योगिकरण से यह आगे की बात थी। जिसमें व्यक्ति से लेकर पूरे समाज में आत्म विश्वास प्रतिरोपित करने का दीर्घकालीन सपना निहित था। उस सपने के विरूद्ध नेहरू और देश के तत्लीन नेतृत्व ने स्पात की खेती करने की योजना को क्रियान्वित करने का बीड़ा तथाकथित प्रगतिशीलता और शैतानी आधुनिक सभ्यता के दबाव में उठाया। उसे खेती का पूरक न बनाकर मुख्य आर्थिक व्यवस्था का एंकर बनाया जिसमें देश को दूसरे देशों की विशेषज्ञता और संसाधनों पर निर्भर करना अनिवार्यता बन गई थी। जब अपने संसाधनों और विशेषज्ञता यानी एक्सपर्टाइज़ पर विश्वास खत्म होने लगता है तो एक तरह का भावनात्मक अलगाव भी विकसित होने लगता है जो नई पीढ़ी में नज़र आता है उसने अपनी पीढी दर पीढी से आज़माई हुई कृषि विशेषज्ञता से मुंह मोड़ लिया। उसी का नतीजा है कि खेती जो किसान के गहरे सरोकार और संवेदना का हिस्सा थी व्यवसाय मात्र रह गई। जब रिश्ता व्यवसायिकता पर निर्भर करने लगता है तो पारस्परिकता या बिलांगिगनेस अपने और अपनों से रह जाती हो तो उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है और समाज का सम्मान भी नहीं रहता। जब किसान का लगाव ज़मीन से नहीं रहेगा तो देश की उस संपत्ति से कैसे रह सकता है जिसे वह समझता है कि वह उसकी न होकर देश की है। जैसे देश उसका न हो। भले ही उसका धन , पसीना , और जीवन उसमें लगा हो। अगर ज़मीन से उसकी और उसके परिवार की रोटी न चलती होती तो वह भी उसके लिए देश की संपत्ति से अधिक कुछ न होती जिसे वह अपने आनंद के लिए जैसे चाहे तोड़ फोड़ सकता है। यह ठीक है कि सरकारें अगर जन की समस्याओं के प्रति असंवेदनशील हों तो जन अपनी ही संपत्ति को सरकार के आधीन होने के कारण समझाता है कि उसकी अपनी संपत्ति उसकी नहीं। उसका यह सोच तर्कसंगत नहीं क्योंकि दूसरों का बदला अपना घर और सामान तोड़ कर नहीं लिया जा सकता। यह हिंसा तो है ही तर्क विहिन नभी है। अपने भाइयों बच्चों की हत्या को कब तक न्यायोचित ठहराया जा सकता है।
अभी दिल्ली में किसान आन्दोलन के दौरान ऐसा ही कुछ देखने को मिला। जंतर मंतर में घुसकर जिस प्रकार हेरिटेज को नुकसान पहुंचाया तथा शराब पीकर बोतलें वहां फेंकी गईं इससे साफ़ पता लगता है भूमि को धारण करने वाले लोग ऐसी विशिष्ठ चीज़ों को नेस्तनाबूद करने से भी नहीं छोड़ते जो सदियों से उस ज़मीन की शोभा बढ़ा रही हैं जिसके वे रहबर हैं। ऐसा इस आंदोलन में पहली बार हुआ।
सवाल यह है कि हमारे किसान नेता उनको यह क्यों नहीं बता पाए कि यह संपत्ति भी हमारे लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी तुम्हारी अपनी काश्त की ज़मीन जिसकी डौल टूट जाने पर भी खून खराबे के लिए तैयार रहते हो। उस दिन एक चैनल पर इसी सवाल को लेकर हम लोग में परिचर्चा हो रही थी उसमें बड़े किसान नेता थे लेकिन किसी ने इस सवाल को नहीं उठाया। शायद इसलिए कि उससे उनके वोट बैंक पर असर पड़ेगा। क्या इस कारण हम बच्चों को एक अच्छा नागरिक भी नहीं बनाएंगे। यह कैसी राजनीति है। मैं जानता हूं यह हर आंदोलन का हश्र होता है। नेता उसे जन आक्रोश कहकर निश्चिन्त हो जाते हैं। जन आक्रोश कह देने मात्र से देश नहीं बचेगा। यह तोड़ फोड़ हिंसा भी है और देश की संपत्ति का संहार भी है। गर्म ख़ून का उपयोग अगर रचनात्मकता के काम में जोश भरने में हो तो शायद हम अघिक सुखी हो पाएं। कब तक तोड़ तोड़ कर बनाएंगें। चौरी चौरा में शांतिप्रिय आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने भारतीय सिपाहियों की हत्या कर दी थी। गांधी ने सफल होते आंदोलन को वापिस ले लिया था उसके लिए उन पर आरोप दर आरोप लगाए गए थे। वे इसिलिए नहीं झुके थे कि हर अहिंसात्मक आंदोलन की नियति हिंसा होगी। अब हमारे सामने आर्थिक लाभ मुख्य है, साधनों की पवित्रता गौण है । सत्यागृह और आंदोलन तो हमने ले लिया लेकिन उसकी निष्ठा और साधनों की पवित्रता को कलुषित कर दिया। हमारे देश का नेतृत्व चाहे वह किसी भी पार्टी का हो अपने क्षणिक और अस्थायी लाभों के लिए देश की अस्मिता और संवेदना का खुला सौदा अराजकता के साथ कर रहे हैं, देखिए इन हालात में देश कब तक सही सलामत रहता है।

Tuesday 10 November 2009

कहां है संविधान और कहां है जनतंत्र?

