Sunday, 24 May, 2009

Lohia aur sahitya

लोहिया और साहित्य

23 मार्च 09 को डा. राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी का आरंभ हुआ। दिल्ली के मावलंकर हॉल में उसकी शूरूआत खांटी लोहियावादी नेता और साथी जनेश्वर मिश्रा ने की। मुझे भी उसमें शिरकत ranकरने के लिए बृजभूषण जी और आनन्द भाई ने बुलाया था। एक गोष्ठी की अध्यक्षता भी कराई। इलाहाबाद प्रवास के दौरान डा लोहिया से संपर्क हो गया था। जब 1962 में आ. चंद्रभानु गुप्ता जी ने चुनाव लड़ने के लिए कहा तो मैंने माफ़ मांग ली थी। जब मुझे अध्यक्षीय भाषण देने के लिए कहा गया तो लेखक होने के नाते मैंने साहित्यिक संस्मरण सुनाने का निश्चय किया। मैं जानता था कि वहां पर उपस्थित लोहियावादी शायद ही इस तरह की बातें सुनने न आए हों। लेकिन चंद घटनाएं सुनाई।
जब लोहिया जी अपने काफ़ले के साथ आते थे तो सबसे पहले उनकी नज़र काफ़ी हाउस का नज़ारा करती थीं। हम नए लेखक बैठे होते थे ज़रूर पूछते कुछ लिखते पढ.ते भी हो या नहीं। देश की उन्नित के साहित्य ज़रूरी है। वही देश की पहचान बनता है।
एक बार स्व विजयदेव नारायण साही ने बताया कि लोहिया जी ने निराला जी से मिलने की इच्छा प्रकट की। साही जी ने कहा कि उनके मूड पर निर्भर करता है वे कैसा व्यवहार करें। उल्टा सीधा कुछ कह दिया तो बर्दाश्त कर सकेंगे।
चलो देखते हैं। उम्र में बड़े ही होंगे। वे दोनों दोपहर बाद पहुंचे निराला जी सोकर उठे थे। उन्होंने जाते ही पूछा कहो साही कैसे आए।
साही जी ने कहा आप से लोहिया जी मिलना चाहते थे। उन्हें आपसे मिलाने लाया हूं। उन्होंने उनकी तरफ़ देखा। जवाहरलाल तो इलाहाबाद के होकर कभी नहीं मिले, आप कैसे आ गए। लगता है वे लोहिया जी को उनके बराबर रखते थे।
आप देश के बड़े कवि हैं आप से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे। निराला जी ने लंबा सा हूं किया जैसे उनकी हां में हां मिला रहे हों। निराला जी ने अपने आप ही बड़बड़ाया जवारलालआते तो उन्हें भी चाय पिलाता। उनके पास लुटिया थी बाल्टी में से पानी भरकर अंगीठी पर रख दिया। और पूछा –तुम भी कविता लिखते हो?
जी नहीं पढ़ता हूं?
क्या पढ़ा?
उन्होंने कहा आपकी राम की शक्तिपूजा। उन्होंने लंबा सा हूं किया। लोहिया जी बोले उसने मुझे प्रेरणा दी है। तब तक चाय बन गई थी।
मैं सोचता हूं कि क्या आज शायद ही ऐसा कोई राजनेता होगा जिसने राम की शक्ति पूजा पढ़ी हो प्रेरणा लेना तो दूर की बात है। चाय पीकर जब लोहिया जी निकले तो निराला जी बुदबुदा रहे थे फिर आना।

कई बातें लोहिया जी के संदर्भ में ध्यान आती हैं मुझे अंग्रज़ी हटाओ आंदोलन में जनेश्वर जी के साथ काम करने का अवसर मिला था। इस कार्यक्रम के अगले दिन मैंने सब हिंदी और अंग्रेज़ी अखबार देखे। इतने बड़े व्यक्ति के जन्म शताब्दी के आरंभ के बारे में अखबारों ने क्या रपट छापी। अंग्रेज़ी का तो उन्होंने विरोध किया था। उन्होंने रपट नहीं छापी तो बात समझ में आती है लेकिन मेरे लिए आश्चर्य की बात थी कि जनसत्ता को छोड़कर किसी भी हिंदी अखबार ने उस कार्यक्रम का नोटिस नहीं लिया था।अगर गांधी और लोहिया न होते तो इन हिंदी अखबारों का पता नहीं क्या स्थिति हुई होती।

