Sunday 4 January 2009

JANTA KO SAWAL PUCHNE KI ADAT DALNI HOGI

जनता को सवाल पूछने की आदत डालनी होगी

आप क्या चाहते हैं यह आप भी नहीं जानते। आपने अपने से पूछा कि आप क्या चाहते हैं या हवा का रूख़ देखा और राय पर राय देनी शुऱू कर दी। आप मारना चाह सकते हैं पर मरना नहीं चाहेंगे। उसमें अपनी जान जाती है। यह प्रक्रिया अपने आप में बड़ी भयानक है। कहना आसान है, मरना मुश्किल। हम जान दे देंगे, हम देश भक्त हैं। लेकिन क्या जान ही अकेली जाती है। जान के साथ बहुत कुछ जाता है। क्या क्या जाता है इसकी सूची किसी के पास नहीं। पिछले माह 26 नवंबर को मुंबई पर सबसे बड़ा हमला हुआ था। मुंबई पर नहीं पूरे देश पर। जैसे किसी ज़माने में दुश्मन कहो या लुटेरे लाव लश्कर के साथ कभी रेगिस्तान से आते थे या समुद्र से आकर हमला बोल देते थे। बाबर के साथ तो चंद घुड़ सवार थे। क्लाइव के भी कुछ सिपाहियों और घुड़सवारों ने नवाब की पूरी सेना चंद घंटों में हरा दी थी। यहां तो पड़ौसी मुल्क से दस आतंकवादी समुद्री रास्ते से आए और कुछ समय के लिए पूरे मुंबई को बंधक बना लिया। हम नाराज़ हैं हमारे इतने बड़े देश की गरिमा को पड़ौसी देश के आंकवादियों ने चोट पहुंचाई। नाराज़ होना वाजिब है। पर क्या हम अपने आपसे भी नाराज़ हैं। हमने अपने आप से पूछा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। शायद अपने आपसे पूछना हमारी आदत में शुमार नहीं। हमने कभी पूछा ही नहीं। इतने हमले हुए। अंदर से, बाहर से। कभी किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं की गई। सब तू तू मैं मैं में निकल गई। सोमनाथ के मंदिर से लेकर बाबरी मस्जिद तक, इधर संसद और अक्षरधाम से लेकर मुंबई पर हुए हमलों तक। सब तू तू मैं मैं में गुज़र गया। जो मर जाते हैं उन्हें शहीद बना दिया जाता है जो बच जाते हैं वे निर्दोष भी और योद्धा भी उनसे कोई नहीं पूछता मरनेवाले कैसे मर गए, तुम कैसे बच गए। सबसे पहले तो यही सवाल उठता यह सब हो कैसे गया। ये सवाल न नेता से पूछे जाते हैं और न नौकरशाह से। चीन से हारने के बाद भी जिम्मेदारी किस ने ली। न किसी को दी गई। सब दूध के धुले। हम इतने महान कैसे हो गए कि न साहू को बख्शिश और न दोषी को दंड।
ठीक है हम पर हमला किया गया। हमारा नुकसान हुआ। हमला हमारी कमज़ोरी का नतीजा भी था। उस कमज़ोरी का कारण हमारी अंतर कलह भी हैं। ताड़ने वाले कयामत की नज़र रखते हैं। उदाहरण के लिए हम धर्म परिवर्तन के लिए दूसरे लोगों को दोषी मानते हैं लेकिन अपने धर्म को परिवर्तन मुक्त करने की दिशा में कुछ नहीं करना चाहते। लकीर पीट रहे हैं। सांप के निकल जाने पर हमें कोई आपत्ति नहीं, बस लकीर न छोड़े। जब सत्ता के केंद्र संसद पर हमला हुआ था उस वक्त भी यही सब हुआ था। इस बार मुंबई पर हुए हमले ने जनता पर चोट की है। सी एस टी पर बेगुनाह लोग मारे गए। ओबेराय और ताज होटलों में विदेशी टूरिस्ट और साधन संपन्न लोग मारे गए। लेकिन जनता का गुस्सा उन लोगों को लेकर ज्या़दा है जो अनपहचाने चले गए। उसी ने लोगों को जोड़ा। दबाव बनाया। इस देश का मनोविज्ञान है कि उपेक्षित और पीड़ित लोगों के साथ सहानुभूति सक्रियता के साथ उत्पन्न होती है। प्रतिक्रिया भी प्रभावी होती है। वैसे संसद पर हुए हमले के कारण जन आक्रोश तो था लेकिन सहानुभूति की सक्रियता अपेक्षाकृत कम थी। प्रतीक पर हमला सम्मान को आहत करता है जन पर होने वाला हमला संवेदना को ज़ख्मी करता है। मुंबई पर हुए हमले ने बहुत कुछ बदला। उस सरकार के गृहमंत्री को न तो त्यागपत्र देने की