मैं संविधान और जनतंत्र की बात क्यों कर रहा हूं? फिर सोचता हूं सब ही कर रहे हैं तो मैं भी कर रहा हूं तो क्या गुनाह कर रहा हूं? जब संज्ञाएं और शब्द अर्थ खो देते हैं तो उनका कोई महत्त्व नहीं रहता। ऐसे में अर्थहीन शब्द बोलना गुनाह नहीं रहता। जब किसी भाषा का कोई महत्त्व नहीं रहता तो शब्दों का ही क्या मतलब रह जाता है। भाषा से भले ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी न बनें पर साहित्य, इतिहास, समाजविज्ञान के मूल में भाषा ही होती है। संविधान की भी भाषा ही है। उसमें सब भारतीय भाषाओं को समान माना। हिंदी और अंग्रेज़ी को संपर्क भाषाएं मान लिया गया। एक साज़िश की गई कि हिंदी राज भाषा बना दी गई। दोनों भाषाएं, एक विदेशी भाषा और वह भाषा जिसमें आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी एक नाव में सवार हो गई। हिंदी राजभाषा बनाकर दूसरी भाषाओं की आंख की किरकिरी बना दी गई। यह भाषाओं को बांटने की सोची समझी राजनीतिक साज़िश थी। उसका विकृत नतीजा 9 नवंबर 09 को महाराष्ट्र की विधान सभा में देखने को मिला। यह संविधान का सम्मान है या विधान सभा का या आदमियत का? अब इस सवाल को राजनीतिज्ञ ही सुलझाएंगे। इसे न बुद्धीजीवी सुलझा सकते हैं और न साधु संत और न विधिवेत्ता। जिन्होंने यह अवलेह घोटा है उन्हें ही चखना पड़ेगा। तीन क्या चार भाषाओं में शपथ ली गई। मराठी में, संस्कृत में, हिंदी में और अंग्रजी में। मराठी में तो ली जानी थी। एक तो मनसा के अध्यक्ष राज ठाकरे का तानाशाही हुक्मनामा, दूसरे राज्य की भाषा। हुक्म डराने वाला था कि मराठी में शपथ न लेने पर दंडित किया जाएगा। तुम कौन, जन प्रतिनिधियों के नाम संविधान विरोधी हुक्मनामा जारी करने वाले? आप अपील करते तो भी एक बात थी। ऐसा करना भी अधिकार के बाहर की बात थी। एक बाहरी आदमी का सदन के चुने गए सदस्यों को हुक्म जारी करना सदन और अध्यक्ष की अवमानना है। दुसरे संविधान में किसी भी भाषा में शपथ लेने की दी गई छूट और संवैधानिक अधिकार में ख़लअंदाज़ी है। यह नया तानाशाह पिछले सप्ताह भर से संविधान विरोधी आदेशों की बरसात कर रहा था लेकिन न तो सरकार ने इसका वरोध किया और न इस असंवैधिनक स्वयंभू तानाशाह के खिलाफ़ कानूनी कार्यवाही की गई। दो ही बातें हो सकती हैं या तो सरकार डरती है या फिर तरह दे रही थी। गैरकानूनी काम के खिलाफ़ तत्काल कार्यवाही न करना उसे वैधता देना है। अराजकता पैदा करना है। सपा के चुने हुए सदस्य अबु आज़मी का यह अधिकार था कि वह किसी भी भाषा में शपथ ले। उन्होंने इस अधिकार का उपयोग किया। वैसे भी अपने को लोहिया जी का अनुयायी मानने वाला व्यक्ति अपने नेता का भाषा वाले निर्देश का पालन उसी पकार कर रहा था जिस प्रकार मनसा के आततायी सदस्यों ने राज ठाकरे के निराधार और असंवैधानिक आदेश का पालन किया।
आप यानी ठाकरे परिवार हिंदी से क्यों नाराज़ है? राज ठाकरे तो ज़हर घोले बैठा है,हिंदी के खिलाफ़ भी और हिंदी वालों के खिलाफ़ भी। जबकि देवनागरी यानी लिपि को बहुत अच्छी तरह मराठी ने अपनाई है। शायद इसीलिए कि मराठी और हिंदी भाषियों की डोर दोनों को बांधे रहेगी। पराडकर जी ने हिंदी पत्रकारिता को परवान चढ़ाया। दरअसल हिंदी के समर्थक अहिंदी भाषी ही रहे, गांधी, तिलक, और स्वामी दयानंद से लेकर पराडकर जी तक। इस बार अंग्रेज़ी में शपथ ली गई तो मनसा के गुंडे कहूं या महान प्रदेश भक्त क्यों नहीं बोले, क्या वह मराठी की सगी थी? संस्कृत में ली गई। वह मराठी नहीं थी। सिर्फ हिंदी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि मनसा के सदस्यों ने सम्मानित राजनीति पार्टी के सम्मानित सदस्य को पीटा। राज ठाकरे जी , मैं आपके नाम के आगे जी इस लिए लगा रहा हूं कि आप एक पार्टी के नेता हैं। नहीं तो शायद नाम भी न लेता। मराठी गुंडा कहना मुझे गवारा नहीं हुआ। आप आइए उत्तर प्रदेश में देखिए मराठी कितने सम्मान के साथ रखे जाते हैं। शिक्षा संस्थाओं में अध्यापक ही नहीं प्रचार्य भी बड़ी संख्यां में हैं। इसलिए नहीं के बहुत योग्य हैं बल्कि इसलिए स्थानीय लोगों के साथ वे घुल मिल गए हैं। आई आई टी कानपुर के पहले निदेशक मराठी थे। उन्होंने उन लोगों के अधिकार को नज़रअंदाज़ करके जिनकी ज़मीने आई आई टी बसाने के लिए ली गई थीं, मराठियों का नौकरियांदीं। लेकिन कभी स्थानीय लोगों ने उफ़ नहीं की। आपके यहां जब टैक्सी चलीं तो उच्च वर्गीय मराठियों को स्वयं चलाना गवारा नहीं हुआ। वे उत्तर भारत से ड्राइवर ले गए। जब उन्होंने स्वयं अपनी बना ली तो मुंबई के मानुस की भृकुटि तन गई। आजकल आई आई टी कानपुर के निदेशक भी मराठी हैं। यही नहीं दूसरी बार हुए हैं। रजिस्ट्रार भी मराठी मानुस है। लेकिन किसी के ज़ायके में कोई फ़र्क नहीं। अगर आपकी तरह सोचने लगें तो इतने बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग कैसा अनुभव करेंगे। यही दूसरे प्रदेशों में भी होगा। हिंदुस्तान मानवीय रिश्तों का सम्मान करना जानता है। उत्तर भारत तो ख़ासतौर से। दक्षिण और देश के अन्य भागों में विज्ञान की पी जी स्तर की शिक्षा की कम संस्थाएं थीं। सब जगह से बच्चे कानपुर लखनऊ आदि बड़े शहरों में पढ़ने आते थे। यही मेडिकल शिक्षा की स्थिति थी। कभी किसी ने न भाषा का सवाल उठाया और न परदेसी होने का, जो आप उठा रहे हैं। श्रीमन्, आप नहीं जानते, जानते हैं तो समझना नहीं चाहते कि देश को अलगाववाद की किस आग में झोंक रहे हैं। राजनीतिज्ञ तो अपनी रोटी सेक लेता है आम आदमी का चूल्हा भी नहीं सुलगता। अब ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिज्ञों से बड़े स्वार्थी इन्द्र भी नहीं। क्षमा करें गांधी ने तो संसद को ही वेश्या बताया था हमारे राजनीतिज्ञों ने तो जनतंत्र को भी उसी पैराय पर ला खड़ा किया। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल में उनकी भाषा को पशेमान किया था। बंगला-वंगला कुछ नहीं उर्दू सब कुछ है। राज साहब भी उसी रास्ते पर हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा वह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन मनसा ने यह सोचे समझे बिना चिंगारी फेंक दी कि जो तरह देंगे वे तक हाथ जला बैठेंगे। तटस्थ रहेंगे तो मौजे ए तलातुम उनको भी नहीं बक्शेगी।
ईस्ट इंडिया द्वारा पेशवाओं को पुणे से निकाल दिए जाने पर उत्तर भारत ने ही उनकी पेशवाई की इज़्जत बचाई थी। उत्तर भारत के लोगों ने ही उनका साथ दिया था। आज भी बिठुर के खंडहर पेशावाओं पर गोरों के प्रकोप की गवाही दे रहे हैं। वहीं उन सबकी याद को नानाराव पार्क, मैसेकर घाट यानी नानाराव घाट, तात्या टोपे के स्मारक उनका परिवार उन सबकी याद ताज़ा कराते हैं। वे माहराष्ट्र से अधिक उत्तर भारत के पुरखे हैं। कई मराठी धुलेकर जी आदि सम्मानीय जननेता रहे हैं। वे सब मराठी भी बोलते थे हिंदी भी बोलते थे। आज भी उत्तर भात में रहने वाले मराठी दोनों भाषाएं बोलते हैं। कोई नहीं कहता हिन्दी ही बोलिए। वे सम्मान से ही नहीं रह रहे रोज़ीरोटी भी कमा रहे हैं। महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीयों की तरह उन पर किसी तरह की न बंदिश है न संकट है। न होना चाहिए। बाल ठाकरे का यह इलज़ाम कि अब्बु आज़मी को हिंदी में शपथ लेने से रोका नहीं गया निहायत अपरिपक्व है। लगता है कि वाक़ई खून पानी से अधिक गाढ़ा होता है। भतीजे और भाषा का पक्ष लेना संविधान के सम्मान से अधिक ज़रूरी है। ताज्जुब की बात है कि अंग्रेज़ी में शपथ लेनेवालों के लिए इस वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने कुछ नहीं कहा कि उससे महाराष्ट्र और मराठी की अवमानना नहीं हुई, शायद सम्मान बढ़ा। जिन पेशावाओं को अंग्रेज़ों ने बेइज़्जत किया हिंदी वालों ने उनका साथ दिया वह हिंदी शिवसेना और मनसा की दुश्मन है और अंग्रेज़ी सगी। भाषा कोई गैर नहीं होती न उसके प्रवाह को रोका जा सकता है। ठाकरे साहबान, इंसान से अधिक भाषाएं आपस में लेन देन करती हैं। हम जितने संकुचित और छोटे दिलों के हैं भाषाएं कहीं ज्यादा फ़राख़दिल हैं। एक ज़माना था जब ब्रिटिश संसद में अंग्रेज़ी बोलने वालों पर मनसा की तरह फ्रांसिसी भाषा प्रेमी मनसा की तरह आक्रमण करके हाथ पैर तोड़ देते थे। लेकिन क्या वे अंग्रेज़ी का कुछ बिगाड़ पाए। भाषा अपना रास्ता बनाने के साथ साथ अपने रास्ते के अवरोध भी स्वयं हटाती है। हिंदी भी यही कर रही है अपनी बहनों का सम्मान रखते हुए आगे बढ़ रही है। हिंदी का लिपि के कारण दामन चोली का साथ है। दामन उतारोगे तो बेपर्दगी होगी, चोली उतारोगे तो शर्मज़दा होगे।

