Tuesday 24 February 2009

साहित्य अकदेमी की फैलोशिप का मज़ाक

आज़ादी के बाद जो राष्ट्रीय संस्थाएं देश के नेताओं ने स्थापित की थीं वे आज छोटे छोटे स्वार्थो के साधन बन गई हैं। लोग अपनी अपनी आकांक्षाओं को पूरी करने के लिए इस्तेमाल करके अपने को बड़ा सावित करने में लगे हैं। हमारे देश के नायकों का स्वप्न रहा होगा कि इन संस्थाओं की सहायता से गुलामी से निकलकर आ रहे अपने देश को दूसरे देशों के मुकाबले में खड़ा कर सकें। उन संस्थाओं में ऐसे स्वनामधन्य लोगों को सौंप सकें जो अपने अपने क्षेत्रों में देश को शीर्ष पर ले जा सकें। उन लोगों के जाने के बाद क्या यह संभव हो सका? क्यों नहीं हो सका इस सवाल का जवाब शायद ही किसी के पास हो। जवाहरलाल का सपना था कि देश में ऐसी अकादमियां बनें जो संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रतिभाओं को देश के सामने ला सकें। इसी उद्येश्य से तकनीकी क्षेत्रों के अलावा कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में तीन अकादेमियाँ आरंभ कीं। साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष वे स्वयं बने। साहित्य अकादेमी उनकी भावनाओं के सबसे ज्यादा नज़दीक थी। उस समय के शीर्षस्थ रचनाकार और बुद्धिजीवी साहित्य अकादेमी के सबसे बड़े ख़ैरख्वाह और वास्तुकार थे। 12 मार्च 1954 को संसद के केंद्रिय हॉल में साहित्य अकादेमी का उदघाटन संपन्न हुआ। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और देश के पहले शिक्षा मंत्री ने अपने भाषण में कहा था कि ‘the akademi must lay down standard for those who seek to be recognized as distinguished men of letters. The Academi would serve its purpose only if its standard was set as high as possible.’
यहां मैं एक घटना का और उल्लेख करना चाहता हूं 1964 में जवाहर लाल नेहरू नहीं रहे तो मुल्कराज आनन्द ने प्रस्ताव रखा कि नेहरू मरणोपरान्त पहले फ़ैलो बनाए जाएं। कृष्णा कृपालानी ने सवाल किया अगर वे मरणोपरांत फैलो बनाए जा सकते हैं तो कालीदास व्यास वाल्मिकी क्यों नहीं हो सकते? फैलोशिप केवल उन्हीं जीवित लेखकों को प्रदान की जा सकती थी जो निर्विवाद रूप से लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हों। नेहरू ही नहीं बहुत से महान लेखक इसलिए फैलो नहीं बने क्योंकि वे जनरल काउन्सिल के सदस्य थे। साहित्य अकाडेमी के द्वारा प्रकाशित “five decades (A short History of Sahitya Academi” के पृ 20-21 पर उन महानुभवों के लगभग 