बाध्यता का सामना करना पड़ा और न किसी सरकारी ढांचे में बदलाव की बाध्यता महसूस हुई। सब पूर्ववत चलता रहा। इस सरकार को मंदी के साथ इस संकट का सामना करना पड़ रहा है। पैकेज देकर मंदी के इस आलम में आर्थिक स्थिति को सामान्य बनाए रखने की चुनौती है। शायद उसी का नतीजा है कि मुद्रास्फीति में गिरावट आई है। तीन हफ़्ते में आतंकवाद रोकने के लिए कानून भी बनाए गए। इंटरनेशनल स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ़ वातावरण बनाया जा रहा है। राजनीति काम के सामने कमज़ोर पड़ने लगत है। सवाल है सरकार के ऊपर यह दबाव कब तक बना रहेगा। जनता का दबाव दिल से उपजता है राजनीति का दबाव वक्ती होता, मौका परस्ती का। जनता के जुड़ते ही नक्शा बदल गया। किसी ने किसी से नहीं कहा। इंसानी तारबरकी स्वतः चालू हो गई। कश्मीर तक बदल गया। 26 दिसंबर को मैं मुंबई में था। लोग हमले का महीना मना रहे थे। किसी के मन में किसी के प्रति बैर या गुस्सा नहीं था। 60 साल में जनता ने क्यों और कैसे का जवाब खोजना सीख लिया। यह जनता की परिपक्वता का प्रमाण है। अगले दिन हम लोग पहले ओबेराय में चाय पीने गए। वहां लगा जैसे कहीं कुछ नहीं हुआ हो। पूछने पर एक कारकून ने कहा। हमारी भी गलती थी हम सरकार के दम पर हाथ छोडकर गाड़ी चला रहे थे। धोखा खा गए। औंधे मुंह गिर पड़े। कोशिश करेंगे दोबारा ऐसा न हो। ताज होटल गए। दसवी क्लास के दिनों में लड़कों के साथ टूर में बंबई गया था। तब ताजमहल की तरह ताज होटल भी बंबई की शान का प्रतीक था। हम दो तीन लड़के ताज में चाय पीने गए थे। महीनों गाते फिरे थे ताज में चाय पिए हुए हैं। वे साथी चकित होते थे जिन्होंने उसके बारे में सुन रखा था जो नहीं जानते थे वे करेक्शन करने की कोशिश करते थे ताज बंबई में नहीं आगरा में है। ख़ैर, जब ताज पहुंचे तो चारों तरफ़ सिक्योरिटी पड़ी थी। गाड़ियां तो जाने ही नहीं दी जा रही थी। हमसे पूछा गया आपका रिज़र्वेशन है। हमने कहा नहीं। उसने रास्ता दिखा दिया। रत्न जी टाटा ने कहा था कि हम अपनी सुरक्षा आप करेंगे। सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां सुरक्षा इतनी तगड़ी थी कि सरकारी ज़मीन तक पर चलने की मनाई थी। ओबेराय में सब खुला था। उनकी आवाज़ में जनता का सा आत्मविश्वास था। यहां पर आत्मनिर्भरता की घोषणा के बावजूद परनिर्भरता थी। लेकिन एक संदेश जो ओबेराय में सुनने को मिला था उसमें जनता की उस इच्छा का प्रतिबिंब था जिसके ज़रिए हमले के बाद बिना कुछ कहे सब कुछ कह दिया था। भारतीय जनता की परिपक्वता का यह भी एक प्रमाण है कि इतना सब हो जाने के बाद लड़ने को अनावश्यक समझती है। प्रधानमंत्री ने भी लड़ाई की संभावना को नकारा है। सबसे पहली ज़रूरत है आर्थिक स्थायित्व की। यहां की जनता ने इस मंदी के दौरान इसके महत्व तो समझा है। उस स्थायित्व के पीछे सामान्य जन हैं। अगर लड़ाई होती है यह दो देशों तक ही सीमित नहीं रहेगी सारा एशिया आर्थिक संकट की चपेट में आ जाएगा। सब समीकरण बदल जाएंगे। आधार होगा राजनीतिक हित। इसलिए डिप्लोमेसी के द्वारा ही इस संकट से निबटा जा सकता है।
कुल मिलाकर जनमानस को अपने निर्णय स्वयं लेने की आदत डालनी होगी। निर्णय ही लेना काफ़ी नहीं होगा उसे उन हुक्मरानों के कानों तक भी पहुंचाना होगा जो उसे क्रियान्वित करने के लिए ज़िम्मेदार बनाए गए हैं। उसे हुक्मरानों से सवाल पूछने की मानिकता भी विकसित करनी होगी। वरना निर्णय कहीं लिया जाएगा और भुगतेगा कोई और यानी हम और वो।
गिरिराज किशोर, 11-210, सूटरगंज, कानपुर -1