Friday 6 November 2009

प्रभाष जोशी हिंदी के अंतिम समर्पित सेनानी

आज सवेरे हिंदुस्तान दैनिक के पहले पृष्ठ पर सूचना देखी तो सन्न रह गया प्रभाष जी चुपके से निकल गए। मुझसे एक साल छोटे थे। पहले मैं उन्हें अपने से बड़ा ही समझता था। जब यह राज़ खुला कि मैं उनसे एक साल बड़ा हूं तो वे बोले अब मैं तुम्हें प्रणाम किया करूंगा। इस बात को उन्होंने कुछ दिन पहले तक निभाया। हिंद स्वराज पर मेरी पुस्तक सस्ता साहित्य मंडल से आई तो मैंनें उन्हें बताने के लिए फ़ोन किया तो उन्होंने प्रणाम करने वाली रिवायत को निभाया। जब वे प्रणाम कहते थे मुझे संकोच होता था। मैंने बेकार ही बताया कि मैं उनसे एक साल बड़ा हूं। दरअसल पहला गिरिमिटिया पर जनसत्ता में बहुत उन्होंने आत्मीय ढंग से समृद्ध लेख लिखा था। लेकिन दलित विमर्श-संदर्भ गांधी पढ़कर स्पष्ट कहा था दलित विमर्श के लिए गांधी को जस्टिफ़िकेशन की ज़रूरत नहीं है। उनमें साफ़ कहने की अद्भुत शक्ति थी। उन्होंने सोनिया गांधी को हिंद स्वराज पढ़ने की सलाह दी थी।
मेरी उनसे तब मुलाकात हुई थी जब वे अज्ञेय जी के साथ एवरीमेन में काम करते थे। जहां तक मुझे याद है तब वे बुशर्ट पैंट भी पहनते थे। बाद में उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखना पढ़ना लगभग छोड़ दिया। दूसरी बार मैं उनसे राजेन्द्र यादव के साथ इंडियन एक्सप्रेस की बिल्डिंग में मिला था। उन्होंने लिखी कागद कोरे की प्रति भी भेंट की थी। हालांकि उन दिनों मैं फ्री लेंसिंग कर रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा ‘आप कहानी उपन्यास के सिवाय भी कुछ और लिखते हैं?’
मैंने कहा ‘नाटक भी लिख लेता हूं।‘
‘नहीं, मेरा मतलब है अखबारं के लिए भी लिखते हैं।‘ मैंने गर्दन हिला दी। वे चुप रहकर बोले।
‘आपके मित्र तो बड़े लेखक हैं। इन्हें तो जनरलिस्टिक लेखन छोटा काम लगता है। लेकिन एक लेखक को समसामयिक विषयों पर ज़रूर लिखना चाहिए। इससे एक तो अपने सरोकारों का पता चलता है दूसरे देश की हालत और समस्याओं से दो चार होने का अवसर मिलता है।‘ यह बात मुझे रघुवीर सहाय भी कहते थे। लेकिन जिस तरह उन्होंने कहा उसमें एक तरह की पकड़ थी। हो सकता उसके पीछे यह भी मंशा रही हो कि यह आदमी फ्री लेंसिग कर रहा है अगर यह अखबारों मे लिखेगा तो आर्थिक मदद भी मिल जाएगी। या केवल एक लेखक को जरनेलिस्टिक लेखन की तरफ़ आकर्षित करने का तरीका था। मेरे मामा 1920 में जब आक्सफोर्ड लंदन से एम ए करके आए तो गांधी जी का संदेश मिला। बापू बंबई में ही थे। वे उनसे मिलने गए। बापू ने सीधे सवाल किया ‘तुम आज़ादी से सरोकार रखते हो या गुलामी की सुख सुविधा से?’
वे कुछ देर समझ नहीं पाए सवाल का मर्म क्या है। बापू काम करते रहे। कुछ देर बाद पूछा क्या सोचा। उनके मुहं से अनायास निकला –आज़ादी। हालंकि इन दोनों घटनाओं में कोई साम्य नहीं था। लेकिन एकाएक उस घटना का ध्यान आ गया था, पर मैं बोला नहीं। कुछ महीने बाद जब मैं उनसे मिलने गया तो वे बोले आपने क्या सोचा। मैंने एक लेख निकालकर उनके सामने रख दिया। जहां तक मुझे याद है वह भाषा के संदर्भ में था। उन्होंने अल्टा पल्टा और पी ए को बुलाकर कहा यह जाएगा। किसी काम का इतना जल्दी नतीजा पहली बार मिला था। हो सकता है यह उनका प्रोत्साहित करने का तरीका रहा हो।
प्रभाष जी ने चंद दिनों पहले मुझसे फ़ोन पर कहा था। मैंने कलकत्ता संस्कृति संसद वालों से कहा है कि जब पहला गिरमिटिया जैसे बड़े उपन्यास के लेखक आ रहे हैं तो 15 नवंबर को होने वाले हिंद स्वराज की गोष्ठी की वही अध्यक्षता करेंगे। कुछ ही देर बाद सचिव रत्नशाह जी का फ़ोन आ गया। हम भले ही कम मिलते हों पर उन्हें सदा गांधी के संदर्भ में मेरी याद रहती थी। जब मेरा उपन्यास छपा तो उन्होंने मुझे फ़ोन किया आपको पटना चलना है और गिरमिटिया पर बोलना है। मैं दिल्ली से आऊंगा आप कानपुर अमुक गाड़ी पर मिलें। मैं जाम के कारण वक्त के वक्त स्टेशन पहुंचा। वे इंतज़ार में टहल रहे थे। बिस्तर लगा तैयार था। जैसी आडियंस वहां मिली वैसी कहीं और नहीं मिली। शिवानंद जी तो थे ही। लालू जी से भी पहली बार उन्होंने ही भेंट कराई। मुझे विचित्र अनुभव हो रहा है हिंदी और गांधी के प्रति समर्पित ऐसा जुझारू योद्धा अब कौन मिलेगा। उनके दम से मुझे दम था। कोई पत्रकार आज हिंदी में ऐसा नहीं जो हिंदी के सवाल को जन्म मरण का सवाल समझता हो। अधिकतर हिंदी के पत्रकार हिंग्लिश के पत्रकार हैं। उन्हीं का दम था कि जनसत्ता को उन्होंने हिंदी का शीर्ष पत्र बना दिया था। आज भी हिंदी के अख़बारों में जनसत्ता को ही बौद्धिक सम्मान प्राप्त है। यह ठीक है कि तीसरे नंबर पर वे क्रिकेट के शैदाई थे। उन्होंने जनसत्ता के बाद कोई दूसरा अखबार नहीं पकड़ा। यही खेल के साथ हुआ। खेलों में क्रिकेट ही उनका पहला प्यार बना रहा। जब गए तो अपने प्रिय खेल देख रहे थे। मैं समझ सकता हूं कि सचिन के इतने बड़े स्कोर पर वे कितने ख़ुश होंगे लकिन 3 रन से हारना कितना बड़ा धक्का रहा होगा। शायद अपने प्रिय खेल और देश के लिए इतना बड़ा बलिदान इतने बड़े पत्रकार ने शायद ही कभी दिया हो।
एक घटना मुझे इस समय फिर याद आ रही है। सूरीनाम भारत सरकार का प्रतिनिधि मंडल जाने वाला था। विदेश मंत्रालय से नाम प्रस्तावित होकर पी एम ओ भेजे गए। उसमें जोशी जी का और मेरा भी नाम था। उन्हीं दिनों मैंने जनसत्ता में इस बात का सख्त शब्दों में खंडन किया था कि मैं आचार्य गिरिराज किशोर नहीं हूं। लोग कई बार मुझे वी एच पी का नेता समझकर पत्र लिखते थे। परिचय देते हुए नाम से पहले आचार्य लगा देते थे। सांप्रदायिकता के प्रतीक व्यक्ति से मेरा नाम जोड़ना मेरे लिए अपमानजनक था। शायद प्रधानमंत्री हाऊस में उस बात को पढ़ लिया गया था। फ़ाइल लौटी तो मेरे और जोशी जी के नाम पर फ़ाइल में निशान लगा था। राज्यमंत्री विदेश ने पीएम से जाकर कहा कि जोशी जी इतने बड़े पत्रकार और गिरिराज किशोर ने गांधी जी पर पहला गिरमिटिया जैसा उपन्यास लिखा है। प्रधानमंत्री ने सदाशयता दिखाई और दिग्विजय सिहं जी की बात मान ली। दरअसल जोशी जी ने अपनी राय के साथ कभी धोखा नहीं किया। वे निडर होकर बी जे पी नीतियों के खिलाफ़ बोलते रहे। इतना बड़ा पत्रकार क्या राज्यसभा में जाने योग्य नहीं थे। लेकिन पार्टियां सरकार में रहीं और गिरीं पर किसी को न हिंदी का धयान आया और न जोशी जीजैसे निर्भीक पत्रकार का।
मैंने समाचार पढ़कर उनके सहयोगी रहे प्रताप सोमवंशी को फ़ोन करके पूछा दाह संस्कार कब होगा उन्होंने बताया कि उनका शरीर इंदौर ले जाया जा रहा है। ख़ामोश हो जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। वे अपना काम पूरा करके घर लौट रहे थे। मैंने मन ही मन प्रणाम कर लिया।