Friday, 1 May, 2009

Prathmikta se door

शिक्षा जान का जंजाल
आज संसार के सबसे बड़े जनतंत्र का चुनाव हो रहा है। मुद्दे क्या हैं? कुछ नहीं। विदेशों मे जमा धन 100 दिन में ले आऐंगे जनता को क्या मिलेंगा? ऐसा लगता है अडवानी जी प्रधानमंत्री बनते ही आर्डर देंगे और स्वीटज़रलैंड के बैंक दरवाज़े खोल देंगे देश का सारा धन साइफ़न होकर देश में आ जाएगा। क्यों बेवकूफ़ बनाते हैं? आपके ज़माने में ही तो दाउद के चेले का प्रत्यार्पण का किस्सा चालू हुआ था। पुर्तगाल से लाने में कितना पैसा फुंका और कितना वक्त लगा। लिखकर देना पड़ा कुछ भी हो जाए फांसी नहीं देंगे। क़बुल की तरह फिर समर्पण। जो सरकारों को करना चाहिए और कर सकती हैं वह तो करती नहीं आसमान से तारे तोड़कर लाने की बात करती हैं। सबसे पहली प्राथमिकता तो थी बच्चों की शिक्षा की। साठ साल में कितना और क्या हुआ? वही नंगा ढाक। उस पर तीन पात भी नहीं आए। बच्चों की शिक्षा, भाषा और जन सुरक्षा। कभी सोचा कि क्यों नही आए? आपको एक दूसरे पर दोषारोपण से फ़ुर्सत मिले तो कुछ हो। बच्चे आपके मतदाता थोड़े ही हैं जो आप उनके लिए कुछ करेंगे। बड़े लोगों के बच्चों के लिए तो विदेश हैं ही। आप कहेंगे उनके मां बाप तो हैं मतदाता। मां बाप कई तरह के हैं, उनकी आवश्यकताऐं और प्राथमिकताऐं भी उतने ही तरह की हैं जितने तरह के वे स्वयं हैं। उसका फ़ायदा सरकारें उठाती हैं। जैसे जात बिरादरी ने देश को बांटा उसी तरह सरकारें जन को उनकी ज़रूरतों और प्राथिमकताओं के हिसाब से फेंट रही हैं। भाषाओं को बांटा, शिक्षा को बांटा सुरक्षा को बांटा। नेहरू जी ने तो 1945 में ही गांधी के इस प्रस्ताव को धुर से ठुकरा दिया था कि देश का संचालन हिंद स्वराज के हिसाब से हो। तीन बातें तो उनके मन माफ़िक थी ही नहीं बाकी भी नहीं थीं। गांधी ने उसमें साफ़ कहा आपको हमसे बात करनी है तो हिंदी में करनी होगी। नहीं तो जाइए अपने गांव। यह बात को नेहरू कैसे बर्दाशत करते। लेकिन संस्कृति और भाषा की बात करने वाली पार्टियां भी जब सत्ता में आई इन बातों को वे भी भूल गईं। शिक्षा तो किसी के एजेंडे में था ही नहीं। था तो बंदर बांट के साथ। पिछली सरकारों ने शिक्षा को खाने कमाने के लिए प्राइवेट सेक्टर में डाल दिया। खाओ कमाओ और बिगाड़ो। भाषा बिगाड़ो, पाठ्यक्रम बिगाड़ो और उनके ज़रिए सभ्यता संस्कृति बिगाड़ो। जहां तक सुरक्षा का सवाल है, सरकारी सुरक्षा हमारे यानी नेताओं के लिए, प्राइवेट औरों के लिए। सरकारी सुरक्षा के लिए अलग अलग वर्ग हैं। जैसे हत्याएं भी पद के हिसाब से होती हैं। जैसे जैसे भयक्रांत लोग पदासीन होते गए वैसे वैसे सुरक्षा बरीक होती गई। कई बार तो आम आदमी इन लोगों को सुरक्षा में ही मारा जात है। बेइज़्जत तो हो ही जाता है।