जनता को सवाल पूछने की आदत डालनी होगी

आप क्या चाहते हैं यह आप भी नहीं जानते। आपने अपने से पूछा कि आप क्या चाहते हैं या हवा का रूख़ देखा और राय पर राय देनी शुऱू कर दी। आप मारना चाह सकते हैं पर मरना नहीं चाहेंगे। उसमें अपनी जान जाती है। यह प्रक्रिया अपने आप में बड़ी भयानक है। कहना आसान है, मरना मुश्किल। हम जान दे देंगे, हम देश भक्त हैं। लेकिन क्या जान ही अकेली जाती है। जान के साथ बहुत कुछ जाता है। क्या क्या जाता है इसकी सूची किसी के पास नहीं। पिछले माह 26 नवंबर को मुंबई पर सबसे बड़ा हमला हुआ था। मुंबई पर नहीं पूरे देश पर। जैसे किसी ज़माने में दुश्मन कहो या लुटेरे लाव लश्कर के साथ कभी रेगिस्तान से आते थे या समुद्र से आकर हमला बोल देते थे। बाबर के साथ तो चंद घुड़ सवार थे। क्लाइव के भी कुछ सिपाहियों और घुड़सवारों ने नवाब की पूरी सेना चंद घंटों में हरा दी थी। यहां तो पड़ौसी मुल्क से दस आतंकवादी समुद्री रास्ते से आए और कुछ समय के लिए पूरे मुंबई को बंधक बना लिया। हम नाराज़ हैं हमारे इतने बड़े देश की गरिमा को पड़ौसी देश के आंकवादियों ने चोट पहुंचाई। नाराज़ होना वाजिब है। पर क्या हम अपने आपसे भी नाराज़ हैं। हमने अपने आप से पूछा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। शायद अपने आपसे पूछना हमारी आदत में शुमार नहीं। हमने कभी पूछा ही नहीं। इतने हमले हुए। अंदर से, बाहर से। कभी किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं की गई। सब तू तू मैं मैं में निकल गई। सोमनाथ के मंदिर से लेकर बाबरी मस्जिद तक, इधर संसद और अक्षरधाम से लेकर मुंबई पर हुए हमलों तक। सब तू तू मैं मैं में गुज़र गया। जो मर जाते हैं उन्हें शहीद बना दिया जाता है जो बच जाते हैं वे निर्दोष भी और योद्धा भी उनसे कोई नहीं पूछता मरनेवाले कैसे मर गए, तुम कैसे बच गए। सबसे पहले तो यही सवाल उठता यह सब हो कैसे गया। ये सवाल न नेता से पूछे जाते हैं और न नौकरशाह से। चीन से हारने के बाद भी जिम्मेदारी किस ने ली। न किसी को दी गई। सब दूध के धुले। हम इतने महान कैसे हो गए कि न साहू को बख्शिश और न दोषी को दंड।
ठीक है हम पर हमला किया गया। हमारा नुकसान हुआ। हमला हमारी कमज़ोरी का नतीजा भी था। उस कमज़ोरी का कारण हमारी अंतर कलह भी हैं। ताड़ने वाले कयामत की नज़र रखते हैं। उदाहरण के लिए हम धर्म परिवर्तन के लिए दूसरे लोगों को दोषी मानते हैं लेकिन अपने धर्म को परिवर्तन मुक्त करने की दिशा में कुछ नहीं करना चाहते। लकीर पीट रहे हैं। सांप के निकल जाने पर हमें कोई आपत्ति नहीं, बस लकीर न छोड़े। जब सत्ता के केंद्र संसद पर हमला हुआ था उस वक्त भी यही सब हुआ था। इस बार मुंबई पर हुए हमले ने जनता पर चोट की है। सी एस टी पर बेगुनाह लोग मारे गए। ओबेराय और ताज होटलों में विदेशी टूरिस्ट और साधन संपन्न लोग मारे गए। लेकिन जनता का गुस्सा उन लोगों को लेकर ज्या़दा है जो अनपहचाने चले गए। उसी ने लोगों को जोड़ा। दबाव बनाया। इस देश का मनोविज्ञान है कि उपेक्षित और पीड़ित लोगों के साथ सहानुभूति सक्रियता के साथ उत्पन्न होती है। प्रतिक्रिया भी प्रभावी होती है। वैसे संसद पर हुए हमले के कारण जन आक्रोश तो था लेकिन सहानुभूति की सक्रियता अपेक्षाकृत कम थी। प्रतीक पर हमला सम्मान को आहत करता है जन पर होने वाला हमला संवेदना को ज़ख्मी करता है। मुंबई पर हुए हमले ने बहुत कुछ बदला। उस सरकार के गृहमंत्री को न तो त्यागपत्र देने की बाध्यता का सामना करना पड़ा और न किसी सरकारी ढांचे में बदलाव की बाध्यता महसूस हुई। सब पूर्ववत चलता रहा। इस सरकार को मंदी के साथ इस संकट का सामना करना पड़ रहा है। पैकेज देकर मंदी के इस आलम में आर्थिक स्थिति को सामान्य बनाए रखने की चुनौती है। शायद उसी का नतीजा है कि मुद्रास्फीति में गिरावट आई है। तीन हफ़्ते में आतंकवाद रोकने के लिए कानून भी बनाए गए। इंटरनेशनल स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ़ वातावरण बनाया जा रहा है। राजनीति काम के सामने कमज़ोर पड़ने लगत है। सवाल है सरकार के ऊपर यह दबाव कब तक बना रहेगा। जनता का दबाव दिल से उपजता है राजनीति का दबाव वक्ती होता, मौका परस्ती का। जनता के जुड़ते ही नक्शा बदल गया। किसी ने किसी से नहीं कहा। इंसानी तारबरकी स्वतः चालू हो गई। कश्मीर तक बदल गया। 26 दिसंबर को मैं मुंबई में था। लोग हमले का महीना मना रहे थे। किसी के मन में किसी के प्रति बैर या गुस्सा नहीं था। 60 साल में जनता ने क्यों और कैसे का जवाब खोजना सीख लिया। यह जनता की परिपक्वता का प्रमाण है। अगले दिन हम लोग पहले ओबेराय में चाय पीने गए। वहां लगा जैसे कहीं कुछ नहीं हुआ हो। पूछने पर एक कारकून ने कहा। हमारी भी गलती थी हम सरकार के दम पर हाथ छोडकर गाड़ी चला रहे थे। धोखा खा गए। औंधे मुंह गिर पड़े। कोशिश करेंगे दोबारा ऐसा न हो। ताज होटल गए। दसवी क्लास के दिनों में लड़कों के साथ टूर में बंबई गया था। तब ताजमहल की तरह ताज होटल भी बंबई की शान का प्रतीक था। हम दो तीन लड़के ताज में चाय पीने गए थे। महीनों गाते फिरे थे ताज में चाय पिए हुए हैं। वे साथी चकित होते थे जिन्होंने उसके बारे में सुन रखा था जो नहीं जानते थे वे करेक्शन करने की कोशिश करते थे ताज बंबई में नहीं आगरा में है। ख़ैर, जब ताज पहुंचे तो चारों तरफ़ सिक्योरिटी पड़ी थी। गाड़ियां तो जाने ही नहीं दी जा रही थी। हमसे पूछा गया आपका रिज़र्वेशन है। हमने कहा नहीं। उसने रास्ता दिखा दिया। रत्न जी टाटा ने कहा था कि हम अपनी सुरक्षा आप करेंगे। सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां सुरक्षा इतनी तगड़ी थी कि सरकारी ज़मीन तक पर चलने की मनाई थी। ओबेराय में सब खुला था। उनकी आवाज़ में जनता का सा आत्मविश्वास था। यहां पर आत्मनिर्भरता की घोषणा के बावजूद परनिर्भरता थी। लेकिन एक संदेश जो ओबेराय में सुनने को मिला था उसमें जनता की उस इच्छा का प्रतिबिंब था जिसके ज़रिए हमले के बाद बिना कुछ कहे सब कुछ कह दिया था। भारतीय जनता की परिपक्वता का यह भी एक प्रमाण है कि इतना सब हो जाने के बाद लड़ने को अनावश्यक समझती है। प्रधानमंत्री ने भी लड़ाई की संभावना को नकारा है। सबसे पहली ज़रूरत है आर्थिक स्थायित्व की। यहां की जनता ने इस मंदी के दौरान इसके महत्व तो समझा है। उस स्थायित्व के पीछे सामान्य जन हैं। अगर लड़ाई होती है यह दो देशों तक ही सीमित नहीं रहेगी सारा एशिया आर्थिक संकट की चपेट में आ जाएगा। सब समीकरण बदल जाएंगे। आधार होगा राजनीतिक हित। इसलिए डिप्लोमेसी के द्वारा ही इस संकट से निबटा जा सकता है।
कुल मिलाकर जनमानस को अपने निर्णय स्वयं लेने की आदत डालनी होगी। निर्णय ही लेना काफ़ी नहीं होगा उसे उन हुक्मरानों के कानों तक भी पहुंचाना होगा जो उसे क्रियान्वित करने के लिए ज़िम्मेदार बनाए गए हैं। उसे हुक्मरानों से सवाल पूछने की मानिकता भी विकसित करनी होगी। वरना निर्णय कहीं लिया जाएगा और भुगतेगा कोई और यानी हम और वो।
गिरिराज किशोर, 11-210, सूटरगंज, कानपुर -1