Thursday 5 November 2009

अपणी ढोणी

राजस्थानी के लिए तो समझना कठिन नहीं है कि अपणी ढोणी क्या है। लेकिन बिना देखे और जाने किसी दूसरे प्रदेश वासी के लिए शायद आसान न हो। किसी भी प्रदेश के रहने वाले क्यों न हों, हम लोग अपनी ग्रामीण संस्कृति की न शब्दावली से रले मिले रहे और न जीवन से। बस सुने सुनाए नाम याद रह गए हों तो बात अलग है। लेकिन उनका नाता आम आदमी से क्या है, संवेदना से क्या है, उसकी अर्थवत्ता क्या है यह सब समझना आसान नहीं है। किसी भी शब्द के अर्थ से तब तक समरसता नहीं होती जब तक जीवन में उसका उपयोग न हो और संवेदना से रिश्ता न बने। यह बात इस बार संगमन के कार्यक्रम मे उदयपुर गए तो समझ में आई। मेरे मेज़बान, संबंधी तथा मेडिकल कालेज के बालरोग विभाग के अध्यक्ष डा ए पी गुप्ता ने अंतिम दिन कहा कि आज बाहर खाना खाया जाए। कहां? वे बोले एक ऐसी जगह जो आपने पहले कभी देखी नहीं होगी। मैंने कहा इस बात का ध्यान रखिएगा मैं और मेरी पत्नी पूरी तरह निरामिष हैं। वे दोनों स्वयं भी निरामिष हैं। इसीलिए अपणी ढोणी ले चल रहे हैं। वहां प्याज़ और लहसुन का प्रयोग भी कम प्रयोग होता है। यह नाम एकाएक समझ में नहीं आया। जब उन्होंने बताया इसका मतलब है अपनी झोपड़ी या कुटिया। भोजनालयों के अंगीठी, रसोई, साझाचूल्हा आदि नाम तो हमारी तरफ़ चलते थे। यह नया नाम था। वह ढोणी शहर से दूरी पर एक पहाड़ी पर थी। एकदम ऊबड़ खाबड, गांव का सा वातावरण। कार एक तरफ़ खड़ी की। थोड़ी दूर एक गेट था जिस पर बंदनवारें लटकी थी। ढोल बज रहा था। गेट पर एक आदमी पगड़ी वगड़ी बांधे राजस्थानी धोती पहने अंदर जाने वालों के तिलक लगाकर स्वागत कर रह था। उसकी थाली में लोग रूपये डाल देते थे। चढ़ाई के बाद ऊपर पहुंचे। वहां खाटें बिछीं थी। कुर्सियां भी थीं। राजस्थानी लोकगीत पर एक महिला ग्रामीण नृत्य कर रही थी। छाछ और पापड़ अतिथियों को पेश किया जा रहा था। एक छोटी ढोनी जादूगरी की थी। कहीं कपुतली का नाच हो रहा था। ऊंट की सवारी का इंतज़ाम था। यानी पूरा देहाती मेले का तामझाम था।तभी बारिश होने लगी।जिसको जहां जग मिली घुस गया। जादू की ढोनी जो ठंडी पड़ी थी गर्मा गई। जादूगर ने एक के तीन कबूतर बना दिए। बोला हाथ की सफ़ाई, पेट की कमाई।
असली बात थी जिम्मन की। ज़मीन में पटोरे बिछे थे। सामने चौकियां लगी थीं। हर जाति, धर्म का आदमी उस पंगत में मौजूद था। सब लोग खुशी से सजे बैठे थे। मैं सोच रहा था। हम लोग कितने आधुनिक हो गए। इन रवायतों को भूल गए। इसीलिए उसकी पुनर्प्रस्तुति का आयोजन करके कितने ख़ुश होते हैं। कई राजस्थानी टहलुए खाना परस रहे थे। लग रहा था जैसे किसी ब्याह शादी की पंगत हो। गट्टे की सब्ज़ी, पनीर, आलू, रायता दाल घी, बाटी, ताज़ा निकला मक्खन, गुड़ मक्का बाजरे की रोटी। यानी सब राजस्थानी ठाठ में रचे बसे थे। हालांकि छोटे स्तर पर ऐसा देहाती आयोजन कभी कभार परिवारों में भी किया जा सकता है। लकिन सब क्या, अधिकतर घरों में, डायनिंग टेबिल स्थायी रूप से थिर हो गई। उसे कौन खिसका सकता है। सब से महत्त्वपूर्ण था मनुहार का कार्यक्रम। पहले एक बार गर्म गर्म जलेबी परसी गई। फिर एक आदमी आया। उसके हाथ मेंजलेबी से भरी थाली थी। वह सबको अपनी तरफ़ से नाम देता जा रहा था और सीधे मुहं में जलेबी रखता जा रहा था। एक के बाद एक जब तक वह मुंह ही न फेर ले। वह मुंह में जलेबी रखता जाता था कहता जाता था वाह जी राम नारायण, एक राम के नाम की। महिला हुई तो ज़नाना नाम, मुसलमान हुआ तो कहता हां जी हमीदा बीबी। सब पंगत हंस हंस कर लोटपोट थी। उसके हाथ से जलेबी खाने और अपना नया नामकरण कराने में हर किसी को मज़ा आ रहा था।
सबसे बड़ी बात हिंदू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्मण, और अन्य जाति सब उसके ही हाथ से बिना भेद भाव के खा रहे थे। तबसे मेरे दिमाग में यह सवाल घूम रहा है गांव के एक प्रायोजित वातावरण में इन स्थितियों में हम फूले नहीं समाते लेकिन इस आत्मीयता को ज़िंदगी की वास्तविकता बना लेने में हमें गुरेज़ है। गांव हमारे लिए सपने की चीज़ हो गई। मसनूई गांव बनाकर उसमें कुछ समय जीना हमें तरोताज़ा कर देता है। वाह जी वाह!

