Monday 6 April 2009

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सरकार समाज और देहदान
कानपुर में हरिद्वार से संचालित गायत्री केंद्र, शांति कुंज के एक कर्मठ कार्यकर्ता श्री सेंगर ने देहदान की योजना इस दृष्टि से चलाई की मेडिकल कालिजों के छात्रों को डिसेक्शन के लिए मानव देह नहीं मिलती इसलिए देहदान के लिए लोगों को तैयार किया जाए। आरंभ में कुछ कठिनाई अवश्य हुई लेकिन बाद में लोगों के सहयोग से देहदान के लिए लोग सहमति देने लगे। नगर के कुछ महत्तवपूर्ण लोगों के सामने शपथ पत्र भरवाते थे देहदानियों को सर्टिफ़िकेट वितरित करते थे। शहर के अनेक लोगों ने शपथ ली है अभी यह प्रक्रिया जारी है। अब तक जहां तक मुझे बताया गया गणेश शंकर मेडिकल कालिज, कानपुर को जो यू पी सरकार द्वरा संचालित है, 9 मृतदेह दान में मिल चुकी हैं।
किसी भी धर्म में इस प्रकार देहदान करना वर्जित है। वैसे भी देह के साथ अनेक अंधविश्वास और मोह माया जुड़े होते हैं। मनुष्य अपनी देह को जितना प्यार करता है वह किसी को नहीं करता। वह जिस तरह उसे पालता पोसता है वैसे शायद ही अपने बच्चों को पालता हो। उसके बावजूद जीते जी निस्पृह भाव से देहदान पत्र पर जीते जी हस्ताक्षर कर देना संत मानसिकता का प्रमाण है। एक दो ऐसे मामले भी सामने आए हैं कि मृत्यू के बाद पंडितों या परंपरावादी लोगों ने अपने संबंधियों की देह वापिस मांगी। दरअसल हम सबसे अधिक मृत्यु के अंधकार के पीछ क्या है इससे डरते हैं। सबसे बड़ा सवाल होता है सद्गति होगी नहीं। ख़ैर, यह जानना नहीं चाहते कि मृत्यु क्या है। ओशो जन्म और मृत्यु को उत्सव मानते थे। उनके शव को गा बजाकर समाधि दी गई थी।
कानपुर के डी ए वी कालिज हिंदी विभाग के वरिष्ठ सदस्य और हिंदी के नामी ग्रमी कवि डा. प्रतीक मिश्र का अभी दो सप्ताह पूर्व सहारनपुर एक साहित्यिक कार्यक्रम में जाते हुए शाहजहां पुर में संभवतः हृदय गति रुक जाने से रेल में देहावसान हो गया। उन्होंने अपनी देह पहले ही दान कर दी थी। उसके बारे में अपने परिवार को भी पहले से हिदायत दे दी थी। अतः परिवारों और इष्ट मित्रों नें देह लाकर कानपुर मेडिकल कालिज को दे दी। मैं भी उस समय वहां उपस्थित था। यह दुखद क्षण था। साहित्य जगत के काफ़ी लोग थे। हिंदी के अध्यापक चार छः थे, जबकि नगर में ही कम से कम बीस डिग्री कालिज होंगे।राजनीती के लोग तो ऐसे मामलों अनजान रहते हैं। जहां तक मुझे मालूम है देहदान का आरंभ सबसे पहले आई एन ए में रहीं लेफ्टिनेन्ट श्रीमती मानवती आर्या ने अपने पति की देह मेडिकल कालिज को दे कर की थी। उनके पति कानपुर के सम्मानित पत्रकार थे। वे अपने पति की इच्छा अनुसार अकेले ही उनकी देह एनाटॉनामी विभाग को सुपुर्द कर आई थीं। स्वयं भी जब कभी बाहर जाती हैं तो अपने गले में लिखकर लटका लेती हैं कि यदि उन्हें यात्रा में कुछ हो जाए तो उनकी देह निकटतम मेडिकल कालिज में बच्चों के अध्ययन हेतु देकर अमुक पते पर मेरे बेटों को सूचित कर दिया जाए। महिलाओं के संदर्भ में ऐसा करना और भी कठिन है।
देहदाता का परिवार तो अपना दायित्व बख़ूबी निबाह देता है। सरकार और समाज का भी दायित्व है कि वह उसके लिए अपने कालिजों संस्थाओं को निर्देश दे कि मृत देहों का उचित सम्मान हो। उनको प्राप्त करने का समुचित प्रबंध हो। मेडिकल के छात्र और उनके माता पिता लाखों रुपया शिक्षा पर खर्च करते हैं। मानवदेह के डिसेक्शन से ही पहले साल की शिक्षा आरंभ होती है। देह प्राप्त होना सबसे मुश्किल कार्य है। कीमती से कीमती एपरेटस बाज़ार से खरीदा जा सकता है पर मानवदेह मिलना मुश्किल होता जा रहा है। पहले लावारिस देह मेडिकल कालिजों को दे दी जाती थी। अब बेच लेते हैं जिससे उनके शरीर के हिस्से अधिक पैसे में बिक सकें और अच्छी कमाई हो जाय। सरकार को देहदानियों की देह के सम्मान का पूरा प्रबंध करना चाहिए। उनके कफ़न आदि का, उन्हें लाने ले जाने का। देह दानियों के नाम बाहर बोर्ड पर लिखे जाएं जिससे पता चले कि बच्चों की शिक्षा के लिए अमुक सन् में इन दानियों ने देह दान की। विभागाध्यक्ष या प्रचार्य स्वयं देह प्रप्त करें। जब तक देह का डिसेक्शन न हो देह को शीशे के केज में रखी जाए संबंधी आकर देखना चाहें तो देख सकें। हाल साफ़ सुथरे रखे जाएँ। जिस मेडिकल कालिज में प्रतीक जी की देह दी गई थी वहां चारों तरफ़ गंदगी थी। एक मेज़ पर ले जाकर रख दी गई थी। लोग चारों तरफ़ खड़े होकर कुछ देर तक अपनी श्रद्धांजलि देते रहे थे। अगर परिवार के सदस्यों के सामने उनकी देह को किसी उचित व्यवस्था के साथ संजो दिया जाए तो वे संतुष्टी के साथ विदा हों।
जो लोग अपने संस्कारों के खिलाफ़ जाकर ऐसा करते हैं वे देश सेवक और सेनानी हैं। वे अपने मानसिक बंधनों को तोड़ कर देह देश को अच्छे डाक्टर बनाने के लिए अपनी सबसे प्यारी निधि का जनहित में उत्सर्ग करते हैं। डाक्टरों को भी यह पता हो कि किस व्यक्ति की देह पर चाकू चलाकर उन्होंने मेडिकल के पाठ की पहली शिक्षा ली। जब कभी वे लालच में किसी मरीज़ की उपेक्षा करें तो उन्हें इस बात का स्मरण रहे। हो सकता है मरीज़ भी उसी देहदानी की श्रेणी का हो जिसकी देह के माध्यम से उन्होंने पहला पाठ पढ़ा।