जनता को सवाल पूछने की आदत डालनी होगी

आप क्या चाहते हैं यह आप भी नहीं जानते। आपने अपने से पूछा कि आप क्या चाहते हैं या हवा का रूख़ देखा और राय पर राय देनी शुऱू कर दी। आप मारना चाह सकते हैं पर मरना नहीं चाहेंगे। उसमें अपनी जान जाती है। यह प्रक्रिया अपने आप में बड़ी भयानक है। कहना आसान है, मरना मुश्किल। हम जान दे देंगे, हम देश भक्त हैं। लेकिन क्या जान ही अकेली जाती है। जान के साथ बहुत कुछ जाता है। क्या क्या जाता है इसकी सूची किसी के पास नहीं। पिछले माह 26 नवंबर को मुंबई पर सबसे बड़ा हमला हुआ था। मुंबई पर नहीं पूरे देश पर। जैसे किसी ज़माने में दुश्मन कहो या लुटेरे लाव लश्कर के साथ कभी रेगिस्तान से आते थे या समुद्र से आकर हमला बोल देते थे। बाबर के साथ तो चंद घुड़ सवार थे। क्लाइव के भी कुछ सिपाहियों और घुड़सवारों ने नवाब की पूरी सेना चंद घंटों में हरा दी थी। यहां तो पड़ौसी मुल्क से दस आतंकवादी समुद्री रास्ते से आए और कुछ समय के लिए पूरे मुंबई को बंधक बना लिया। हम नाराज़ हैं हमारे इतने बड़े देश की गरिमा को पड़ौसी देश के आंकवादियों ने चोट पहुंचाई। नाराज़ होना वाजिब है। पर क्या हम अपने आपसे भी नाराज़ हैं। हमने अपने आप से पूछा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। शायद अपने आपसे पूछना हमारी आदत में शुमार नहीं। हमने कभी पूछा ही नहीं। इतने हमले हुए। अंदर से, बाहर से। कभी किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं की गई। सब तू तू मैं मैं में निकल गई। सोमनाथ के मंदिर से लेकर बाबरी मस्जिद तक, इधर संसद और अक्षरधाम से लेकर मुंबई पर हुए हमलों तक। सब तू तू मैं मैं में गुज़र गया। जो मर जाते हैं उन्हें शहीद बना दिया जाता है जो बच जाते हैं वे निर्दोष भी और योद्धा भी उनसे कोई नहीं पूछता मरनेवाले कैसे मर गए, तुम कैसे बच गए। सबसे पहले तो यही सवाल उठता यह सब हो कैसे गया। ये सवाल न नेता से पूछे जाते हैं और न नौकरशाह से। चीन से हारने के बाद भी जिम्मेदारी किस ने ली। न किसी को दी गई। सब दूध के धुले। हम इतने महान कैसे हो गए कि न साहू को बख्शिश और न दोषी को दंड।
ठीक है हम पर हमला किया गया। हमारा नुकसान हुआ। हमला हमारी कमज़ोरी का नतीजा भी था। उस कमज़ोरी का कारण हमारी अंतर कलह भी हैं। ताड़ने वाले कयामत की नज़र रखते हैं। उदाहरण के लिए हम धर्म परिवर्तन के लिए दूसरे लोगों को दोषी मानते हैं लेकिन अपने धर्म को परिवर्तन मुक्त करने की दिशा में कुछ नहीं करना चाहते। लकीर पीट रहे हैं। सांप के निकल जाने पर हमें कोई आपत्ति नहीं, बस लकीर न छोड़े। जब सत्ता के केंद्र संसद पर हमला हुआ था उस वक्त भी यही सब हुआ था। इस बार मुंबई पर हुए हमले ने जनता पर चोट की है। सी एस टी पर बेगुनाह लोग मारे गए। ओबेराय और ताज होटलों में विदेशी टूरिस्ट और साधन संपन्न लोग मारे गए। लेकिन जनता का गुस्सा उन लोगों को लेकर ज्या़दा है जो अनपहचाने चले गए। उसी ने लोगों को जोड़ा। दबाव बनाया। इस देश का मनोविज्ञान है कि उपेक्षित और पीड़ित लोगों के साथ सहानुभूति सक्रियता के साथ उत्पन्न होती है। प्रतिक्रिया भी प्रभावी होती है। वैसे संसद पर हुए हमले के कारण जन आक्रोश तो था लेकिन सहानुभूति की सक्रियता अपेक्षाकृत कम थी। प्रतीक पर हमला सम्मान को आहत करता है जन पर होने वाला हमला संवेदना को ज़ख्मी करता है। मुंबई पर हुए हमले ने बहुत कुछ बदला। उस सरकार के गृहमंत्री को न तो त्यागपत्र देने की बाध्यता का सामना करना पड़ा और न