Wednesday 9 September 2009

हिंदी राजभाषा होने का अर्थ

मैं यह कह सकता हूं और कहना भी चाहता हूं कि हिंदी का राजभाषा होना हमारे लिए सम्मान की बात है पर चाह कर भी कह नहीं पाता। ‘राजभाषा’ नेहरू सरकार द्वारा हिंदी के धंधेबाज़ों को दिया गया स्वर्ण खिलौना है। हिंदी के लिए राजभाषा नाम उस वक्त निर्मित यानी कॉयन किया था जब उसे राष्ट्रभाषा बनाने की जद्दोजहद जारी थी। यह काम किसी हिंदी वाले ने ही किया होगा सरकार की नज़रों में चढ़ने के लिए। क्योंकि अंग्रेज़ी पोषित भारतीय विद्वानों के लिए तो यह संभव नहीं था। उन्होंने तो ‘स्टेट लेंग्वेज’ की तरह अधकचरा अंग्रेज़ी पर्याय सूझ रहा होगा, उन सज्जन ने उसे हिंदी में तबदील कर दिया होगा। क्योंकि मेरे अल्पज्ञान के अनुसार तो संसार भर में उस समय हर देश की भाषा को नेशनल लैंग्वेज यानी राष्ट्रभाषा ही कहा जाता था। किसी देश में राज भाषा वाली स्थिति शायद ही रही हो। हमारे देश में हिंदी को राष्ट्र भाषा के नाम से संबोधित करना कुफ़्र तोलने की तरह था। बीच का रास्ता राजभाषा ही हो सकता था। यह ऐसा ही था जैसे पटेल बहुमत के बावजूद प्रधानमंत्री नहीं बन सके तो उन्हें उप-प्रधानमंत्री बना दिया गया। राजभाषा से क्या भाषा का विकास हुआ? भाषा को राजसम्मत नाम देकर उसका गौरव कभी नहीं बढ़ता। भाषा का संवर्धन साहित्य में प्रयुक्त उन ध्वनियों से होता है जो शब्द विभिन्न स्रोतों से आकर समाहित होते हैं। यह तभी संभव है जब किसी भाषा की स्वायत्तता एक ईकाई की तरह अक्षुण्य हो। राजभाषा और हिंदी भाषा का विचित्र समीकरण है। राजाभाषा की सरकारी कार्यालयों में सीमित भूमिका है जैसे 1. हिंदी भाषी राज्यों के अंग्रेज़ी न जानने वाली जनता के लिए अंग्रेज़ी की प्रामाणिक मानी जाने वाली दस्तावेज़ों/ शासनादेशों का अनुवाद करके लोगों तक पहुंचाना। लिखा है कि प्रामाणिक दस्तावेज़ अंग्रेज़ी की ही मानी जाएगी। 2.दफ़तरों में हिंदी उपस्कर यानी टंकनक, शब्द कोषों और टेककों का होना सुनिशचित करना। अब उसमें कंप्यूटर भी जुड़ गया। राष्ट्र स्तर पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में निर्मित राजभाषा सलाहाकार समिति के सदस्य देश भर में सरकारी खर्च पर घूम घूमकर देखेंगे कि राजभाषा का काम सुचारू रूप से चल रहा है या नहीं। 3. हिंदी निदेशालय हिंदी का प्रचार प्रसार देखेगा। 4. तकनीकी शब्दवली आयोग शब्दकोष बनाएगा जो अधिकतर कार्यालयों के बुकशेल्फ़ों में शोभायमान रहेगा आदि।
गांधी जी ने हिंद स्वराज के 18वें अध्याय में 100 साल पहले एक महत्त्वपूर्ण वाक्य लिखा था ‘सारे भारत के लिए जो भाषा चाहिए , वह हिंदी ही होगी।‘ इस वाक्य का राजभाषा एक फूहड़ मज़ाक है। आज़ादी के बाद बकौल इतिहासकार रामचंद्र गूहा के इस सबसे समझदार आदमी की बातों को रद्दी की टोकरी में, चाहे ग्रामो उत्थान की बात हो या हिंदी की उनके अनुयाइयों की सरकार ने ही फेंका। इस काम में उस समय के हिंदी के अलंबारदार भी अपनी चुप्पी के साथ शरीक थे। हिंद स्वराज के 20वें अध्याय में उन्होंने अंग्रेज़ों को यह कहकर ललकारा था भारत की भाषा अंग्रेज़ी नहीं है, हिंदी है। वह आपको सीखनी पड़ेगी। और हम तो आपके साथ अपनी भाषा में ही व्यवहार करेंगे। हुआ उलटा, ललकार भारतियों पर ही लागू कर दी गई। भारत को सब भाषाएं भूलकर अंग्रेज़ीमय होना होगा। सरकार अंग्रेज़ी में ही काम करेगी। हुकूमत का उद्देश्य पूरा हुआ। जब पंद्रह पंद्रह साल की अवधि बढ़ाकर हिंदी को ही संपर्क भाषा बनाने का मसला टाला जा रहा था तो डा लोहिया ने कहा था ज़िंदा कौमें इंतज़ार नहीं करतीं। गांधी की तरह उनकी बात भी देश ने इस कान से सुनकर उस कान से निकाल दी। ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे। उल्टे नमाज़ की जगह रोज़े गले पड़ गए। राज भाषा बनाकर, जिस हिंदी को आज़ादी के दौरान पूरा देश प्यार करता था उसी हिंदी के लिए दूसरी भाषाओं के दिलों में साज़िशन ज़हर भर दिया गया। अंग्रेज़ी जीत गई या जिता दी गई। काश हिंदीवालों ने सोचा होता कि राजभाषा का यह टुकड़ा गले मे ऐसा फंसेगा न निकालते बनेगा न सटकते। वही स्थिति हिंदी की हुई कि जैसी सत्ता के लालच में बंटवारा मानकर आज देश चारों तरफ़ से घिर गया। भाई भी दुश्मन हो गए। अब भी वक्त है कह सको तो कह दो राजभाषा का पद जिसको देना हो दे दो हमें हमारा मोहब्बत प्यार लौटा दो।

