Tuesday 28 April 2009

चुनाव और जनतंत्र
हर पांच साल मे ﴾यदि मिड टर्म न हो﴿ राजनीतिक पार्टियां अपने गिरहबान में झाकने के बजाय जनता को वोटर का दर्जा देकर उसका जायज़ा लेती हैं कि वह पांच साल में मूर्ख से कितना अक्लमंद हुई। वे चाहती हैं कि वोटर बैल ही बना हमारी गाड़ी खींचता रहे। उसे हर तरह से पटाते हैं कि वे उसके आससमान से तारे तोड़कर लाएंगे। एक पार्टी लगभग छः साल शासन में रही। वह पार्टी धर्म की पाबंद।गंगा गोदावरी और गऊ की गले तक भक्त। दूसरी ऐसी मज़दूरों और किसानों की तानाशाही कायम करने के लिए प्रतिबद्ध, अपने हिव्ज़ सिद्धांतों को बार बार दोहराने वाली, देश में बेरोजगाररों के ग्राफ़ को रटकर वोटर को बिना अपने घर की दुर्दशा बताए रिझाने वाली। तीसरी पार्टी के उस आश्वासान की प्रतीक्षा करते करते लोग थक गए कि वह दिन कब आएगा जब गरीबी हटेगी और अच्छे दिन आएंगे। पर वोटर इन आश्वासनों की धुंध के बीच से यथासामर्थ्य रास्ता बनाने की कोशिश करते हैं। मौक़ा मिलते ही पलट देते हैं। पार्टियें भी कम चालाक नहीं। वे अपना जाति का दाव फेंकती हैं। कुछ उसमें फंसते हैं। कुछ फंसने की कीमत चाहते हैं। वोटर जनतंत्र में भी परतंत्र है। धर्म का जाति का व्यवसाय का अंकुश उस पर रखा रहात है। वह वोट अवनी मर्ज़ी से नहीं दे सकता। चुनाव जनतंत्र में देश के लिए एक संस्कार की तरह होता जा रहा है। इसको प्रदूषित करना या होते देखना अपने में एक अपराध है।
गंगा को पवित्र मानते मानते मानते हमने उसे प्रदूषित कर दिया। आज पुष्पों की जगह उसमें मृत शरीर तैरते रहते हैं। उसी प्रकार चुनाव की इस वैतरणी में जिसे सामान्य मतदाता अपने मौलिक अधिकारों की संरक्षिका मानता है मरी हुई आत्मा वाले बाहूबलि अवरोध बने शिलाखंड बनकर अड़ जाते हैं। सब पार्टियां उनका और एक्टरों का सहारा लेती है। उस वैतरणी को प्रदूषित करते जाते हैं। इनकी संख्या हर बार बढ़ जाती है। प्रदूषण कम होने के बजाए कई गुना बढ जाता है। राजनीतिक पार्टियां इसके लिए ज़िम्म्दार हैं।कुछ कम कुछ ज़्यादा। दरअसल ये पार्टियां उनके माध्यम से मतदाताओं पर आतंक जमाती हैं। ठीक उसी तरह जैसे जल में पड़ा मगरमच्छ जलचरों पर ही नहीं तट पर पानी पीनेवाला राहगीर तक उसके आतंक का शिकार हो जाता है।
मतदता भी इसके लिए उत्तरदायी हैं। जब ये मगरमच्छ उनकी तरफ़ उनके अधिकारों का अधिग्रहण करने के लिए लपकते हैं तो उन्हें पछतावा होता कि हमने तो अपनी सुरक्षा के लिए इन्हें मेड़ समझा था ये तो फ़सल को रौंधने वाले वहशी जानवर हैं। अब क्या होता है जब चिड़ियन चुग गई खेत। खेत चुगवाने वाली वही पार्टियां हैं जो घोसल में भली बनी बैठी रहती हैं मौका मिलते ही उन दरिंदों के साथ हिस्सा बांटने फुर्र से उड़कर आ जाती हैं। मतदाता उन ठगों के बहकावे में आकर सब कुछ लुटा बैठता है। अगर पार्टियां उनकी ठेकेदार हैं तो मतदाता जो चुनाव के समय सबसे बड़ी शक्ति होता हैं अपने अधिकारों की दुर्गति करने के लिए क्यों तत्पर रहता हैं। अगर पार्टियों का दिया ज़हर खाना और दूसरों को खिलाना बंद कर दें तो पार्टियों को नसीहत मिलेगी और वे इस पाप से बचेंगे।