किसी सरकारी ढांचे में बदलाव की बाध्यता महसूस हुई। सब पूर्ववत चलता रहा। इस सरकार को मंदी के साथ इस संकट का सामना करना पड़ रहा है। पैकेज देकर मंदी के इस आलम में आर्थिक स्थिति को सामान्य बनाए रखने की चुनौती है। शायद उसी का नतीजा है कि मुद्रास्फीति में गिरावट आई है। तीन हफ़्ते में आतंकवाद रोकने के लिए कानून भी बनाए गए। इंटरनेशनल स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ़ वातावरण बनाया जा रहा है। राजनीति काम के सामने कमज़ोर पड़ने लगत है। सवाल है सरकार के ऊपर यह दबाव कब तक बना रहेगा। जनता का दबाव दिल से उपजता है राजनीति का दबाव वक्ती होता, मौका परस्ती का। जनता के जुड़ते ही नक्शा बदल गया। किसी ने किसी से नहीं कहा। इंसानी तारबरकी स्वतः चालू हो गई। कश्मीर तक बदल गया। 26 दिसंबर को मैं मुंबई में था। लोग हमले का महीना मना रहे थे। किसी के मन में किसी के प्रति बैर या गुस्सा नहीं था। 60 साल में जनता ने क्यों और कैसे का जवाब खोजना सीख लिया। यह जनता की परिपक्वता का प्रमाण है। अगले दिन हम लोग पहले ओबेराय में चाय पीने गए। वहां लगा जैसे कहीं कुछ नहीं हुआ हो। पूछने पर एक कारकून ने कहा। हमारी भी गलती थी हम सरकार के दम पर हाथ छोडकर गाड़ी चला रहे थे। धोखा खा गए। औंधे मुंह गिर पड़े। कोशिश करेंगे दोबारा ऐसा न हो। ताज होटल गए। दसवी क्लास के दिनों में लड़कों के साथ टूर में बंबई गया था। तब ताजमहल की तरह ताज होटल भी बंबई की शान का प्रतीक था। हम दो तीन लड़के ताज में चाय पीने गए थे। महीनों गाते फिरे थे ताज में चाय पिए हुए हैं। वे साथी चकित होते थे जिन्होंने उसके बारे में सुन रखा था जो नहीं जानते थे वे करेक्शन करने की कोशिश करते थे ताज बंबई में नहीं आगरा में है। ख़ैर, जब ताज पहुंचे तो चारों तरफ़ सिक्योरिटी पड़ी थी। गाड़ियां तो जाने ही नहीं दी जा रही थी। हमसे पूछा गया आपका रिज़र्वेशन है। हमने कहा नहीं। उसने रास्ता दिखा दिया। रत्न जी टाटा ने कहा था कि हम अपनी सुरक्षा आप करेंगे। सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां सुरक्षा इतनी तगड़ी थी कि सरकारी ज़मीन तक पर चलने की मनाई थी। ओबेराय में सब खुला था। उनकी आवाज़ में जनता का सा आत्मविश्वास था। यहां पर आत्मनिर्भरता की घोषणा के बावजूद परनिर्भरता थी। लेकिन एक संदेश जो ओबेराय में सुनने को मिला था उसमें जनता की उस इच्छा का प्रतिबिंब था जिसके ज़रिए हमले के बाद बिना कुछ कहे सब कुछ कह दिया था। भारतीय जनता की परिपक्वता का यह भी एक प्रमाण है कि इतना सब हो जाने के बाद लड़ने को अनावश्यक समझती है। प्रधानमंत्री ने भी लड़ाई की संभावना को नकारा है। सबसे पहली ज़रूरत है आर्थिक स्थायित्व की। यहां की जनता ने इस मंदी के दौरान इसके महत्व तो समझा है। उस स्थायित्व के पीछे सामान्य जन हैं। अगर लड़ाई होती है यह दो देशों तक ही सीमित नहीं रहेगी सारा एशिया आर्थिक संकट की चपेट में आ जाएगा। सब समीकरण बदल जाएंगे। आधार होगा राजनीतिक हित। इसलिए डिप्लोमेसी के द्वारा ही इस संकट से निबटा जा सकता है।
कुल मिलाकर जनमानस को अपने निर्णय स्वयं लेने की आदत डालनी होगी। निर्णय ही लेना काफ़ी नहीं होगा उसे उन हुक्मरानों के कानों तक भी पहुंचाना होगा जो उसे क्रियान्वित करने के लिए ज़िम्मेदार बनाए गए हैं। उसे हुक्मरानों से सवाल पूछने की मानिकता भी विकसित करनी होगी। वरना निर्णय कहीं लिया जाएगा और भुगतेगा कोई और यानी हम और वो।
गिरिराज किशोर, 11-210, सूटरगंज, कानपुर -1