गिरिराज किशोर, 11/210 सूटरगंज कानपुर, 208001
शब्द875

8 comments:

Abhishek Mishra said...

देहदान निश्चय ही सर्वोच्च दान है, इसलिए जो सुझाव आपने दिए उनपर अमल होना डॉक्टर और मरीजों के बिच सद्दभावना भी विकसित करेगा;और देह्दानियों के परिवार को भी संतुष्टि मिलेगी.

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

उत्प्रेरक लेख। अभी तो मेरे जैसे व्यक्ति का नेत्रदान, व अन्य अंगों को पुनरुपयोग के लिए देने की अपनी इच्छा को पूरी करने वाले सही और सरल माध्यम तक पहुँचना नहीं हो सका है। आम आदमी यदि ऐसा करना चाहे तो वह किस से, कहाँ, कैसे सम्पर्क करे आदि जानकारियाँ प्राप्त करना तक सर्व-सुगम नहीं है.उन पर अमल होने की प्रक्रिया में आने वाले ऐसे प्रसंग निस्सन्देह क्षोभकारी हैं।

देहदान के समय पहले से बिछोह के दु:ख में डूबे परिवारीजन कैसे अपने स्वर्गवासी सम्बन्धी का ऐसा निर्लज्ज अपमान देख सकते हैं भला! यह तो अन्यों को भी निरुत्साहित ही करने वाला व्यवहार है।

प्रतीक जी को श्रद्धान्जली।

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

इस लेख को कई मित्रों को अग्रेषित किया है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

सोचना पड़ेगा। मैं नेत्र दान को तो उचित मानता हूं; पर दाह-संस्कार के लिये कुछ न बचे - यह अभी मन में पैठा नहीं।

Bahadur Patel said...

vakai sir ,
bahut achchhi baat hai.
deh daan bahut jaruri hai.
hame logon ko prerit karana hoga.

Anonymous said...

giriraj ji, aapke blog se dr prateek mishra ke asamyik nidhan ka samachar mila.main unhen naam se to bahut dino se janta tha lekin mulakat 2008 july-aug mein jagarn ki patrika punarnava ke karyalaya mein hui.ve sri rajendra rao se milne aaye the.maine abudhabi se nikalne wali patrika nikat ke liye 2 geet maange.unhone mere pate par apne geet samay se bheje.nikat ke taja ank mein unke geet hain.patrika chhap gayee hai.mujhe afsos hai ki ve nikat mein apni kavita nahin dekh sake.main apni or se aur nikat parivar ki or se unke parivar aur mitron ke prati hardik shardhanjali
arpit karta hoon.
krishnabihari

गिरिराज किशोर said...

Yeh ek dookhad ghtna hai per Prerak bhi hai. Hum itna indhan jalate hain tarpan ke liye bhi sau karmkand karte hain. Pradushan to phelta hi hai. lekin deh daan ka nirnye bhi asan nahi. Apne sanskaron se mukt hona kathin hai.lekin chatron ko gyan daan bhi isme hai.
Apki shadhanjli ke liye dhanyavad.

प्रदीप कांत said...

उत्प्रेरक लेख।

यह ठीक है कि देह दान सवोच्च दान है पर सदियों के संस्कारों की जीवन संस्कृति के विरूद्ध जाने में अभी समय लगेगा।