Monday 24 August 2009

असहमति सहमति का नाज़ुक फ़ंडा

यह सवाल विचारकों और लेखकों के लिए परेशान करने वाला है। कैंसरवार्ड के लेखक सालझेनित्सिन को इसलिए साइबेरिया भेज दिया गया था कि सोवियतसंघ की सरकार उनके मत से असहमत थी। यह तो मान लिया कि वह सरकार तानाशाहनुमा सरकार थी। लेकिन हिंदुस्तान एक जनतंत्र है। ऐसा जनतंत्र, जहां सामान्य आदमी को भी अपनी राय बिना लाग लपेट के अभिव्यक्त करने की आज़ादी है। इसका लाभ सबसे अधिक रा. स्वं. सं. और बीजेपी उठाते रहें। गांधी जी जीवित थे तो आर एस एस और साम्यवादी सबसे अधिक उन्हें कोसते थे। आर आर एस वाले पागल बुड्ढा कहते थे। हर शहर में उनका सालाना जलसा होता था। उसमें पद संचालन और लाठी संचालन आदि खेल होते थे। मुख्य अतिथि संचालक आदि ओहदेदार होते थे। सबसे अधिक संस्कृत निष्ठ गालियां देने का खेल गांधी जी के माध्यम से खेला जाता था। यहां तक हिंदूवादी समुदायों की साजि़श से ही उन्हें गोली भी मारी गई। यह सब जनतंत्र का फ़ायदा उठाकर किया गया। अगर स्टालिन या हिटलर का निज़ाम होता तो न जाने क्या हुआ होता। अंग्रे़ज़ों ने बहुत ज़्यादतियां कीं लेकिन अभिव्यक्ति की स्वत्रंता को यथासंभव महत्त्व वे भी देने की कोशिश करते थे। कितना दे पाते थे यह अलग है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माडल वहीं से लिया गया है। आज भी गांधी जी को राष्ट्रपिता मानने में सबसे अधिक आपत्ति उन्हें ही है। मुस्लमान वंदेमातरम नहीं गाते उसे वे अपने धर्म के ख़िलाफ़ मानते हैं। लेकिन बी जे पी उनकी मातृ संस्था आर एस एस जो धर्म को सर्वोपरि मानते हैं, इस बात को देशद्रोह करार देने पर आमादा रहते हैं। सवाल उठता है किसकी असहिष्णुता जनतांत्रिक सीमा के अंदर है, किसकी तनाशाही की सीमा में प्रवेश कर जाती है। वह सीमा क्या है? शायद यह किसी को मालूम नहीं हर व्यक्ति, नेता और पार्टीयां विकेटस को दूसरे को आउट करने के लिए, अपने हिसाब से इधर उधर सरकाती रहती हैं।
एक ही घर में स्वत्रंत्रता के कई पैमाने हों तो उस घर की आंतरिक आज़ादी और शांति का ख़तरे में पड़ जाना अवश्यंभावी है। जब तक डंडा है तब तक सब चुप हैं जैसे ही डंडा कमज़ोर हुआ वैसे ही घर सड़क बनी। बी जे पी के अध्यक्ष अडवानी पाकिस्तान एक हाजी की तरह गए थे। ख़ासतौर से जिन्ना साहब के मकबरे की ज़ियारत करने। वैसे तो राजा रंजीतसिंह की समाधि भी पाकिस्तान में ही थी। वहां उन्होंने जो भाखा था उसने तो इतिहास का रुख़ ही बदल दिया था। जिन्ना को विश्व का सबसे चमत्कारी व्यक्ति पुरूष बना दिया जिसने एक नया देश एक टाइपराइटर और टाइपिस्ट के ज़रिए बना दिया। सांप्रदायिकता की बात यह कहते हुए उन्हें ाद नहीं आई। जिन्ना साहब को सेकुलर बताते हुए अडवानी साहब को भी ध्यान नहीं आया कि उनकी पार्टी का बुनियादी सिद्धान्त है एक जन, एक संस्कृति और एक राष्ट्र। उसी सिद्धान्त को तिलांजलि दी जा रही है।
उस पुस्तक में जो लिखा वह तो चिंतन की ऐसी पर्त खोल रही थी उसे पढ़कर लगता है गंगा दास जमुना दास होकर आए हैं। देश में आए तो सबसे ज़्यादा बी जे पी के लोग उनके खिलाफ़ मुखर थे। लेकिन समरथ को नहीं दोस गुसांई। बाद में बी जे पी नेतृत्व ने रास्ता निकाल लिया ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं। किसी को बचाना हो तिनका भी पतवार बन जाता है। जब डुबाना हो तो किनारा भी मझधार बन जाता है। दरअसल जिन्ना बटवारे के लिए ज़िम्मेदार हैं या नेहरू और पटेल, सवाल इस बात का नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि बटवारे की नींव तो वीर सावरकर ने डाल दी थी। आर एस एस उनका परम समर्थक था। साथ ही आर एस एस मुस्लिमों के खिलाफ़ था। उनका मुसलमानों के खिलाफ़ होना वीर सावरकर की टू नेशन्स थ्योरी का ही विस्तार था। उसके बाद जिन्ना ने टू नेशन्स थ्योरी की बात उठाई। दरअसल आर एस एस तो अखंड भारत की बात करता था लेकिन मुसलमानों को हिकारत की दृष्टि से देखता था। प्रकारंतर से मुसलमानों के लिए दुविधा की स्थिति पैदा कर रहा था वे इधर जाएं या उधर। उधर जाएंगे तो उन्हें एक मुल्क चाहिए। यहां रहें तो आर एस एस की शर्तों पर रहें। दोनों ही बातें जोखिम भरी थीं। अखंड भारत तभी संभव था जब देश में एक दूसरे के लिए सहिष्णुता का वातावरण हो। जो 1916 में तिलक जी और जिन्ना के प्रयत्नों से बना था। दिलों में गुंजायश हो तो सब संभव है। गांधी हृदय परिवर्तन की बात कहते थे। लेकिन आर एस एस देश में मुसलमानों के लिए इस तरह का वातावरण बनाने के पक्ष में नहीं थी इसी बात को लेकर उनका गांधीजी से मतभेद था। यह कहना शायद ठीक न लगे कि वे लोग प्रकांतर से बटवारे को प्रोत्साहित कर रहे थे। हिंदू पार्टियों के दबाव में 1857 में अंग्रज़ों के खिलाफ़ जो हिंदू मुस्लिम एकता बनी थी उसमें दरार उन्होंने ही पैदा की।
जहां तक जिन्ना का सवाल है वे एक सेकुलर से कट्टर मुस्लिम नेता कैसे बने इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों पर नज़र डालना ज़रूरी है। उस पीढ़ी के जीवन काल में दो विश्वयुद्ध हो चुके थे। उसका नतीजा हुआ था कि विश्व भर मे नए राष्ट्रों की बाहुलता हुई थी। राजशाही का स्थान सर्वसत्तावाद यानी टोटलिटेरियनिज्म ने लेना शुरू कर दिया था। पाकिस्तान उन अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों की देन भी था। जिन्ना वैसे भी एक बहु-आकांक्षी व्यक्ति होने के साथ साथ समय की चाल को पहचानने में अपना सानी नहीं रखते थे। उन्होंने समय की नब्ज़ को समझा। वे समझ गए थे कि अपनी पहचान के लिए उन्हे विश्व में हो रहे परिवर्तन का लाभ उठाना चाहिए। हिंदूबाहुल देश में सम्मान भले ही पा लें पर एक स्वतंत्र के मुखिया नहीं बन सकते। गांधी ने बटवारे को रोकने के लिए जिन्ना को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था जिसका नेहरू और पटेल ने यह कहकर विरोध किया था कि आप देश की आज़ादी चाहते हैं या सिविल वार। यह ठीक है कि हिंदूवादी शक्तियां और सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ सिविल वार की स्थितियां उत्पन्न कर देते। शायद वे बटवारे जितनी भयावह न होतीं। गांधी के इस प्रस्ताव का मर्म सत्ता के आकर्षण से विरक्त होकर ही समझा जा सकता था। इस प्रस्ताव का दूरगामी प्रभाव होता। देश बटने से बच जाता। हिंदूवादी ताकतों का अखंड भारत बनाने का सपना मुसलमानों और हिंदुओं के बीच बिना भेदभाव के पूरा होने की संभावना हो सकती थी। शायद गांधी की हत्या भी न होती। जहां तक पटेल का सवाल है वे गांधी भक्त थे। गांधी का हत्यारा गोडसे आर एस एस का सदस्य रह चुका था। वीर सावरकर गोडसे उसके मेन्टर, आर एस एस के आईकन थे। पटेल ने उनकी हत्या के बाद उस पर प्रतिबंध लगाया था। अडवानी का यह कहना भ्रामक है कि नेहरू के दबाव में पटेल ने ऐसा किया। यह आश्चर्य की बात है कि अपने को लौहपुरूष कहलाने वाला व्यक्ति वास्तविक लौहपुरूष की यह कह कर अवमानना करता है कि वह दूसरे व्यक्ति के दबाव में अपनी मान्यता के विरुद्ध काम करेगा। यहां मैं दो वामपथीं इतिहासकारों को उद्धृत करना चाहूंगा। विपिनचंद्रा ने 22 अगस्त 09 के द हिंदू में कहा है कि यह कहना कि पटेल ने नेहरू के कहने पर ऐसा किया उनको बदनाम करना है। पटेल अपने मत और अंतरआत्मा के विरुद्ध कुछ भी करने वाले नहीं थे। इसी तरह इरफ़ान हबीब साहब ने द हिंदू में कहा है ‘मैंने गोलवलकर और पटेल के बीच हुई ख़तोकिताबत पढ़ी है। हालांकि उन्होंने आर एस एस को गांधी जी की हत्या के लिए दोषी नहीं माना लेकिन उन्होंने उसे सांप्रदायिक वातावरण बनाने के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराया जिसके कारण गाधी जी की हत्या हुई। उस पत्रव्यवहार में आर एस एस की हिंसक राजनीति के खिलाफ़ पटेल का रुख़ स्पष्ट है।‘ (उपरोक्त दोनो अंश उन दोनों विद्वानों के कथन का भावार्थ है)।
बाद में उस प्रतिबंध को पटेल ने तभी हटाया जब आर एस एस के नेतृत्व ने लिखित आश्वासन दिया कि वे सांस्कृतिक संस्था के रूप मे कार्य करेंगे राजनीति में भाग नहीं लेंगे। यह पटेल की दूरअंदेश कूटनीति का प्रमाण है। मैं इस विमर्श को यह कहकर यहीं छोड़ता हूं कि आर एस एस एक तरह से मिलिटेंट शक्ति के रूप में उभर रहा था उसको सांस्कृतिक संस्था का रूप देकर उन्होंने हिंदू मुस्लिम संघर्षों की संभावनाओं पर काफ़ी हद तक विराम लगा दिया। जहां तक जसवंत सिहं की पुस्तक का सवाल है उसके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही सिद्धान्त आधारित इतनी नहीं जितना प्रभावशाली नेताओं का पार्टी के कोर सिद्धान्त की आड़ में व्यक्तिगत हिसाब निबटाने का प्रयास है। लोग जल्दी भूल जाते हैं अडवानी जी ने अपन पुस्तक में लिखा है कि जसवंत सिहं द्वारा आतंकवादियों को काबुल छोड़कर आने के बार में उन्हें मालूम नहीं था। गृहमंत्री की मर्ज़ी की मंज़ूरी के बिना क्या जसवंत सिहं छापा मारकर आतंकवादियों को ले गए थे। लौहपुरुश चुप रहा। उसी समय जसवंत सिंह ने इस बात का प्रतिवाद किया था। अडवानी जी ने जहां तक मुझे याद है स्वीकार किया था मुझे याद नहीं रहा । बाद में क्या पुस्तक में इस तथ्यात्मक भूल को सुधारा? शायद नहीं। इसका मतलब पुस्तक में लिखा यह तथ्य इतिहास का हिस्सा बन जाएगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री को तानाशाह और विदेश मंत्री को उनकी साज़िश का हिस्सा मान लिया जाएगा। यह सरकार और पार्टी के ऊपर धब्बा बनकर चमकेगा। मैं तत्कालीन गृहमंत्री का यह इंदराज देश की राजनीति के लिए लांछन मानता हूं। जसवंत सिहं ने जो लिखा उसका ख़मियाज़ा भुगता। लेकिन अपनी बात पर कायम रहे। लेकिन पार्टी का एक बहुत बड़ा नेता लिखने में कुछ और कहने मे कुछ,फिर भी सुरक्षित। सुना है कि पार्टी प्रवाक्ताओं को निर्देश हुए हैं कि वे इस प्रकरण पर चुप रहेंगे। यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि पुस्तक विमोचन के समय लेखक पार्टी में था। लेकिन कोई नेता विमोचन में उपस्थित नहीं था। पार्टी के लिए यह अच्छा मौक़ा था कि कोई भी प्रतिनिधि उपस्थित होकर पार्टी की स्थिति स्पष्ट कर सकता था। जसवंत सिह को मजबूरन गैरपार्टी लोगों को मंच पर बैठाना पड़ा भले ही प्रगतिशीलता के शीर्ष पुरूष हों। लेकिन उनको उनके समुदाय ने शायद इसलिए आपत्ति मुक्त कर दिया हो कि लेखक और आलोचक के बीच सजातियता होती है।
समाज को ख़ासतौर से पढ़े लिखे जागरूक समुदायों को समानता का व्यवहार सीखना पड़ेगा, आज नहीं तो कल। यह बात राजनीति पर ही लागू नहीं होती। बौद्धिक क्षेत्रों में भी लागू होनी चाहिए। जसवंत सिहं को तो स्पष्टीकरण का अवसर भी नहीं दिया गया। अडवानी साहब तो पूछे जाने से ऊपर हैं ही। अंत में कहना चाहूंगा समाज संवेदनशील अवयवों से बना है एक भी अटपटा काम समाज में तरंगे पैदा करने के लिए काफ़ी है। चाहे राजनीति हो या साहित्य। राजनीति खुला खेल है उसकी प्रतिक्रिया समाज में तत्काल होती है। साहित्य शब्दों से घिरी दुनिया, जो धीरे धीरे खुलती है। खरोंचे वहां भी पड़ती हैं। एक समाचार पत्र में कवियों की तस्वीरों का कोलाज छपा था। एक छात्र ने मुझसे पूछा अंकल सुमित्रानंदन पंत की छोटी सी तस्वीर एक कोने में क्यों छपी है। पहले तो ये बहुत बड़े कवि माने जाते थे। मेरे पास इसका जवाब कुछ नहीं था। यह सब अनायास भी होता है पर किसी प्रगतिशील शीर्ष पुरुष का हिंदूवादी मंच पर जाकर बैठना भी क्या अनायास हो सकता है? इसका भी मेरे पास कोई उत्तर नहीं। वहां भी लोग चुप हैं।