जनता को सवाल पूछने की आदत डालनी होगी

आप क्या चाहते हैं यह आप भी नहीं जानते। आपने अपने से पूछा कि आप क्या चाहते हैं या हवा का रूख़ देखा और राय पर राय देनी शुऱू कर दी। आप मारना चाह सकते हैं पर मरना नहीं चाहेंगे। उसमें अपनी जान जाती है। यह प्रक्रिया अपने आप में बड़ी भयानक है। कहना आसान है, मरना मुश्किल। हम जान दे देंगे, हम देश भक्त हैं। लेकिन क्या जान ही अकेली जाती है। जान के साथ बहुत कुछ जाता है। क्या क्या जाता है इसकी सूची किसी के पास नहीं। पिछले माह 26 नवंबर को मुंबई पर सबसे बड़ा हमला हुआ था। मुंबई पर नहीं पूरे देश पर। जैसे किसी ज़माने में दुश्मन कहो या लुटेरे लाव लश्कर के साथ कभी रेगिस्तान से आते थे या समुद्र से आकर हमला बोल देते थे। बाबर के साथ तो चंद घुड़ सवार थे। क्लाइव के भी कुछ सिपाहियों और घुड़सवारों ने नवाब की पूरी सेना चंद घंटों में हरा दी थी। यहां तो पड़ौसी मुल्क से दस आतंकवादी समुद्री रास्ते से आए और कुछ समय के लिए पूरे मुंबई को बंधक बना लिया। हम नाराज़ हैं हमारे इतने बड़े देश की गरिमा को पड़ौसी देश के आंकवादियों ने चोट पहुंचाई। नाराज़ होना वाजिब है। पर क्या हम अपने आपसे भी नाराज़ हैं। हमने अपने आप से पूछा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। शायद अपने आपसे पूछना हमारी आदत में शुमार नहीं। हमने कभी पूछा ही नहीं। इतने हमले हुए। अंदर से, बाहर से। कभी किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं की गई। सब तू तू मैं मैं में निकल गई। सोमनाथ के मंदिर से लेकर बाबरी मस्जिद तक, इधर संसद और अक्षरधाम से लेकर मुंबई पर हुए हमलों तक। सब तू तू मैं मैं में गुज़र गया। जो मर जाते हैं उन्हें शहीद बना दिया जाता है जो बच जाते हैं वे निर्दोष भी और योद्धा भी उनसे कोई नहीं पूछता मरनेवाले कैसे मर गए, तुम कैसे बच गए। सबसे पहले तो यही सवाल उठता यह सब हो कैसे गया। ये सवाल न नेता से पूछे जाते हैं और न नौकरशाह से। चीन से हारने के बाद भी जिम्मेदारी किस ने ली। न किसी को दी गई। सब दूध के धुले। हम इतने महान कैसे हो गए कि न साहू को बख्शिश और न दोषी को दंड।
ठीक है हम पर हमला किया गया। हमारा नुकसान हुआ। हमला हमारी कमज़ोरी का नतीजा भी था। उस कमज़ोरी का कारण हमारी अंतर कलह भी हैं। ताड़ने वाले कयामत की नज़र रखते हैं। उदाहरण के लिए हम धर्म परिवर्तन के लिए दूसरे लोगों को दोषी मानते हैं लेकिन अपने धर्म को परिवर्तन मुक्त करने की दिशा में कुछ नहीं करना चाहते। लकीर पीट रहे हैं। सांप के निकल जाने पर हमें कोई आपत्ति नहीं, बस लकीर न छोड़े। जब सत्ता के केंद्र संसद पर हमला हुआ था उस वक्त भी यही सब हुआ था। इस बार मुंबई पर हुए हमले ने जनता पर चोट की है। सी एस टी पर बेगुनाह लोग मारे गए। ओबेराय और ताज होटलों में विदेशी टूरिस्ट और साधन संपन्न लोग मारे गए। लेकिन जनता का गुस्सा उन लोगों को लेकर ज्या़दा है जो अनपहचाने चले गए। उसी ने लोगों को जोड़ा। दबाव बनाया। इस देश का मनोविज्ञान है कि उपेक्षित और पीड़ित लोगों के साथ सहानुभूति सक्रियता के साथ उत्पन्न होती है। प्रतिक्रिया भी प्रभावी होती है। वैसे संसद पर हुए हमले के कारण जन आक्रोश तो था लेकिन सहानुभूति की सक्रियता अपेक्षाकृत कम थी। प्रतीक पर हमला सम्मान को आहत करता है जन पर होने वाला हमला संवेदना को ज़ख्मी करता है। मुंबई पर हुए हमले ने बहुत कुछ बदला। उस सरकार के गृहमंत्री को न तो त्यागपत्र देने की बाध्यता का सामना करना पड़ा और