24 यशस्वी नाम गिनाएं हैं जिन्होंने जनरल काउंन्सिल के सदस्य होने के कारण फैलो चुने जाने से इंकार कर दिया था। यह सही है कि नारंग साहब पूर्व अध्यक्ष, जनरल काउंसिल के सदस्य नहीं हैं। लेकिन वे सलाहाकार समिति की सदस्य से लेकर अध्यक्ष पद तक हरपद पर शोभायमान रहे। एक तरह से सिटिंग प्रेसिडेंट ही हैं। यहां तक कि दोबारा प्रेसिडेन्ट बनने की पूरी तैयारी कर ली थी। कहते हैं व्यक्तिगत स्तर पर और संबंधों के ज़रिए, एक राजीतिक पार्टी के ज़रिए अपने पक्ष के नाम जनरल काउंसिल की सदस्यता के लिए मंगवा लिए थे। अकादेमी के कुछ अधिकारी भी मिले थे। महाराष्ट्र की एक संस्था द्वारा लिखित शिकायत अकादेमी को भेजी गई थी। एक बार जब पाकिस्तान की यात्रा में जाने के लिए उपाध्यक्ष ने रुचि दिखाई थी तो अध्यक्ष महोदय ने सलाह दी थी। इंसान को कुछ तो छोड़ना सीखना चाहिए। काश ऐसा हो पाता। दरअसल इंसान की ज़रूरत तो पूरी हो जाती है पर लिप्सा कभी पूरी नहीं होती।
अगर भारत सरकार ने आख़री क्षण हस्तक्षेप न किया होता तो नेहऱू और और सुनीति बाबू की तरह दूसरी बार भी पूर्व अध्यक्ष दूसरी बार अध्यक्ष बने गए होते । वासुदेवन नायर को तीन या चार वोटो से हराकर सुनील दा जैसे व्यक्ति को अध्यक्ष न बनवाते। उनके बारे में उन्होंने कभी सम्मानजनक ढंग से बात नहीं की। लेकिन एक सिद्धांत प्रिय व्यक्ति के मुक़ाबले ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष न बनने देते जिसके सामने संस्था का हित बड़ा न हो। संस्था ने स्वीकार किया है कि प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट ने अपने कार्य काल में सचिव से मिलकर, अकादेमी के चार चार लाख रूपए लगाकर अपने घुटने बदलवाए। संभवतः सरकार ने वेतन भोगी कर्मचारियों के लिए तो मैडिकल क्लेम का प्रावधान किया है लेकिन विधायकों के अलावा इस तरह के नियम नहीं हैं जहां जन सेवा के लिए चुनाव होते हों। साहित्य अकादेमी के 50 वर्ष के इतिहास में यह पहला उदाहारण है जब प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट के अकादेमी के खर्च पर बिना बजट प्राविज़न के इतने बड़े आपरेशन संपन्न हुए हों और खर्च अकादेमी ने वहन किया हो। यह अकेली ऐसी घटना है जहां व्यक्तिगत हित में सचिव को मिलाकर जन धन का दुरुपयोग किया गया है। अगर शासन अपनी साख बचाने की इच्छुक होती तो कम से कम नया अध्यक्ष और फैलो चुनने से पहले कम स कम पूर्व और वर्तमान अधयक्षों द्वारा जन धन के अपने ऊपर किए गए आर्थिक अपव्यय के बारे में जांच तो कराती।