ख़ैर, मैं बात कर रहा था शिक्षा की। हम लोगों की शिक्षा बुनियादी शिक्षा में हुई थी। सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते थे। सब काम अपने हाथों से करते थे। एक रूपया फ़ीस जाती थी। देश आज़ाद होने के बाद श्रमदान और हाथ का काम उसका हिस्सा हो गया था। मूज़्फ्फ़रनगर के गांधीनगर की सड़क बनाने में हम बच्चों ने श्रमदान किया था। जब वहां जाता था तो सड़क देखऩे भी जाता था। अगर देश बनाने में भी बाद के लोगों ने श्रमदान किया होता तो शायद देश के प्रति ऐसी ही ललक उनमें भी होती। हैलीकाप्टरों से झांकते हुए ऊपर ऊपर से न उड़ जाते। आज शिक्षा, मेरा मतलब आरंभिक शिक्षा, सबसे अधिक अधिक रट में है। उसके बारे में कोई एक मत नहीं। पब्लिक स्कूल अपना पाठ्यक्रम चलाते हैं। अधिकतर नए स्कूलों के पास खेल के मैदान तक नहीं। किताबें इतनी की बच्चे कुबड़े हो जाएं। अधिक किताबें बच्चों के हित में नहीं रखी जातीं। इसलिए रखी जाती हैं कि मैनेजमेंट स्कूल ड्रेसेज़ और कोर्स की किताबों पर कमीशन लेकर धन कमाता है। फ़ीस इतनी कि मां बाप की कमर टेढ़ी हो जाती है। छठे पे कमीशन के नाम पर दो दो चार चार हज़ार फ़ीस बढ़ाई जा रही है। यह कोई नहीं जानना चाहता कि कितने स्कूलों ने पिछले पे कमीशन्स अपने यहां लागू किए हैं। किए भी हैं या दस्तख़त कराकर आधी पौनी तनख्वाह देकर छुट्टी पा लेते हैं। दरअसल पहले ही इतने आगे से दौड़ना शुरू किया कि अब फ़ीस बढ़ाया जाना मां बाप और बच्चों के जी का जंजाल हो गया। सारे देश में फ़ीस बढ़ाई जा रही है। उत्तर भारत में तो यह महामारी बुरी तरह फैली है। जहां तक मैं जानता हूं ब्रिटिश सरकार के जमाने में कान्वेंटस को छोड़कर लगभग सब स्कूलों में कोर्स समान थे। मेयो वगैरह तो हाई फाई थे ही। लेकिन गवर्मेंट स्कूल और म्यूनिसपेलिटी के स्कूल, मास्टरों के नाम से चलने वाले प्राइवेट स्कूलों में समानता थी। बच्चों को टार्चर किया जाता है इस हद तक कि वे मर जाते हैं।मारा पीटा पहले भी जाता था लेकिन उन्हें जान से मारने के लिए नहीं। कानपुर के जिला अदालत ने गार्जियन्स की फ़ीस बढ़ाने के खिलाफ अपील ख़ारिज कर दी। कहा नहीं जा सकता जज साहब मामले के अंदर कितनी गहराई तक गए। किन बिंदुओं पर जांच की। यह देश भर के बच्चों का मामला है। हाई कोर्ट को फ़ाइल मंगाकर जांच करनी चाहिए।
अगर इसका कोई रास्ता नहीं निकलता यह असमानता बच्चों के स्तर पर बढ़ती जाती है तो निरक्षरता फ़ीस के कारण बढ़ेगी। इस महामारी को रोकने का सत्याग्रह ही एक तरीक है। स्कूलों में नाम लिखा होने के बावजूद बच्चों को न स्कूल भेजें और न फ़ीस जमा करें।
दूसरे मां बाप अपने आराम में से कटौती करके घरों पर बीस बीस पच्चीस पच्चीस बच्चों के स्कूल चलाएं। आपस में विषय बांट कर पढ़ाएं। यह एक बड़ा आंदोलन बन सकता है। यह मानव अधिकार का मामला है। आप मां बाप पर एक सीमा तक दबाव डाल सकते हैं बच्चों के पाठ्क्रम में समान बनाएं। मातृ भाषा को प्रमुखता देना इसलिए भी ज़रूरी है कि गरीब और पिछड़े बच्चों में कुंठाएं न बढ़ें। इस समय देश की तकनीकी शिक्षा चाहे जितनी आगे हो पर आरंभिक शिक्षा बड़े भारी संकट से गुज़र रही है। अगर राष्ट्र स्तर पर इसका समाधान नहीं निकला गया तो भविष्य की पीढ़ी भारतीय कम और तकनीकी ज़्यादा होगी। तकनीक भी विदेशी। हम दूसरे देशों को थैंक्यू थैंक्यू कहते घूमेंगे।