न किसी सरकारी ढांचे में बदलाव की बाध्यता महसूस हुई। सब पूर्ववत चलता रहा। इस सरकार को मंदी के साथ इस संकट का सामना करना पड़ रहा है। पैकेज देकर मंदी के इस आलम में आर्थिक स्थिति को सामान्य बनाए रखने की चुनौती है। शायद उसी का नतीजा है कि मुद्रास्फीति में गिरावट आई है। तीन हफ़्ते में आतंकवाद रोकने के लिए कानून भी बनाए गए। इंटरनेशनल स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ़ वातावरण बनाया जा रहा है। राजनीति काम के सामने कमज़ोर पड़ने लगत है। सवाल है सरकार के ऊपर यह दबाव कब तक बना रहेगा। जनता का दबाव दिल से उपजता है राजनीति का दबाव वक्ती होता, मौका परस्ती का। जनता के जुड़ते ही नक्शा बदल गया। किसी ने किसी से नहीं कहा। इंसानी तारबरकी स्वतः चालू हो गई। कश्मीर तक बदल गया। 26 दिसंबर को मैं मुंबई में था। लोग हमले का महीना मना रहे थे। किसी के मन में किसी के प्रति बैर या गुस्सा नहीं था। 60 साल में जनता ने क्यों और कैसे का जवाब खोजना सीख लिया। यह जनता की परिपक्वता का प्रमाण है। अगले दिन हम लोग पहले ओबेराय में चाय पीने गए। वहां लगा जैसे कहीं कुछ नहीं हुआ हो। पूछने पर एक कारकून ने कहा। हमारी भी गलती थी हम सरकार के दम पर हाथ छोडकर गाड़ी चला रहे थे। धोखा खा गए। औंधे मुंह गिर पड़े। कोशिश करेंगे दोबारा ऐसा न हो। ताज होटल गए। दसवी क्लास के दिनों में लड़कों के साथ टूर में बंबई गया था। तब ताजमहल की तरह ताज होटल भी बंबई की शान का प्रतीक था। हम दो तीन लड़के ताज में चाय पीने गए थे। महीनों गाते फिरे थे ताज में चाय पिए हुए हैं। वे साथी चकित होते थे जिन्होंने उसके बारे में सुन रखा था जो नहीं जानते थे वे करेक्शन करने की कोशिश करते थे ताज बंबई में नहीं आगरा में है। ख़ैर, जब ताज पहुंचे तो चारों तरफ़ सिक्योरिटी पड़ी थी। गाड़ियां तो जाने ही नहीं दी जा रही थी। हमसे पूछा गया आपका रिज़र्वेशन है। हमने कहा नहीं। उसने रास्ता दिखा दिया। रत्न जी टाटा ने कहा था कि हम अपनी सुरक्षा आप करेंगे। सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां सुरक्षा इतनी तगड़ी थी कि सरकारी ज़मीन तक पर चलने की मनाई थी। ओबेराय में सब खुला था। उनकी आवाज़ में जनता का सा आत्मविश्वास था। यहां पर आत्मनिर्भरता की घोषणा के बावजूद परनिर्भरता थी। लेकिन एक संदेश जो ओबेराय में सुनने को मिला था उसमें जनता की उस इच्छा का प्रतिबिंब था जिसके ज़रिए हमले के बाद बिना कुछ कहे सब कुछ कह दिया था। भारतीय जनता की परिपक्वता का यह भी एक प्रमाण है कि इतना सब हो जाने के बाद लड़ने को अनावश्यक समझती है। प्रधानमंत्री ने भी लड़ाई की संभावना को नकारा है। सबसे पहली ज़रूरत है आर्थिक स्थायित्व की। यहां की जनता ने इस मंदी के दौरान इसके महत्व तो समझा है। उस स्थायित्व के पीछे सामान्य जन हैं। अगर लड़ाई होती है यह दो देशों तक ही सीमित नहीं रहेगी सारा एशिया आर्थिक संकट की चपेट में आ जाएगा। सब समीकरण बदल जाएंगे। आधार होगा राजनीतिक हित। इसलिए डिप्लोमेसी के द्वारा ही इस संकट से निबटा जा सकता है।
कुल मिलाकर जनमानस को अपने निर्णय स्वयं लेने की आदत डालनी होगी। निर्णय ही लेना काफ़ी नहीं होगा उसे उन हुक्मरानों के कानों तक भी पहुंचाना होगा जो उसे क्रियान्वित करने के लिए ज़िम्मेदार बनाए गए हैं। उसे हुक्मरानों से सवाल पूछने की मानिकता भी विकसित करनी होगी। वरना निर्णय कहीं लिया जाएगा और भुगतेगा कोई और यानी हम और वो।
गिरिराज किशोर, 11-210, सूटरगंज, कानपुर -1