9 comments:

विष्णु बैरागी said...

आपने जो कुछ बताया उसका अर्थ यही कि अकादमी केवल साहित्यिक सहायता ही नहीं करती, घुटनों के बन चलने में अक्षम हो चुके लोगों को अपने पैरों खडा भी करती है।

विशेष अनुरोध - कृपया अपने ब्‍लाग से वर्ड वेरीफिकेशन की व्‍यवस्‍था अविलम्‍ब समाप्‍त करें। आप चाहें तो 'कमेण्‍ट माडरेशन' की व्‍यवस्‍था अपना लें।

अफ़लातून said...

जन्म का साल ठीक कर लें !

गिरिराज किशोर said...

Khada to hona her admi chahata hai. Sawal hai kis mulya per.ap ko sujhav mahatpurn hai, word verification ke bat mai janne ki koshish karunga. dhanyavad

गिरिराज किशोर said...

aflatoon ji, aap kaise hain. aap ka sujhav to theek hai do 9 se pathak ho sakta hai galtee ko maf kar de

Arvind Mishra said...

गिरिराज जी क्या यही अब युग धर्म है ?

watchdog said...

आदरणीय गिरिराज जी
आपने बिल्कुल सही कहा. वास्तव मे कोई भी सरकारी संस्था शायद इसी अंजाम तक पहुचती है. स्थापना के समय जो आदर्श रखे जाते हैं, कुछ ही समय उपरान्त पता नही कहाँ विलीन हो जाते हैं. सच तो यही है कि फाइन आर्ट्स से संबंधित सभी रचनाधर्मियो को अपनी शुचिता बचाए रखने के लिए राज्याश्रय स्वीकार कतई नही करना चाहिए. जीने के लिए कुछ तो करना ही है पर स्वतंत्र रचना त्याग चाहती है. आप स्वयं IIT मे रह कर देख चुके है. शायद आपका अनुभव इतना बुरा नही था. पर आम तौर पर शायद हम सभी थोड़ी मानवीय कमज़ोरियों से कभी ना कभी हार ही जाते हैं.

गिरिराज किशोर said...

mai to hindi ke liye char varsh lada. Hindi ke log apne swarth ko pyar karna jante hain. Ab bahar ke log yadi avaz uthayen to akademi bach jaye.

Anonymous said...

aapaki chinta jayaj hai sahitya academy ko bachana behad jaruri kam hai. mera anurodh hai ki sahitya academy naye aur sahitya ke prati jimmedar hathon ke supurd ki jana chahiye .
aap cafi sinior hain isake liye pahal kar mahol bhi tair kar sakate hain.
mere sujhav se is mahatvpurn sansthan ko sambhalane ke liye aacharya kamalaprasad pandey ji urf comander , rajendra yadav urf bhartiya lekhikaon ke janmdata aur sanvrakshak khaskar yuva aur maldaar lekhikayen ke prati samrpit, hindi sahitya ko nai gahrai me le jane vale ravindra kaliya behad hudakchullu type ke sahitya me kho-kho khelane me mahir aur yuva kahanikaron ko (har aadami aurat ko hi pasand kare yah jaruri nahin hai kuchh ladakon ke bhi shokin hote hai)jaise logon ko sahitya academi supurd kar dena chahiye.
asal me sahitya academy ya kendriya hindi sansthan agra jaise sansthan hai hi sahity ke dalal aur bhadavon ke liye.
yadi kamlaprasad bane to unhone jaise ken. hindi san.agra ki kbra khodi vese hi sahity aca. ki bhi khod denge le kin isame vandana rag ka bhala ho sakata hai unhen academy ka award mil jayega .halanki is sambandh me aap kamla ji se masvira karen to unake hal-chal jaroor puchh lena kyonki kuchh din pahale ajay singh(purv sanskriti mantri) ke bangale me unake saath pine me thodi jyada aa gai thi . der raat me bangale se nikalate vakt sidhiyon se phisal pade vahin unako sleepdisk ho gaya.jab tak unaka swasthya thik nahin hota tab tak unke hanuman urf janretor kam sambhalenge .
rajendra ji ka hans feb. ank padhakar gyat hua ke ab unaki nas-nas me bal pad gaye hain.nason ke bhitar rakt ka pravah bahut hi dhima aur thanda hao gaya hai(unake house made se pata chalata hai ki bahurashtriy companyon ka tel jo nason me khun ke prawah ka tej banaye rakhata hai. dr. ki salah se ek bp ki goli aur ek viyagara subah sham niyamit lete hain) agar unahone sahitya academy sambhali to istri-purush ke lengik sambandhon ki behatreen vyakhya kar aur kam yog ki mahtvpurn shikshika , aur desh ki atynt mahatpurn aur sexi kahanikar ko sahitya academi award diya ja sakega.
ravindra kaliya ji ko mamata ladkiyon ki taraf nahin takane deti isliye ve ek japani tel ki botal aur kanal ko sath rakhate hain. kunal ko bhi sahitya academy milana chahiye.
to aap chinta na karen desh ke paas sahitya academy ko sambhalne ke liye kai naam aur hain.
-comrad hanuman

गिरिराज किशोर said...

aap sab ko lagna padega. mantri ko likhen. sath hi lakhon rupye vyaktigat ilaj per karch hua hai us ke liye president vice president secretary zimmedar hain