Monday 18 January 2010

ज्योति बाबू चले गए।

(1914-2010)

ज्योति बाबू का निधन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से एक दुखद घटना है। सी पी एम में वे हरिकृष्ण सुरजीत के जाने के बाद अकेले कद्दारवर नेता बचे थे जिनके पास देश की बढ़ोत्तरी क ब्ल्यू प्रिंट था। वे समर्पित कम्यूनिस्ट होने के बावजूद समन्व्य की अनवार्यता को भी महत्त्व देते थे। ज़रूरत पड़ती थी कट्टरपन से ऊपर उठकर मानवीय पक्ष का समर्थन करने से पीछे नहीं हटते थे। यह ठीक है कि उन्होंने बंगाल का मुख्यमंत्री रहते हुए सी पी एम की नीतियों को धार दी। लेकिन नानकम्यूनिस्ट वर्ग के साथ अन्याय भी नहीं हुआ। पर वे संभवतः कम्यूनिस्ट कैडर की तरह स्वतंत्र नहीं था। कैडर का वर्चस्व रहता था। उन लोगों को लगता था कि वे कैडर की बात को ही महत्त्व देते थे। बंगाल की आर्थिक उन्नति उनके लिए सर्वोपरि थी। उसके लिए पूंजी निवेश के प्रति दुराग्रही नहीं थे। सबसे बड़ा काम उन्होंने ज़मीन के पुनर्प्रबंधन का किया जिसके कारण किसानों को लाभ पहुंचा। उसी के दम पर सी पी एम आज तक गद्दीनशीन है। पंचायतों का जनतंत्रीकरण उन्हीं के काल में हुआ। सांप्रदायिक सदभाव को मज़बूत किया। लेकिन आज जिस प्रकार की राजनीति सी पी एम नेतृत्व कर रहा है वह ज्योतिबाबू की राजनीति से काफ़ी भिन्न है। यह ठीक है कि कम्युनिस्ट पार्टीज़ की नीति उनका पालितब्यूरो नियोजित करता है। लेकिन उनका व्यक्तित्व इस तरह का था कि पालितब्यूरो भी नीति निर्धारण के समय उनके दृष्टिकोण की कदर करने के लिए बाध्य हो जाता था। देश और उनके साथ पालितब्यूरो ने उस समय खुला अन्याय किया था जब सब पार्टीज़ उनके प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थी लेकिन तत्कालीन पार्टी सचिव या कहिए पालितब्यूरो तैयार नहीं हुआ था। सारा देश सकते में आ गया था। उनके स्थान पर एक अनुभवहीन व्यक्ति के नाम छींका छूट गया था। आज भी लोग उस क्षण को कोसते हैं कि अगर ज्योति बाबू प्रधानमंत्री हो जाते देश का इतिहास ही अलग होता।
दरअसल कम्यनिस्ट पार्टी कई बार एक ऐसे बच्चे के तरह व्यवहार करतीं हैं कि सिद्धान्त के नाम पर वे अपनी पसंद नापसंद को धीरे से क्रियान्वित करके सुर्ख़ रूह बन जाती हैं। बाद में सोचती हैं कि यह गलत हुआ पर स्वीकार नहीं करतीं। यही पिछले दिनों स्पीकर के सवाल पर यही हुआ। मुखर्जी साहब को पार्टी से निकाल दिया गया सिर्फ इसलिए सब जनतंत्रों में प्रचलित परंपरा के तहत उन्होंने कहा था कि स्पीकर किसी पार्टी का सदस्य नहीं रहता। इसलिए पार्टी के संयुक्त मंच से हट जाने पर स्पीकर का त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं। जब ज्योति बाबू को प्रधानमंत्री बनने देना सिद्धान्त विरुद्ध था तो स्पीकर बनने देना कैसे सिद्धांत के अंतरर्गत आ गया। सिद्धांत क्या शक्ल बदलने के साथ बदल जाते हैं। ज्योति बाबू का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए तो लाभकर था ही पार्टी का भी कम लाभ नहीं होता। दरअसल मुखर्जी साहब वरिष्ठतम व्यक्ति थे। योग्य भी। उनके पार्टी में बने रहने से हो सकता है कि वर्तमान पार्टी नेतृत्व को खतरा हो जाता। ज्योति बाबू एक वरिष्ठ सदस्य को इस तरह अपमानित करने के पक्ष में नहीं थे। मुखर्जी ने ठीक ही कहा मुझे लगा कि मेरे पिता की दूसरी बार मृत्यु हुई।
ज्योति बसु का चला जाना देश की राजनीति से एक अनुशासित, दूरअंदेश, संतुलित और दानिशमंद आदमी का चला जाना है। साहित्य जगत में भी उनकी अनुपस्थिति अनुभव की जाएगी।

1 comment:

निर्मला कपिला said...

ज्योति बाबू जी को हार्दिक श्रद्धाँजली