उनमें से कितने किस वर्ग से आते हैं। उनकी तकलीफ़ों और ज़रूरियात से कितना ताल्लुक है। जो पार्टियां जिस आधार को बनाकर चल रही थीं वे उनसे जुड़े मूल्यों तक से बेपरवाह हो जाती हैं। एक पार्टी राम गंगा और गऊ की बात करते करते 6 साल राज कर गई लेकिन सत्ता में रहते तीनों में से कोई भी याद नहीं आया। यहां तक कि उसने गंगा को न राष्ट्र नदी घोषित किया न विदेशों से करोड़ों रुपया लेने के बावजूद प्रदूषण में कोई अंतर किया। पिछली सरकार ने केवल इतना किया कि उसे राष्ट्र नदी घोषित कर दिया। वह भी कानपुर के गृहराज्य मंत्री के प्रयत्न से। चुनाव ऐसी शै है कि जिसने जो किया उसे भी नकार कर जीत का सुख पा लेते हैं। बाद में भले कुछ भी हो। चाहे तीसरी दुनिया के देश हों या पूंजीपति और साम्यवादी सब गरीबी को दूसरे देशों से मदद लेनी की सीढ़ी बनाए रहते हैं । कहीं कम या ज्यादा, कुंडली जमाए बैठी है। गरीबी किसी एक की बपौती नहीं लेकिन बंगाल में तीस साल एक सरकार रही वहां भी टस से मस नहीं हुई। उ प्र में सरकारें रहीं नेता करोड़पति होते गए। जनता का पैर ढका न पेट और न सिर। सवाल यह है कि जनता जागती क्यों नहीं। जनता को अपना दुख नहीं सालता तो न साले। पर दूसरे का काला धन भी नहीं सालता। हमारे नेता नया नया फारमूला ढूंढते रहते हैं किसी तरह सत्ता मिले। बाद की बाद में देखी जाएगी।
काले धन का शगूफ़ा छोड़ा गया है। विदेशों में भारतीयों का धन जमा है उसे ले आया जाय तो गरीबी का काल कट जाएगा। इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। प्रधानमंत्री इऩ वेटिंग का वादा उनकी प्रतीक्षा ख़त्म करा दो तो वे सारा रुपया 100 दिन में छकड़ों में नहीं तो जहाज़ों में भर लाएंगे। वुड बी साहब थोड़ी अवधि तो बढ़ा ही दीजिए। पहले भी एक प्रधानमंत्री ऐसा ही दाव लगा चुके हैं। कुछ तथ्य पर नज़र करने की इजाज़त चाहता हूं। देखिए आपसे ज़्यादा कौन जानता है कि पुर्तगाल से दाउद के चेले को भारत लाने में कितने पापड़ बेलने पड़े थे वहां भी आपकी सरकार को पुर्तगाल की सरकार को आश्वासन देना पड़ था कि उसे सज़ा ए मौत नहीं दी जाएगी। अब वही चुनाव लड़ रहा है। अब आपही बताएं स्वीटज़रलैंड के बैंकों में आपके देश का पैसा नहीं दूसरे देशों के लोग भी हैं वे भी पैसा रखे हैं वे क्या लाने देंगें। माननीय वे आपसे यह पूछेंगे अपने देश में आपने ब्लैक औरे बेनामी धन निकलवा लिया। 22 अप्रेल के हिंदू में दो मार्क्सवादी नेताओं के वक्तव्य छपे हैं कि एन डी ए सरकार के ज़माने में मारीशस रूट से भारत का मारमुलक का धन बाहर जाता था जब संसद में हवाला धन के संदर्भ में सवाल उठाया गया तो तत्कालीन अर्थ मंत्री के पास कोई जवाब नहीं था। वैसे भी उनके इस प्रयास के जवाब में स्वीटज़रलैंड के बैंकों के अध्यक्ष का जवाब छपा था कि 1-हम ईमानदार लोगों का धन रखते हैं। 2-हमारी सरकार का कोई ऐसा आदेश नहीं, हम अपने नियम से काम करेंगे। क्या किसी सरकार का क़ानून बदलवाना इतना आसान है। इस तरह के सवाल उठाना और झूठे आश्वासन दे कर जनता को बहकाना किसी भी पार्टी के लिए जनतंत्र को अपमानित करना है। सरकारें चाहे किसी की भी हों अपने कार्यकाल में जिन कामों को पीछे सरका देती हैं उन्हीं कामों के न करने का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ती हैं।
गांधी जी ने कहा था यह आज़ादी कांग्रेस के लिए नहीं आई देश के लिए है। लेकिन दुर्भाग्य है कि नेता लोग आज़ादी अपने लिए रखना चाहते हैं गुलामी दूसरों को बांट रहे हैं।

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