10 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

बहुत अच्छा लेख है.

@कुल मिलाकर जनमानस को अपने निर्णय स्वयं लेने की आदत डालनी होगी। निर्णय ही लेना काफ़ी नहीं होगा उसे उन हुक्मरानों के कानों तक भी पहुंचाना होगा जो उसे क्रियान्वित करने के लिए ज़िम्मेदार बनाए गए हैं। उसे हुक्मरानों से सवाल पूछने की मानिकता भी विकसित करनी होगी। वरना निर्णय कहीं लिया जाएगा और भुगतेगा कोई और यानी हम और वो।

पूर्ण रूप से सहमत हूँ आपसे.

गिरिराज किशोर said...

Dhanyavad, ab hame dusre dhang se sochna aur karna hai.tabhi ham apne ko bacha sakte hain

Rashmi Singh said...

इस लेख के बहाने Giriraj ji ने बड़े सार्थक सवाल उठाये हैं. इन पर गौर करने की जरुरत है.

Bahadur Patel said...

sir aapane sahi baat kahi hai. saval karana jaruri hai. tabhi in logon ko samajh me aayega.
ek aur bhi samjh me aa rahi hai ki hame ek achchhe system ko paida bhi karana hoga. yah bhi sahi hai is prajatantrik desh me ek achchhi rajneeti ki jarurat hai.
is tarah ki jitani bhi samsyayen hai unaka hal rajneetik samajh se hi hoga. isliye rajneeti se alag hokar in prashno ke jawab bhi hame nahin mil payenge.
ek esi rajneeti jo yahan ki janata hi nahin balki poore manav samuday ke hit ki bhi honi chahiye.
aapane sahi hi kaha hai ki jab tak ham antim aadami ko economical atmnirabhar nahin banayenge tab tak kisi bhi samsya ka hal nahin nikal sakata hai. aur yahi hathiyar poonjiwaad se ladane me bhi hamari madad karega.
bahut-bahut dhanywaad sir.

आकांक्षा~Akanksha said...

निर्णय ही लेना काफ़ी नहीं होगा उसे उन हुक्मरानों के कानों तक भी पहुंचाना होगा जो उसे क्रियान्वित करने के लिए ज़िम्मेदार बनाए गए हैं। उसे हुक्मरानों से सवाल पूछने की मानिकता भी विकसित करनी होगी। वरना निर्णय कहीं लिया जाएगा और भुगतेगा कोई और यानी हम और वो।.....बहुत सही कहा आपने, स्वागत है !!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सही कहा आपने…जनता को सवाल पूछना सीखना ही चाहिये।
और शायद साहित्यकारो को भी…जादूई यथार्थ से परे किसी आभासी शत्रु की जगह साफ़ दिखाई दे रहे शत्रु से सम्बोधित हों

गिरिराज किशोर said...

6 mitron ne apni pratikriya di he. Ye sawal yahin samapt nahi hote inko ham sab ko milkar age bhi le jana hai.Abhi hamare rajnata hamajhte hain ki hamare pas sawal nahi nhain. Sawal sab ke man mai hote hain. jawab janne ki jigyasa bhi hoti hai. per sahas aur avsar ki kami hai. ham nidar honge to samadhan niklega. Gandhi samaj ko nirbhya banana chahte the.Kya ham bhi chahte haimn?

गिरिराज किशोर said...

6 mitron ne apni pratikriya di he. Ye sawal yahin samapt nahi hote inko ham sab ko milkar age bhi le jana hai.Abhi hamare rajnata hamajhte hain ki hamare pas sawal nahi nhain. Sawal sab ke man mai hote hain. jawab janne ki jigyasa bhi hoti hai. per sahas aur avsar ki kami hai. ham nidar honge to samadhan niklega. Gandhi samaj ko nirbhya banana chahte the.Kya ham bhi chahte haimn?

sandhyagupta said...

Chup-chap yatha sthiti ko jhelne se badhkar koi dusra apradh nahin.Yah chuppi samaj ko jad banati hai.

abnish singh chauhan said...

मान्यवर, आपका लेख मन को छूता है, पर प्रश्न यह है की कितने लोग ऐसी संवेदना रखते है और जो रखते भी है उनकी आवाज कितनौ तक पहुँच पा रही है? फिर भी आपकी आवाज लोगों तक पहुँच रही है. सुखद है. धन्यबाद. स्नेहाधीन- अवनीश सिंह चौहान , इटावा, उ.प.