प्रिय ओ जी,
मैंने गांधी जी के संदर्भ में एक लेख भेजा था।मिला होगा। लेकिन जसवंत सिहं वाले मामले ने मुझे यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया। साहित्य के शीर्ष पुरुष की उपस्थिति ने इसे साहित्य से भी जोड़ दिया। अगर उपयूक्त समझें तो उपयेग करलें अपने निर्णय से अवगत कराएं धन्वाद। जी के

आज़ादी के संदर्भमें गांधी

यह सवाल विचारकों और लेखकों के लिए परेशान करने वाला है। कैंसरवार्ड के लेखक सालझेनित्सिन को इसलिए साइबेरिया भेज दिया गया था कि सोवियतसंघ की सरकार उनके मत से असहमत थी। यह तो मान लिया कि वह सरकार तानाशाहनुमा सरकार थी। लेकिन हिंदुस्तान एक जनतंत्र है। ऐसा जनतंत्र, जहां सामान्य आदमी को भी अपनी राय बिना लाग लपेट के अभिव्यक्त करने की आज़ादी है। इसका लाभ सबसे अधिक रा. स्वं. सं. और बीजेपी उठाते रहें। गांधी जी जीवित थे तो आर एस एस और साम्यवादी सबसे अधिक उन्हें कोसते थे। आर आर एस वाले पागल बुड्ढा कहते थे। हर शहर में उनका सालाना जलसा होता था। उसमें पद संचालन और लाठी संचालन आदि खेल होते थे। मुख्य अतिथि संचालक आदि ओहदेदार होते थे। सबसे अधिक संस्कृत निष्ठ गालियां देने का खेल गांधी जी के माध्यम से खेला जाता था। यहां तक हिंदूवादी समुदायों की साजि़श से ही उन्हें गोली भी मारी गई। यह सब जनतंत्र का फ़ायदा उठाकर किया गया। अगर स्टालिन या हिटलर का निज़ाम होता तो न जाने क्या हुआ होता। अंग्रे़ज़ों ने बहुत ज़्यादतियां कीं लेकिन अभिव्यक्ति की स्वत्रंता को यथासंभव महत्त्व वे भी देने की कोशिश करते थे। कितना दे पाते थे यह अलग है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माडल वहीं से लिया गया है। आज भी गांधी जी को राष्ट्रपिता मानने में सबसे अधिक आपत्ति उन्हें ही है। मुस्लमान वंदेमातरम नहीं गाते उसे वे अपने धर्म के ख़िलाफ़ मानते हैं। लेकिन बी जे पी उनकी मातृ संस्था आर एस एस जो धर्म को सर्वोपरि मानते हैं, इस बात को देशद्रोह करार देने पर आमादा रहते हैं। सवाल उठता है किसकी असहिष्णुता जनतांत्रिक सीमा के अंदर है, किसकी तनाशाही की सीमा में प्रवेश कर जाती है। वह सीमा क्या है? शायद यह किसी को मालूम नहीं हर व्यक्ति, नेता और पार्टीयां विकेटस को दूसरे को आउट करने के लिए, अपने हिसाब से इधर उधर सरकाती रहती हैं।
एक ही घर में स्वत्रंत्रता के कई पैमाने हों तो उस घर की आंतरिक आज़ादी और शांति का ख़तरे में पड़ जाना अवश्यंभावी है। जब तक डंडा है तब तक सब चुप हैं जैसे ही डंडा कमज़ोर हुआ वैसे ही घर सड़क बनी। बी जे पी के अध्यक्ष अडवानी पाकिस्तान एक हाजी की तरह गए थे। ख़ासतौर से जिन्ना साहब के मकबरे की ज़ियारत करने। वैसे तो राजा रंजीतसिंह की समाधि भी पाकिस्तान में ही थी। वहां उन्होंने जो भाखा था उसने तो इतिहास का रुख़ ही बदल दिया था। जिन्ना को विश्व का सबसे चमत्कारी व्यक्ति पुरूष बना दिया जिसने एक नया देश एक टाइपराइटर और टाइपिस्ट के ज़रिए बना दिया। सांप्रदायिकता की बात यह कहते हुए उन्हें ाद नहीं आई। जिन्ना साहब को सेकुलर बताते हुए अडवानी साहब को भी ध्यान नहीं आया कि उनकी पार्टी का बुनियादी सिद्धान्त है एक जन, एक संस्कृति और एक राष्ट्र। उसी सिद्धान्त को तिलांजलि दी जा रही है।
उस पुस्तक में जो लिखा वह तो चिंतन की ऐसी पर्त खोल रही थी उसे पढ़कर लगता है गंगा दास जमुना दास होकर आए हैं। देश में आए तो सबसे ज़्यादा बी जे पी के लोग उनके खिलाफ़ मुखर थे। लेकिन समरथ को नहीं दोस गुसांई। बाद में बी जे पी नेतृत्व ने रास्ता निकाल लिया ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं। किसी को बचाना हो तिनका भी पतवार बन जाता है। जब डुबाना हो तो किनारा भी मझधार बन जाता है। दरअसल जिन्ना बटवारे के लिए ज़िम्मेदार हैं या नेहरू और पटेल, सवाल इस बात का नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि बटवारे की नींव तो वीर सावरकर ने डाल दी थी। आर एस एस उनका परम समर्थक था। साथ ही आर एस एस मुस्लिमों के खिलाफ़ था। उनका मुसलमानों के खिलाफ़ होना वीर सावरकर की टू नेशन्स थ्योरी का ही विस्तार था। उसके बाद जिन्ना ने टू नेशन्स थ्योरी की बात उठाई। दरअसल आर एस एस तो अखंड भारत की बात करता था लेकिन मुसलमानों को हिकारत की दृष्टि से देखता था। प्रकारंतर से मुसलमानों के लिए दुविधा की स्थिति पैदा कर रहा था वे इधर जाएं या उधर। उधर जाएंगे तो उन्हें एक मुल्क चाहिए। यहां रहें तो आर एस एस की शर्तों पर रहें। दोनों ही बातें जोखिम भरी थीं। अखंड भारत तभी संभव था जब देश में एक दूसरे के लिए सहिष्णुता का वातावरण हो। जो 1916 में तिलक जी और जिन्ना के प्रयत्नों से बना था। दिलों में गुंजायश हो तो सब संभव है। गांधी हृदय परिवर्तन की बात कहते थे। लेकिन आर एस एस देश में मुसलमानों के लिए इस तरह का वातावरण बनाने के पक्ष में नहीं थी इसी बात को लेकर उनका गांधीजी से मतभेद था। यह कहना शायद ठीक न लगे कि वे लोग प्रकांतर से बटवारे को प्रोत्साहित कर रहे थे। हिंदू पार्टियों के दबाव में 1857 में अंग्रज़ों के खिलाफ़ जो हिंदू मुस्लिम एकता बनी थी उसमें दरार उन्होंने ही पैदा की।
जहां तक जिन्ना का सवाल है वे एक सेकुलर से कट्टर मुस्लिम नेता कैसे बने इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों पर नज़र डालना ज़रूरी है। उस पीढ़ी के जीवन काल में दो विश्वयुद्ध हो चुके थे। उसका नतीजा हुआ था कि विश्व भर मे नए राष्ट्रों की बाहुलता हुई थी। राजशाही का स्थान सर्वसत्तावाद यानी टोटलिटेरियनिज्म ने लेना शुरू कर दिया था। पाकिस्तान उन अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों की देन भी था। जिन्ना वैसे भी एक बहु-आकांक्षी व्यक्ति होने के साथ साथ समय की चाल को पहचानने में अपना सानी नहीं रखते थे। उन्होंने समय की नब्ज़ को समझा। वे समझ गए थे कि अपनी पहचान के लिए उन्हे विश्व में हो रहे परिवर्तन का लाभ उठाना चाहिए। हिंदूबाहुल देश में सम्मान भले ही पा लें पर एक स्वतंत्र के मुखिया नहीं बन सकते। गांधी ने बटवारे को रोकने के लिए जिन्ना को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था जिसका नेहरू और पटेल ने यह कहकर विरोध किया था कि आप देश की आज़ादी चाहते हैं या सिविल वार। यह ठीक है कि हिंदूवादी शक्तियां और सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ सिविल वार की स्थितियां उत्पन्न कर देते। शायद वे बटवारे जितनी भयावह न होतीं। गांधी के इस प्रस्ताव का मर्म सत्ता के आकर्षण से विरक्त होकर ही समझा जा सकता था। इस प्रस्ताव का दूरगामी प्रभाव होता। देश बटने से बच जाता। हिंदूवादी ताकतों का अखंड भारत बनाने का सपना मुसलमानों और हिंदुओं के बीच बिना भेदभाव के पूरा होने की संभावना हो सकती थी। शायद गांधी की हत्या भी न होती। जहां तक पटेल का सवाल है वे गांधी भक्त थे। गांधी का हत्यारा गोडसे आर एस एस का सदस्य रह चुका था। वीर सावरकर गोडसे उसके मेन्टर, आर एस एस के आईकन थे। पटेल ने उनकी हत्या के बाद उस पर प्रतिबंध लगाया था। अडवानी का यह कहना भ्रामक है कि नेहरू के दबाव में पटेल ने ऐसा किया। यह आश्चर्य की बात है कि अपने को लौहपुरूष कहलाने वाला व्यक्ति वास्तविक लौहपुरूष की यह कह कर अवमानना करता है कि वह दूसरे व्यक्ति के दबाव में अपनी मान्यता के विरुद्ध काम करेगा। यहां मैं दो वामपथीं इतिहासकारों को उद्धृत करना चाहूंगा। विपिनचंद्रा ने 22 अगस्त 09 के द हिंदू में कहा है कि यह कहना कि पटेल ने नेहरू के कहने पर ऐसा किया उनको बदनाम करना है। पटेल अपने मत और अंतरआत्मा के विरुद्ध कुछ भी करने वाले नहीं थे। इसी तरह इरफ़ान हबीब साहब ने द हिंदू में कहा है ‘मैंने गोलवलकर और पटेल के बीच हुई ख़तोकिताबत पढ़ी है। हालांकि उन्होंने आर एस एस को गांधी जी की हत्या के लिए दोषी नहीं माना लेकिन उन्होंने उसे सांप्रदायिक वातावरण बनाने के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराया जिसके कारण गाधी जी की हत्या हुई। उस पत्रव्यवहार में आर एस एस की हिंसक राजनीति के खिलाफ़ पटेल का रुख़ स्पष्ट है।‘ (उपरोक्त दोनो अंश उन दोनों विद्वानों के कथन का भावार्थ है)।
बाद में उस प्रतिबंध को पटेल ने तभी हटाया जब आर एस एस के नेतृत्व ने लिखित आश्वासन दिया कि वे सांस्कृतिक संस्था के रूप मे कार्य करेंगे राजनीति में भाग नहीं लेंगे। यह पटेल की दूरअंदेश कूटनीति का प्रमाण है। मैं इस विमर्श को यह कहकर यहीं छोड़ता हूं कि आर एस एस एक तरह से मिलिटेंट शक्ति के रूप में उभर रहा था उसको सांस्कृतिक संस्था का रूप देकर उन्होंने हिंदू मुस्लिम संघर्षों की संभावनाओं पर काफ़ी हद तक विराम लगा दिया। जहां तक जसवंत सिहं की पुस्तक का सवाल है उसके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही सिद्धान्त आधारित इतनी नहीं जितना प्रभावशाली नेताओं का पार्टी के कोर सिद्धान्त की आड़ में व्यक्तिगत हिसाब निबटाने का प्रयास है। लोग जल्दी भूल जाते हैं अडवानी जी ने अपन पुस्तक में लिखा है कि जसवंत सिहं द्वारा आतंकवादियों को काबुल छोड़कर आने के बार में उन्हें मालूम नहीं था। गृहमंत्री की मर्ज़ी की मंज़ूरी के बिना क्या जसवंत सिहं छापा मारकर आतंकवादियों को ले गए थे। लौहपुरुश चुप रहा। उसी समय जसवंत सिंह ने इस बात का प्रतिवाद किया था। अडवानी जी ने जहां तक मुझे याद है स्वीकार किया था मुझे याद नहीं रहा । बाद में क्या पुस्तक में इस तथ्यात्मक भूल को सुधारा? शायद नहीं। इसका मतलब पुस्तक में लिखा यह तथ्य इतिहास का हिस्सा बन जाएगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री को तानाशाह और विदेश मंत्री को उनकी साज़िश का हिस्सा मान लिया जाएगा। यह सरकार और पार्टी के ऊपर धब्बा बनकर चमकेगा। मैं तत्कालीन गृहमंत्री का यह इंदराज देश की राजनीति के लिए लांछन मानता हूं। जसवंत सिहं ने जो लिखा उसका ख़मियाज़ा भुगता। लेकिन अपनी बात पर कायम रहे। लेकिन पार्टी का एक बहुत बड़ा नेता लिखने में कुछ और कहने मे कुछ,फिर भी सुरक्षित। सुना है कि पार्टी प्रवाक्ताओं को निर्देश हुए हैं कि वे इस प्रकरण पर चुप रहेंगे। यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि पुस्तक विमोचन के समय लेखक पार्टी में था। लेकिन कोई नेता विमोचन में उपस्थित नहीं था। पार्टी के लिए यह अच्छा मौक़ा था कि कोई भी प्रतिनिधि उपस्थित होकर पार्टी की स्थिति स्पष्ट कर सकता था। जसवंत सिह को मजबूरन गैरपार्टी लोगों को मंच पर बैठाना पड़ा भले ही प्रगतिशीलता के शीर्ष पुरूष हों। लेकिन उनको उनके समुदाय ने शायद इसलिए आपत्ति मुक्त कर दिया हो कि लेखक और आलोचक के बीच सजातियता होती है।
समाज को ख़ासतौर से पढ़े लिखे जागरूक समुदायों को समानता का व्यवहार सीखना पड़ेगा, आज नहीं तो कल। यह बात राजनीति पर ही लागू नहीं होती। बौद्धिक क्षेत्रों में भी लागू होनी चाहिए। जसवंत सिहं को तो स्पष्टीकरण का अवसर भी नहीं दिया गया। अडवानी साहब तो पूछे जाने से ऊपर हैं ही। अंत में कहना चाहूंगा समाज संवेदनशील अवयवों से बना है एक भी अटपटा काम समाज में तरंगे पैदा करने के लिए काफ़ी है। चाहे राजनीति हो या साहित्य। राजनीति खुला खेल है उसकी प्रतिक्रिया समाज में तत्काल होती है। साहित्य शब्दों से घिरी दुनिया, जो धीरे धीरे खुलती है। खरोंचे वहां भी पड़ती हैं। एक समाचार पत्र में कवियों की तस्वीरों का कोलाज छपा था। एक छात्र ने मुझसे पूछा अंकल सुमित्रानंदन पंत की छोटी सी तस्वीर एक कोने में क्यों छपी है। पहले तो ये बहुत बड़े कवि माने जाते थे। मेरे पास इसका जवाब कुछ नहीं था। यह सब अनायास भी होता है पर किसी प्रगतिशील शीर्ष पुरुष का हिंदूवादी मंच पर जाकर बैठना भी क्या अनायास हो सकता है? इसका भी मेरे पास कोई उत्तर नहीं। वहां भी लोग चुप हैं।